Bihar MLC चुनाव में कांग्रेस का जीरो प्रदर्शन, Gen Z ने भी किया नकार, पार्टी की रणनीति पर उठे सवाल

The CSR Journal Magazine
पटना: बिहार में हाल ही में हुए MLC चुनाव में कांग्रेस ने अपने पांच प्रत्याशियों को उतारा था, लेकिन नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। पार्टी ने दावा किया था कि वह चुनाव में मजबूती के साथ उतरेगी, लेकिन परिणाम ने उसकी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया। पढ़े-लिखे और युवा वोटरों ने भी कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया। राहुल गांधी का कहना है कि युवा वर्ग उनका समर्थन कर रहा है, लेकिन Gen Z के स्नातक वोटरों ने उन्हें खारिज कर दिया।

कांग्रेस की रणनीति पर सवाल

कांग्रेस ने बिहार MLC चुनाव में पांच सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। इस निर्णय में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और बिहार नेतृत्व दोनों शामिल थे। दरभंगा शिक्षक सीट से डॉ. मदन मोहन झा, कोसी स्नातक सीट से मनोज कुमार जायसवाल, दरभंगा स्नातक से रजनीकांत पाठक, पटना शिक्षक सीट से डॉ. संजय यादव और पटना स्नातक सीट से डॉ. असदुल्ला खान को उम्मीदवार बनाया गया था। इनमें से केवल मदन मोहन झा सीटिंग MLC थे।

राजद ने कांग्रेस को पछाड़ा

राजद ने दरभंगा शिक्षक सीट पर कांग्रेस के सीटिंग MLC मदन मोहन झा को हरा दिया। मदन मोहन झा करीबी मुकाबले में केवल 324 मतों से हारे। जबकि राजद के कुंवर राउत को इस सीट पर केवल 128 वोट मिले। इससे स्पष्ट है कि राजद ने कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना दिया, जिससे मदन मोहन झा अपनी सीट गंवा बैठे। राहुल गांधी चाहे राजद की जितनी तरफदारी करें, लेकिन हकीकत यह है कि उनकी पार्टी को इस चुनाव में करारा झटका लगा है।

उम्मीदवार चयन में हुई गलती?

कांग्रेस के सभी पांच उम्मीदवारों की हार ने पार्टी की चुनावी रणनीति पर सवाल उठाए हैं। पार्टी यह नहीं कह सकती कि वोट चोरी हुई या ईवीएम में गड़बड़ी की गई, क्योंकि चुनाव बैलेट पेपर से हुए थे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा कि हमने अच्छे उम्मीदवार नहीं चुने, इसलिए हार हुई। चुनाव नतीजे भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर सवाल

पटना शिक्षक सीट के उम्मीदवार डॉ. संजय यादव को केवल 21 वोट मिले, जबकि पटना स्नातक सीट के उम्मीदवार डॉ. असदुल्ला खान को 971 वोट मिले। दरभंगा स्नातक के उम्मीदवार रजनीकांत पाठक पांचवें स्थान पर रहे और उन्हें 3496 वोट मिले। कोसी स्नातक सीट पर मनोज कुमार जायसवाल को 2297 वोट मिले और वे चौथे स्थान पर रहे।

क्या राहुल गांधी के आंदोलनों का असर नहीं?

कांग्रेस के चार उम्मीदवार तो मुकाबले में भी नहीं थे। इससे पार्टी की चुनावी तैयारियों और फैसलों पर गंभीर सवाल उठ गए हैं। चूंकि प्रत्याशी आलाकमान की जानकारी और मंजूरी से तय किए गए थे, इसलिए इस हार की जिम्मेदारी पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और महासचिव केसी वेणुगोपाल पर भी आती है। लगातार आंदोलन चलाने वाले राहुल गांधी आखिर क्यों कांग्रेस को कोई चुनाव नहीं जीतवा पा रहे हैं? क्या उनके आंदोलनों में शामिल होने वाली भीड़ केवल दिखावा है, जिसका वोट से कोई मतलब नहीं? यह भी देखने वाली बात है कि यह भीड़ वोट में तब्दील क्यों नहीं हो रही?

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