पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच संभावित त्रिपक्षीय रक्षा समझौते को लेकर चर्चाएं तेज़ हो गई हैं। भले ही अभी इस पर हस्ताक्षर नहीं हुए हों, लेकिन इसके संकेत मध्य-पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया तक नए सुरक्षा समीकरण की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इस गठजोड़ का भारत पर क्या असर पड़ेगा।
त्रिपक्षीय रक्षा समझौते की पृष्ठभूमि
पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री रज़ा हयात हर्राज के मुताबिक, लगभग एक साल से पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच एक त्रिपक्षीय डिफेंस डील का मसौदा तैयार है। तीनों देशों के पास यह मसौदा मौजूद है और उस पर विचार-विमर्श जारी है। हालांकि तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने साफ किया है कि बातचीत तो हुई है, लेकिन अभी किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं।
यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब बीते दो वर्षों में क्षेत्रीय तनाव, युद्धविराम उल्लंघन और भरोसे की कमी बढ़ी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संभावित गठबंधन साझा सुरक्षा कवच की तलाश का संकेत है, जिससे बाहरी हस्तक्षेप और क्षेत्रीय अस्थिरता का सामना किया जा सके।

सऊदी–पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट और तुर्की की भूमिका
पिछले साल सितंबर में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक अहम रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। इसे कई विश्लेषक नेटो के अनुच्छेद-5 जैसा मानते हैं। अब अगर इसमें तुर्की की एंट्री होती है, तो यह गठबंधन और मजबूत हो सकता है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की इस गठबंधन को अपनी सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के तौर पर देख रहा है, खासकर ऐसे दौर में जब अमेरिका और नेटो को लेकर अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। सऊदी अरब के पास वित्तीय ताकत है, पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता और मानव संसाधन, जबकि तुर्की के पास सैन्य अनुभव और उन्नत रक्षा उद्योग इन तीनों का मेल एक प्रभावशाली शक्ति बन सकता है।

तुर्की की एंट्री से क्षेत्रीय समीकरण
अगर तुर्की आधिकारिक तौर पर इस गठबंधन में शामिल होता है, तो यह सुन्नी मुस्लिम दुनिया के नेतृत्व को लेकर सऊदी अरब और तुर्की के रिश्तों में एक नया अध्याय होगा। वर्षों की प्रतिस्पर्धा के बाद दोनों देश अब आर्थिक और रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
तुर्की और पाकिस्तान के बीच पहले से गहरे सैन्य संबंध हैं। तुर्की पाकिस्तान की नौसेना के लिए युद्धपोत बना रहा है, एफ-16 विमानों का उन्नयन कर चुका है और ड्रोन तकनीक साझा कर रहा है। ऐसे में यह गठबंधन मध्य-पूर्व, दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

भारत की चिंता कितनी वाजिब?
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए संवेदनशील है क्योंकि तुर्की खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में रहा है, खासकर कश्मीर और सैन्य टकराव के मामलों में। भारतीय सैन्य अधिकारियों का दावा रहा है कि पिछले सैन्य तनाव के दौरान तुर्की मूल के ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, तुर्की के शामिल होने से भारत की चिंता बढ़ सकती है, लेकिन सऊदी अरब की भूमिका संतुलनकारी हो सकती है क्योंकि उसके भारत के साथ भी व्यापक रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं। सऊदी अमेरिका का करीबी सहयोगी है और तुर्की नेटो का सदस्य, ऐसे में यह देखना अहम होगा कि यह गठबंधन किस हद तक भारत-विरोधी रुख अपनाता है।
भू-राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ऐसा गठजोड़ भारत-पाकिस्तान तनाव को अंतरराष्ट्रीय आयाम दे सकता है और हिंद महासागर से लेकर पश्चिम एशिया तक सुरक्षा चुनौतियां बढ़ा सकता है। हालांकि अंतिम तस्वीर समझौते की शर्तों और सऊदी अरब के रुख पर निर्भर करेगी।


