97% MBBS सीटें सेल्फ-फाइनेंस्ड कोटे के तहत खाली, तमिलनाडु और पुडुचेरी में सबसे अधिक प्रभावित

The CSR Journal Magazine
भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए हर साल लाखों छात्र NEET-UG परीक्षा में भाग लेते हैं। लेकिन इस बार MBBS में दाखिले की स्थिति काफी चौंकाने वाली रही है। सेल्फ-फाइनेंस्ड कोटे के तहत 97 प्रतिशत सीटें खाली रह गई हैं। यह स्थिति खासकर तमिलनाडु और पुडुचेरी में देखने को मिली है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि सेल्फ-फाइनेंस्ड कोटा क्या है और इसके कारण क्या हैं।

खाली सीटों की संख्या और कारण

NEET UG 2026 की मेडिकल काउंसलिंग में 946 MBBS सीटें खाली रह गईं, जिनमें से 920 सीटें सेल्फ-फाइनेंस्ड मेरिट कोटे की थीं। यह आंकड़ा दिखाता है कि कुल खाली सीटों का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा इसी कोटे का है। अन्य श्रेणियों जैसे ऑल इंडिया, ओपन सीट और NRI में केवल 26 सीटें ही खाली रहीं। यह स्थिति छात्रों के लिए चिंताजनक है, क्योंकि यह उनकी मेडिकल शिक्षा के अवसरों को प्रभावित कर सकती है।

सेल्फ-फाइनेंस्ड कोटे की फीस

सेल्फ-फाइनेंस्ड कोटा मुख्यतः प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में उन सीटों से जुड़ा है, जिनकी पढ़ाई का खर्च छात्रों की फीस से पूरा होता है। इन सीटों पर दाखिला मेरिट के आधार पर होता है, लेकिन फीस सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में अधिक होती है। इस कोटे के तहत एडमिशन लेने वाले छात्रों को आर्थिक रूप से बड़ा बोझ उठाना पड़ता है। कई बार छात्रों की अच्छी NEET रैंक होने के बावजूद वे इन सीटों पर दाखिले से पीछे हट जाते हैं।

तमिलनाडु और पुडुचेरी में सबसे ज्यादा खाली सीटें

खाली MBBS सीटों के मामले में तमिलनाडु और पुडुचेरी सबसे आगे हैं। इन दो राज्यों में 875 सीटें खाली रहीं, जो देशभर की कुल 946 खाली सीटों का लगभग 93 प्रतिशत हैं। तमिलनाडु में 688 और पुडुचेरी में 187 सीटें खाली थीं। उदाहरण के लिए, टीएन श्री सत्य साई मेडिकल कॉलेज में 188 सीटें और मीनाक्षी मेडिकल कॉलेज में 117 सीटें खाली रहीं।

महंगी फीस का प्रभाव

स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इन सीटों के खाली रहने का प्रमुख कारण महंगी फीस है। उत्तर भारत के कई छात्र दक्षिण भारत में पढ़ाई करने से हिचकिचाते हैं। भाषा और सांस्कृतिक अंतर जैसी चुनौतियां भी इस समस्या का हिस्सा हैं। ऐसे में छात्रों को सही जानकारी और मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

AIIMS के निदेशक की राय

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) दिल्ली के निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस को लेकर पारदर्शिता की आवश्यकता बताई है। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉलेजों को खाली सीटें भरने के लिए फीस कम करने पर विचार करना चाहिए। उनके अनुसार, कॉलेजों के खर्च का पारदर्शी आकलन होना चाहिए, ताकि छात्रों पर फीस का अनावश्यक बोझ न पड़े।

छात्रों के लिए क्या करें?

इस स्थिति में छात्रों को चाहिए कि वे अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करें और मेडिकल कॉलेजों के बारे में सही जानकारी प्राप्त करें। सेल्फ-फाइनेंस्ड कोटे की फीस और अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेना जरूरी है। छात्रों को यह समझना होगा कि मेडिकल शिक्षा एक महत्वपूर्ण निवेश है, लेकिन सही जानकारी के बिना यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

आगे का रास्ता

मेडिकल शिक्षा में खाली सीटों की समस्या को सुलझाने के लिए सभी पक्षों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। छात्रों, कॉलेजों और सरकारी अधिकारियों को एक साथ आकर इस मुद्दे का समाधान निकालना होगा। इससे न केवल छात्रों के लिए अवसर बढ़ेंगे, बल्कि देश में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता भी सुधरेगी।

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