मुंबई में 92 साल पुराने शिरोडकर विद्यालय पर ताला, प्रबंधन विवाद से परीक्षा पर संकट; अभिभावक परेशान

The CSR Journal Magazine

मुंबई: 92 साल पुराने डॉ. शिरोडकर स्कूल पर लगा ताला, लालबाग-परेल में छात्रों के भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता

मुंबई के लालबाग-परेल इलाके में स्थित करीब 92 साल पुराने डॉ. शिरोडकर स्कूल को लेकर इन दिनों गंभीर विवाद सामने आया है। स्कूल के बंद होने और परिसर में ताले तोड़े जाने की घटना ने विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, स्कूल प्रबंधन से जुड़े आंतरिक विवाद के बीच परिसर में बाहरी लोगों को बुलाकर ताले तोड़े गए। स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाला DVR भी गायब होने की बात सामने आई है। इस घटनाक्रम ने न केवल विद्यालय के संचालन, बल्कि विद्यार्थियों की पढ़ाई और शैक्षणिक भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुंबई के पुराने औद्योगिक और श्रमिक बहुल इलाकों में लालबाग और परेल की अपनी विशिष्ट पहचान रही है। यहां के अनेक शिक्षण संस्थानों ने पीढ़ियों तक स्थानीय परिवारों के बच्चों को शिक्षा दी है। ऐसे में लंबे इतिहास वाले किसी विद्यालय का अचानक बंद होना या उसका संचालन विवादों में घिरना केवल एक संस्थान की समस्या नहीं है, बल्कि उससे जुड़े विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और पूरे समुदाय को प्रभावित करने वाला मामला बन जाता है।

प्रबंधन के दो गुटों के विवाद से बिगड़े हालात

रिपोर्ट के मुताबिक, शिरोडकर विद्यालय का संचालन करने वाली क्षात्रकुलोत्पन्न मराठा समाज संस्था के प्रबंधन मंडल में लंबे समय से विवाद चल रहा है। यह विवाद शुक्रवार, 9 अक्टूबर की रात उस समय गंभीर हो गया, जब विद्यालय के प्रबंधन पर अधिकार जताने वाले एक गुट के लोगों ने परिसर में प्रवेश कर वहां लगे ताले तोड़ दिए और उनकी जगह नए ताले लगा दिए। रिपोर्ट में विद्यालय के कार्यालय तथा पदाधिकारियों के कक्षों के ताले तोड़े जाने का भी उल्लेख है। घटना के बाद दोनों गुटों के बीच तनाव बढ़ गया और पुलिस को परिसर के बाहर सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ी। रिपोर्ट के अनुसार, इस घटनाक्रम में स्वप्नीक फाटक का नाम सामने आया है, जो वर्ष 2007 से 2012 के बीच विद्यालय में कार्यरत रहे थे। मौजूदा प्रबंधन मंडल का आरोप है कि फाटक कुछ लोगों के साथ विद्यालय पहुंचे थे और उनके साथ सुरक्षा कर्मी भी थे। आरोप है कि विद्यालय के सुरक्षा कर्मचारियों पर दबाव डालकर परिसर में प्रवेश किया गया, कार्यालयों के ताले तोड़े गए और प्रबंधन मंडल का बोर्ड हटाकर दूसरा बोर्ड लगाया गया। हालांकि, इस मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक पक्ष के आरोपों को स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। विवाद का वास्तविक समाधान संबंधित दस्तावेजों, संस्था के अभिलेखों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।

डीवीआर गायब होने से सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

इस विवाद का एक और गंभीर पहलू विद्यालय के सीसीटीवी कैमरों से जुड़ा है। मौजूदा प्रबंधन मंडल ने आरोप लगाया है कि परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने वाला डीवीआर निकालकर ले जाया गया। डीवीआर में घटना से पहले और उसके दौरान की रिकॉर्डिंग मौजूद होने की स्थिति में वह पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में डीवीआर गायब होने की बात प्रबंधन पक्ष के आरोप के रूप में सामने आई है। इसे लेकर जांच में क्या निष्कर्ष निकला है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती। यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि उपकरण किसके कब्जे में है, उसमें कितनी अवधि की रिकॉर्डिंग थी और क्या घटना की कोई अन्य रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। विद्यालय जैसे संवेदनशील स्थान पर सीसीटीवी व्यवस्था का महत्व केवल संपत्ति की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों की आवाजाही, बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश और परिसर में होने वाली किसी अप्रिय घटना की जांच में भी इसका उपयोग किया जाता है। इसलिए इस मामले में सुरक्षा व्यवस्था को सामान्य करना और उपलब्ध साक्ष्यों को सुरक्षित रखना आवश्यक है।

दोनों गुटों के दावे अलग-अलग, विवाद की जड़ क्या है?

