कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में 20 जनवरी को 25 वर्षीय पीएचडी छात्र रामस्वरूप इशराम ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। वह संस्थान की छठी मंजिल से कूदे, जहां वे अपने परिवार के साथ रहते थे। इशराम राजस्थान के चुरू जिले के रहने वाले थे और अर्थ साइंसेज विभाग में शोधरत थे। एक महीने के भीतर यह IIT कानपुर में छात्र की दूसरी आत्महत्या थी। इससे पहले 29 दिसंबर को बीटेक फाइनल ईयर के जय सिंह मीणा ने भी ऐसा कदम उठाया था।
आईआईटी में आत्महत्या के मामले बढ़े
आईआईटी के पूर्व छात्रों के एक समूह द्वारा संकलित किए गए उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच देश के विभिन्न IIT परिसरों में लगभग 65 छात्रों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। इनमें से करीब 30 घटनाएं पिछले दो वर्षों के दौरान दर्ज की गईं। आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में IIT कानपुर में 9, IIT खड़गपुर में 7 और IIT बॉम्बे में 1 मामला दर्ज हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ रहे छात्रों के सामने मौजूद शैक्षणिक दबाव और मानसिक तनाव की गंभीरता की ओर इशारा करते हैं।
15-29 साल: आत्महत्या का सबसे संवेदनशील आयु वर्ग
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत में 2023 में छात्रों की 13,000 से अधिक आत्महत्या की घटनाएं दर्ज हुईं। विशेष रूप से 15 से 29 साल की आयु में यह समस्या सबसे गंभीर है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण केवल पढ़ाई का तनाव नहीं, बल्कि अकेलापन, लगातार मूल्यांकन, कंपटीशन और कुछ मामलों में जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया कदम
मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने IIT दिल्ली में दो छात्रों की मौत के मामलों में FIR दर्ज करने का आदेश दिया। अदालत ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की आत्महत्याओं के मामलों पर निगरानी बढ़ाने के लिए नेशनल टास्क फोर्स (NTF) का गठन किया। एनटीएफ की रिपोर्ट में सामने आया कि 65% संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य की सुविधा मौजूद नहीं थी। अदालत ने यह भी कहा कि छात्रों की आत्महत्याओं की जानकारी तुरंत पुलिस को दी जाए।
सरकार और संस्थानों की तैयारी
केंद्र सरकार ने IIT कानपुर में छात्रों की बढ़ती आत्महत्याओं की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई है। इसमें मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, शिक्षा मंत्रालय के अधिकारी और NTF के सदस्य शामिल हैं। कमेटी को सुझाव देने और 15 दिनों में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने 2022 में ‘राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति’ भी घोषित की थी, जिसका लक्ष्य 2030 तक आत्महत्या दर में 10% कमी लाना है।
आईआईटी में सुधार के लिए दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा संस्थानों को कई नियमों का पालन करने के लिए कहा है। इसमें रैगिंग रोकने, यौन उत्पीड़न से सुरक्षा, स्टूडेंट्स की शिकायत निवारण प्रणाली और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन सुनिश्चित करना शामिल है। अदालत ने 24 घंटे योग्य मेडिकल सुविधा और समय पर फैकल्टी भर्ती सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया।
विशेषज्ञों की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों के खतरे के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना सबसे बड़ा कारण है। संस्थान केवल गंभीर स्थिति में ही हस्तक्षेप करते हैं। इससे बचने के लिए छात्रों, परिवार और संस्थानों को मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर ध्यान देना होगा।
देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत कारणों का परिणाम भी है। सरकार, सुप्रीम कोर्ट और संस्थानों की कोशिशें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब मानसिक स्वास्थ्य, सहयोग और समर्थन को प्राथमिकता दी जाएगी।
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