मेवाड़ अंचल में अफीम की खड़ी फसल इन दिनों एक अनोखी लेकिन गंभीर समस्या से जूझ रही है। सैकड़ों की संख्या में तोते अफीम के खेतों पर झुंड बनाकर हमला कर रहे हैं, जिससे रोज़ाना करीब 2 लाख रुपये मूल्य की फसल नष्ट होने का दावा किया जा रहा है। अनुकूल मौसम से अच्छी पैदावार की उम्मीद लगाए किसानों के सामने अब भारी आर्थिक नुकसान की आशंका खड़ी हो गई है।

अफीम के खेत बने तोतों का ठिकाना, किसानों की बढ़ी परेशानी

मेवाड़ क्षेत्र में इन दिनों अफीम की फसल अपने संवेदनशील चरण में है, लेकिन खेतों में हर सुबह-शाम सैकड़ों तोतों का झुंड मंडराता दिखाई दे रहा है। किसान बताते हैं कि ये तोते सीधे अफीम के डोडों पर चोंच मारकर रस पी जाते हैं। इससे न सिर्फ डोडा खराब होता है, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी गिर जाती है।
किसानों के अनुसार, कई खेतों में रोज़ाना हजारों डोडे तोतों द्वारा नुकसानग्रस्त हो रहे हैं, जिससे कुल मिलाकर प्रतिदिन लगभग 2 लाख रुपये तक की फसल बर्बाद होने का अनुमान है। लगातार हो रहे नुकसान से किसान मानसिक तनाव में हैं और उनकी सालभर की मेहनत पर पानी फिरने का डर सता रहा है।

‘नशे की लत’ की चर्चा, उपाय बेअसर

क्षेत्र के किसानों में यह चर्चा आम है कि तोतों को अफीम के रस की आदत पड़ चुकी है। एक बार खेत में आने के बाद वे बार-बार वहीं लौटते हैं। पारंपरिक उपाय जैसे डराने के पुतले, टीन के ड्रम, पटाखे या शोर मचाने के तरीके अब असरदार साबित नहीं हो रहे।
कुछ किसानों ने खेतों में बर्ड नेट लगाई है, तो कई ने तेज आवाज वाले लाउड स्पीकर भी लगाए हैं, लेकिन बड़ी फसलों और खुले खेतों में इन उपायों से पूरी सुरक्षा संभव नहीं हो पा रही। किसानों का कहना है कि इतने बड़े क्षेत्र को ढकना महंगा भी है और तकनीकी रूप से भी कठिन।

बंपर पैदावार की उम्मीद, लेकिन खतरा बरकरार

इस वर्ष मौसम अफीम की खेती के लिए अनुकूल रहा है। ओलावृष्टि और पाले जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसल काफी हद तक बची रही, जिससे किसानों को बंपर पैदावार की उम्मीद है।
हालांकि, तोतों द्वारा हो रहे नुकसान ने इस उम्मीद पर सवालिया निशान लगा दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, डोडों को होने वाला नुकसान सीधे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है, जिससे सरकारी खरीद के दौरान किसानों को कम दाम मिलने की आशंका रहती है। किसानों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो अच्छी पैदावार के बावजूद मुनाफा नहीं मिल पाएगा।

राजस्थान में अफीम उत्पादन और सरकारी व्यवस्था

राजस्थान देश के उन प्रमुख राज्यों में शामिल है, जहां अफीम की खेती अधिसूचित (Notified) व्यवस्था के तहत की जाती है। राज्य में भीलवाड़ा, झालावाड़, कोटा, प्रतापगढ़, उदयपुर और बारां जिलों में अफीम की खेती होती है, जबकि चित्तौड़गढ़ और झालावाड़ मुख्य उत्पादन केंद्र माने जाते हैं।
अफीम की खेती नारकोटिक्स विभाग के कड़े नियंत्रण और लाइसेंस प्रणाली के तहत होती है। सरकारी दर पर अफीम डोडा लगभग 2500 रुपये प्रति किलोग्राम खरीदा जाता है, वहीं अवैध बाजार में इसके दाम 2 लाख रुपये प्रति किलोग्राम या उससे भी अधिक बताए जाते हैं। इस वर्ष बिना चीरा लगे अफीम डोडा की सरकारी खरीद की प्रक्रिया अप्रैल माह में शुरू हो रही है। झालावाड़ में 8 अप्रैल से, चित्तौड़गढ़ और प्रतापगढ़ के विभिन्न खंडों में 11 से 15 अप्रैल के बीच, भीलवाड़ा में 16 अप्रैल से तथा कोटा प्रभाग में 6 और 17 अप्रैल से खरीद केंद्रों पर तौल की जाएगी।
मेवाड़ में अफीम की खेती इस समय प्रकृति से नहीं, बल्कि तोतों के झुंड से जूझ रही है। यदि समय रहते प्रभावी समाधान नहीं निकला, तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब जरूरत है कि कृषि और वन विभाग मिलकर इस समस्या का स्थायी हल खोजें, ताकि किसानों की मेहनत सुरक्षित रह सके।

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