मौजूदा प्रबंधन मंडल की ओर से भाऊ डगरे ने दावा किया कि संस्था के संविधान के अनुसार वर्ष 2012, 2017 और 2022 में हुए चुनावों में उनका मंडल निर्वाचित हुआ था। उनके पक्ष का कहना है कि विद्यालय पर दूसरे गुट का कब्जा करने का प्रयास अनुचित है। उन्होंने डीवीआर निकालकर ले जाने का आरोप भी लगाया। दूसरी ओर, स्वप्नीक फाटक ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संस्था के धर्मादाय आयुक्त कार्यालय के अभिलेखों में वर्ष 2007 से उनके मंडल का नाम कार्यकारी मंडल के रूप में दर्ज है। उन्होंने मौजूदा मंडल के चुनावों की प्रक्रिया और उन्हें मिली औपचारिक मान्यता पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि यह देखना जरूरी है कि चुनाव धर्मादाय आयुक्त द्वारा नियुक्त चुनाव अधिकारियों की निगरानी में हुए थे या नहीं और संबंधित प्राधिकारी ने उन्हें मंजूरी दी थी या नहीं। इन दोनों दावों से स्पष्ट है कि विवाद केवल विद्यालय के दरवाजों पर लगे ताले का नहीं, बल्कि संस्था के प्रबंधन पर अधिकार और चुनावों की वैधता का भी है। किसी संस्था में चुनाव होने का दावा और संबंधित प्राधिकारी के अभिलेखों में दर्ज स्थिति अलग-अलग बातें हो सकती हैं। विवाद की स्थिति में संस्था का संविधान, चुनाव संबंधी दस्तावेज, कार्यकारिणी के कार्यकाल और धर्मादाय आयुक्त कार्यालय के प्रमाणित अभिलेखों की जांच महत्वपूर्ण होती है।

सोमवार से परीक्षाएं, विद्यार्थियों की बढ़ी परेशानी

इस पूरे विवाद का सबसे सीधा असर विद्यार्थियों पर पड़ने की आशंका है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्यालय की अर्धवार्षिक परीक्षाएं सोमवार, 12 अक्टूबर से शुरू होने वाली थीं। विद्यालय में सीबीएसई और महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा मंडल से संबंधित कक्षाओं के विद्यार्थियों की पढ़ाई होती है। ऐसे में परीक्षा के आयोजन को लेकर अभिभावकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। परीक्षा से ठीक पहले विद्यालय के संचालन में बाधा आने पर विद्यार्थियों के सामने कई सवाल खड़े हो जाते हैं। परीक्षा निर्धारित समय पर होगी या नहीं, विद्यार्थियों को किस प्रवेश द्वार से अंदर जाना होगा, परीक्षा कक्षों की व्यवस्था कौन संभालेगा और प्रश्नपत्रों तथा उत्तरपुस्तिकाओं की सुरक्षा किसके जिम्मे होगी—इन सभी बातों पर स्पष्ट सूचना जरूरी होती है।

अभिभावकों में बढ़ी चिंता

अभिभावकों की चिंता केवल एक दिन की परीक्षा तक सीमित नहीं है। यदि प्रबंधन विवाद के कारण विद्यालय नियमित रूप से नहीं खुलता, तो पढ़ाई का कार्यक्रम, उपस्थिति, आंतरिक मूल्यांकन और आगे की शैक्षणिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं। विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए यह स्थिति कठिन हो सकती है, जिनकी परीक्षाएं पहले से तय समय-सारणी के अनुसार आयोजित होनी हैं। रिपोर्ट में अभिभावक संजय गावकर ने भी चिंता जताई कि इस तरह के तनावपूर्ण माहौल में बच्चों को विद्यालय भेजना कितना उचित होगा। अभिभावकों के लिए बच्चों की सुरक्षा और परीक्षा की तैयारी, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

पुलिस की भूमिका और कानूनी पहलू

रिपोर्ट के अनुसार, घटना के बाद विद्यालय के बाहर पुलिस बंदोबस्त तैनात किया गया। मौजूदा प्रबंधन मंडल ने पुलिस से संपर्क कर दूसरे गुट को परिसर से बाहर किए जाने की बात कही। समाचार प्रकाशित होने तक इस मामले में पुलिस में प्राथमिकी दर्ज होने की पुष्टि नहीं की गई थी। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी शिक्षण संस्थान के परिसर में जबरन प्रवेश, ताले तोड़ने, सुरक्षा कर्मचारियों को धमकाने या संस्थान की संपत्ति ले जाने जैसे आरोप सामने आते हैं, तो पुलिस को शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई का आकलन करना होता है। यदि सीसीटीवी उपकरण वास्तव में हटाया गया है, तो उसकी बरामदगी और उसमें मौजूद रिकॉर्डिंग की जांच भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसके साथ ही संस्था के प्रबंधन पर अधिकार का प्रश्न अलग प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत सुलझाया जा सकता है। पुलिस की ओर से शांति बनाए रखने के लिए की गई व्यवस्था और संस्था के वैध प्रबंधन का अंतिम निर्धारण एक ही बात नहीं है। किसी पक्ष के परिसर में मौजूद होने या पुलिस की मौजूदगी से उसके प्रबंधन संबंधी दावे की स्वतः पुष्टि नहीं होती। फिलहाल पुलिस की जांच में क्या प्रगति हुई है, कोई औपचारिक प्राथमिकी बाद में दर्ज की गई या नहीं और धर्मादाय आयुक्त कार्यालय ने दोनों गुटों के दावों पर क्या निर्णय लिया है—इन प्रश्नों के उत्तर के लिए आगे की आधिकारिक जानकारी आवश्यक है।

