भारत को आस्था और परंपराओं का देश कहा जाता है, जहां हर कोना किसी न किसी अनोखी मान्यता से जुड़ा है। लेकिन केरल के त्रिशूर जिले में स्थित कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर की परंपराएं जानकर अच्छे-अच्छे लोग हैरान रह जाते हैं। यह मंदिर न सिर्फ अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां निभाई जाने वाली अजीबोगरीब धार्मिक रस्में इसे दुनिया के सबसे रहस्यमयी देवी मंदिरों में शामिल करती हैं।
देवी को प्रसन्न करने का अनोखा तरीका
इस मंदिर में देवी भद्रकाली को प्रसन्न करने के लिए भक्ति का स्वरूप सामान्य नहीं है। यहां भक्त देवी के सामने अशिष्ट भाषा, गालियों और अभद्र गीतों का प्रयोग करते हैं। मान्यता है कि इससे देवी प्रसन्न होती हैं। यही नहीं, चढ़ावा भी देवी के चरणों में नहीं रखा जाता, बल्कि मूर्ति की ओर फेंककर अर्पित किया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और स्थानीय लोगों की गहरी आस्था से जुड़ी है।
भरणी उत्सव: जब मंदिर बन जाता है रणभूमि
कोडुंगल्लूर मंदिर का सबसे प्रसिद्ध पर्व है भरणी उत्सव, जो हर साल मार्च-अप्रैल के बीच मलयालम महीने ‘मीनम’ में मनाया जाता है। यह सात दिन तक चलने वाला उत्सव पूरे केरल में चर्चा का विषय रहता है। उत्सव के दौरान मंदिर परिसर में हर ओर उन्माद, नृत्य, शोर और भक्ति का विचित्र दृश्य देखने को मिलता है।

अपने ही खून से खेली जाती है ‘होली’
भरणी उत्सव की सबसे चौंकाने वाली परंपरा है खुद के खून से होली खेलना। कुछ श्रद्धालु उन्माद की अवस्था में अपने शरीर को हल्का सा घायल कर लेते हैं और बहते रक्त को देवी को अर्पित करते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से देवी उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि देती हैं। उत्सव के बाद मंदिर को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया जाता है ताकि परिसर की शुद्धि की जा सके।

लाठियों से पीटी जाती है मंदिर की छत
इस मंदिर में एक और अनोखी रस्म निभाई जाती है, जिसमें भक्त लाठियों से मंदिर की छत पर प्रहार करते हैं। यह परंपरा राक्षस दारुका के वध की स्मृति से जुड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि पहले तलवारों और हथियारों का प्रयोग होता था, लेकिन अब उनकी जगह लकड़ी की लाठियां इस्तेमाल की जाती हैं।
देवी का रौद्र रूप और रहस्यमयी मूर्ति
मंदिर में स्थापित मां भद्रकाली की मूर्ति आठ भुजाओं वाली है। उनके एक हाथ में राक्षस दारुका का सिर, दूसरे में तलवार, घंटी, अंगूठी और अन्य अस्त्र-शस्त्र हैं। यह मूर्ति देवी के रौद्र और उग्र स्वरूप को दर्शाती है। स्थानीय लोग उन्हें स्नेह से ‘कोडुंगल्लूर अम्मा’ कहते हैं। यह मंदिर मालाबार के 64 भद्रकाली मंदिरों में प्रमुख माना जाता है।
मंदिर का प्राचीन इतिहास
मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर पहले भगवान शिव को समर्पित था। बाद में परशुराम ने यहां मां भद्रकाली की मूर्ति स्थापित की। कहा जाता है कि चेरा साम्राज्य के महान राजा चेरन चेंकुट्टुवन ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। यही नहीं, प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलप्पथिकारम की नायिका कन्नकी के इस मंदिर में देवी में विलीन होने की कथा भी प्रचलित है।
बलि प्रथा से लाल धोती तक
प्राचीन काल में इस मंदिर में बकरियों और पक्षियों की बलि दी जाती थी। हालांकि, सामाजिक सुधार आंदोलनों और सरकारी आदेश के बाद पशु बलि पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। अब देवी को लाल रंग की धोती, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं अर्पित की जाती हैं, जो बलि का प्रतीक मानी जाती हैं।


