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February 22, 2026

नासा का मून मिशन अटका: रॉकेट के हीलियम फ्लो में समस्या

The CSR Journal Magazine
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा का मून मिशन आर्टेमिस II टल सकता है। ये मिशन पहले 6 मार्च को लॉन्च होने वाला था, लेकिन रॉकेट के हीलियम फ्लो में दिक्कत आ गई है। नासा ने बताया कि बीती रात रॉकेट के ऊपरी स्टेज में हीलियम का फ्लो रुक गया। लॉन्च के लिए सॉलिड हीलियम फ्लो की आवश्यकता होती है। संकल्पना के अनुसार, जैसे ही समस्या का समाधान होगा, स्पेस एजेंसी दी गई समय सीमा का पालन करने की कोशिश करेगी।

इंजीनियरों की मेहनत: दो तरीकों पर कर रहे काम

नासा ने कहा है कि वह सारे डेटा को रिव्यू कर रहा है। अगर हालात बिगड़ते हैं, तो रॉकेट को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर के लॉन्च पैड से हैंगर में ले जाया जा सकता है। इंजीनियर ये दोनों ऑप्शन तैयार कर रहे हैं ताकि जल्दी से जल्दी समस्या को हल किया जा सके। हालांकि, यह जरूर कहा गया है कि इसका असर लॉन्चिंग पर पड़ सकता है।

फ्लाईबाई मिशन: चांद के चारों ओर एक यात्रा

आर्टेमिस II मिशन के दौरान एस्ट्रोनॉट्स चांद पर कदम नहीं रखेंगें। ये एक फ्लाईबाई मिशन है, जिसमें एस्ट्रोनॉट्स चांद के चारों ओर घूमकर वापस लौटेंगे। ये पिछले 50 सालों में पहली बार होगा जब इंसान चांद की कक्षा में जाएगा। अगर ये मिशन सफल होता है, तो 2028 में आर्टेमिस-3 मिशन भेजा जाएगा, जिसमें एस्ट्रोनॉट्स चांद पर उतरेंगे।

क्रू में ऐतिहासिक बदलाव: पहले महिला और पहले ब्लैक एस्ट्रोनॉट

इस बढ़िया मिशन में चार एस्ट्रोनॉट्स शामिल होंगे। पहली बार एक महिला और एक अफ्रीकन-अमेरिकी एस्ट्रोनॉट भी इस क्रू का हिस्सा बनेगा। क्रिस्टीना हैमॉक कोच को विशेषज्ञ के तौर पर चुना गया है। वे पहले भी सबसे ज्यादा समय अंतरिक्ष में रहने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं। उनके साथ अमेरिकी नेवी के विक्टर ग्लोवर भी हैं, जो इस मिशन में पायलट होंगे। वे पहले ब्लैक एस्ट्रोनॉट हैं जो मून मिशन पर जाएंगे।

यात्रा की दूरी: 22 लाख किलोमीटर की चुनौती

आर्टेमिस-2 मिशन के दौरान करीब 22 लाख किलोमीटर की यात्रा होगी। इसका मुख्य मकसद ये जानना है कि ओरियन स्पेसशिप के सभी लाइफ-सपोर्ट सिस्टम ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं। इससे यह सुनिश्चित होगा कि एस्ट्रोनॉट्स को डीप स्पेस में जाने और 2028 में चांद पर उतरने में कोई परेशानी न आए।

पिछले मिशनों की याद: अपोलो सीरीज से तुलना

आर्टेमिस II वापस लौटने से पहले चंद्रमा के सुदूर भाग से करीब 10,300 किलोमीटर दूर तक जाएगा। ये मिशन पिछले 50 सालों के अपोलो मिशन से बेहद अलग है। अपोलो-17 मिशन दिसंबर 1972 में चांद के इतने करीब पहुंचा था। नासा का नया मिशन विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलने की कोशिश कर रहा है।

भविष्य की योजनाएं: चांद पर संसाधनों की खोज

अब नासा का मकसद पृथ्वी के बाहर स्थित चीजों का अच्छे से एक्सप्लोर करना है। चांद पर

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