90 साल पुरानी शैक्षणिक विरासत पर संकट

लालबाग और परेल मुंबई के उन इलाकों में शामिल हैं, जहां लंबे समय से श्रमिक परिवारों, छोटे कारोबारियों और मध्यमवर्गीय परिवारों की बड़ी आबादी रहती आई है। ऐसे क्षेत्रों में पुराने विद्यालयों की भूमिका केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं होती। वे स्थानीय समुदाय की शैक्षणिक परंपरा और कई पीढ़ियों की स्मृतियों से भी जुड़े होते हैं। शिरोडकर विद्यालय की करीब नौ दशक पुरानी शैक्षणिक विरासत का उल्लेख ताजा रिपोर्टों में किया गया है। इस लंबे इतिहास के कारण प्रबंधन विवाद का महत्व और बढ़ जाता है। किसी संस्था का संचालन करने वाले पदाधिकारियों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन जब विवाद का असर विद्यालय के दरवाजों, सुरक्षा व्यवस्था और परीक्षा कार्यक्रम पर पड़ने लगे, तो विद्यार्थियों का हित सर्वोच्च प्राथमिकता बनना चाहिए।
विद्यालय के प्रबंधन से जुड़े विवाद का समाधान इस तरह होना चाहिए कि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। यदि प्रबंधन के अधिकार को लेकर कानूनी या प्रशासनिक प्रश्न हैं, तो उनका निपटारा संबंधित नियमों के अनुसार होना चाहिए। विद्यार्थियों को पक्षों के बीच विवाद का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए।

अभिभावकों को अब किन बातों पर स्पष्टता चाहिए?

इस घटनाक्रम के बाद अभिभावकों और विद्यार्थियों को विद्यालय प्रबंधन तथा संबंधित अधिकारियों से कुछ महत्वपूर्ण सवालों के स्पष्ट उत्तर मिलने चाहिए। सबसे पहले, 12 अक्टूबर से निर्धारित परीक्षाओं का वास्तविक कार्यक्रम क्या है? दूसरा, विद्यालय का दैनिक संचालन कौन-सा अधिकृत मंडल संभाल रहा है? तीसरा, विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है? चौथा, सीसीटीवी के डीवीआर को लेकर उठे आरोपों की जांच की स्थिति क्या है? और पांचवां, यदि प्रबंधन विवाद जारी रहता है, तो पढ़ाई और परीक्षाओं को बिना रुकावट जारी रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी? इन सवालों पर लिखित और आधिकारिक सूचना मिलने से अफवाहों को रोकने में मदद मिलेगी। अभिभावकों को भी अपुष्ट संदेशों या सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित दावों के आधार पर बच्चों की परीक्षा या विद्यालय की स्थिति के बारे में निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

विवाद से ज्यादा जरूरी बच्चों की पढ़ाई

मुंबई के लालबाग-परेल स्थित डॉ. शिरोडकर विद्यालय का मामला अब केवल दो प्रबंधन गुटों के बीच अधिकार की लड़ाई नहीं रह गया है। ताले तोड़े जाने, डीवीआर गायब होने के आरोप, पुलिस बंदोबस्त और अर्धवार्षिक परीक्षाओं को लेकर अनिश्चितता ने विद्यार्थियों तथा अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। मौजूदा जानकारी के आधार पर विद्यालय के स्थायी रूप से बंद होने की पुष्टि नहीं की जा सकती। लेकिन यह स्पष्ट है कि प्रबंधन विवाद ने शैक्षणिक माहौल को प्रभावित किया है और परीक्षा कार्यक्रम पर तत्काल स्पष्टता की जरूरत पैदा की है। दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जांच, विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना और परीक्षाओं का सुचारु आयोजन सुनिश्चित करना अब सबसे अहम कदम हैं। करीब 92 वर्षों की शैक्षणिक परंपरा वाले विद्यालय के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि प्रबंधन विवाद का असर बच्चों की शिक्षा पर न्यूनतम पड़े। संस्था पर अधिकार का फैसला संबंधित नियमों और प्रमाणित दस्तावेजों से होना चाहिए, जबकि विद्यार्थियों की पढ़ाई, सुरक्षा और परीक्षा संबंधी अधिकारों की रक्षा बिना किसी देरी के की जानी चाहिए।

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