तेजी से बढ़ती दंत समस्याओं के बीच नीम दातून एक बार फिर चर्चा में है। आयुर्वेद में हजारों वर्षों से उपयोग की जा रही यह परंपरा दांतों को मजबूत बनाने, कीटाणुओं को खत्म करने और मसूड़ों की रक्षा करने में सहायक मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, सही तरीके से इस्तेमाल करने पर नीम दातून कैविटी, प्लाक और बदबू जैसी समस्याओं को कम कर सकता है।
5,000 वर्ष पुरानी परंपरा आयुर्वेद में नीम का महत्व
नीम (Azadirachta indica) को आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सा पद्धतियों में सदियों से उपयोग किया जाता रहा है। इस वृक्ष के पत्ते, छाल, बीज, फूल, फल और जड़ सभी औषधीय गुणों से भरपूर माने जाते हैं।
आयुर्वेदिक ग्रंथों में नीम को कड़वा और कसैला बताया गया है, जो संक्रमण, सूजन, बुखार, त्वचा रोग और दंत विकारों में लाभकारी माना जाता है। नीम की पत्तियों में इम्यूनोमॉड्यूलेटरी, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। इसके सक्रिय तत्व शरीर को उच्च रक्त शर्करा, अल्सर, मलेरिया, फंगल, बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं। दांतों की सफाई के लिए नीम की टहनी यानी दातून का उपयोग प्राचीन काल से दिनचर्या का हिस्सा रहा है।
क्यों जरूरी है नीम दातून? बढ़ती दंत समस्याओं का समाधान
आजकल अधिक मीठा खाना, बार-बार स्नैकिंग और पोषणहीन आहार के कारण दांतों में प्लाक जमना और कैविटी होना आम हो गया है। यदि प्लाक सही तरीके से साफ न हो, तो यह मसूड़ों की सूजन, खून आना और दांत कमजोर होने जैसी समस्याओं को जन्म देता है।
आयुर्वेद के अनुसार कड़वे या कसैले स्वाद वाली टहनियों से दांत साफ करना लाभकारी होता है। नीम और बबूल की दातून विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
नीम में मौजूद एंटी-माइक्रोबियल गुण हानिकारक बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकते हैं। नियमित रूप से नीम दातून करने से:
1. दांतों में कीड़े (कैरीज़) की संभावना कम होती है
2. प्लाक का जमाव घटता है
3. मसूड़ों की सूजन और बदबू कम होती है
4. मसूड़ों के सिकुड़ने (गम रिसेशन) का खतरा घटता है
5. जब मसूड़े कमजोर होते हैं तो दांतों का सहारा कम हो जाता है और वे ढीले पड़ सकते हैं। ऐसे में नीम दातून दांतों को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने में सहायक माना जाता है।
कैसे करें सही तरीके से नीम दातून?
आयुर्वेद में दातून करने का विशेष तरीका बताया गया है। सही विधि अपनाने से इसके अधिकतम लाभ मिल सकते हैं।
दातून चुनते समय ध्यान रखें:
1. दातून का अगला सिरा छोटी उंगली की मोटाई के बराबर हो।
2. पिछला हिस्सा अंगूठे जितना मोटा हो।
उपयोग की विधि
दातून के अगले सिरे को चबाएं जब तक वह ब्रश की तरह मुलायम न हो जाए।
चबाने से टहनी में मौजूद औषधीय तत्व मुंह में मिलते हैं। इन्हें थूका जा सकता है या निगला भी जा सकता है।
मुलायम सिरे को ऊपर-नीचे की दिशा में दांतों पर चलाएं।
दांतों के बीच की सफाई भी दातून से संभव है, इसलिए अलग से डेंटल फ्लॉस की आवश्यकता कम पड़ती है।
आयुर्वेद में ब्रश के बाद माउथवॉश की तरह ‘कवला’ या ‘गंडूष’ (ऑयल पुलिंग) की सलाह दी जाती है। त्रिफला के काढ़े में शहद मिलाकर या तिल/नारियल तेल से कुल्ला करना मसूड़ों को मजबूत बनाने में मदद करता है।
यदि मुंह में छाले हों तो त्रिफला का काढ़ा उपयोगी माना जाता है।
पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी वरदान
नीम का पेड़ केवल औषधीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कम पानी में भी उग जाता है और शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में आसानी से पनपता है। भारत के अधिकांश हिस्सों विशेषकर राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दक्षिण भारत के राज्यों में यह व्यापक रूप से पाया जाता है।
नीम का वृक्ष वायु शुद्ध करने, कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में सहायक होता है। इसकी पत्तियां प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में उपयोग की जाती हैं, जिससे रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता कम होती है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में किसान नीम की पत्तियों को बकरियों के चारे के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं। यह पशुओं के लिए पोषक माना जाता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसकी उपयोगिता बढ़ाता है।
नीम दातून एक सरल, सस्ता और प्राकृतिक उपाय है, जो दांतों और मसूड़ों की सेहत बनाए रखने में मददगार हो सकता है। आधुनिक जीवनशैली के बीच यह प्राचीन परंपरा फिर से प्रासंगिक होती दिख रही है। नियमित और सही तरीके से उपयोग करने पर यह न केवल दंत समस्याओं से बचाव करता है, बल्कि संपूर्ण मौखिक स्वच्छता को बेहतर बनाने में भी सहायक है। प्राकृतिक उपचारों को अपनाने से पहले अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है, लेकिन नीम दातून निश्चित रूप से एक ऐसी विरासत है, जिसने पीढ़ियों तक लोगों की मुस्कान को स्वस्थ बनाए रखा है।