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February 7, 2026

मधुमक्खियों के हमले से बच्चों को बचाते हुए शहीद हुईं कंचन बाई, रानपुर गांव की ‘मां’ ने दी मिसाल

The CSR Journal Magazine
मध्य प्रदेश के नीमच ज़िले के रानपुर गांव में मधुमक्खियों के अचानक हुए हमले के दौरान आंगनबाड़ी सहायिका कंचन बाई ने अपनी जान की परवाह किए बिना 20–25 बच्चों को बचाया। बच्चों को ढकते और सुरक्षित स्थान पर ले जाते समय वह खुद गंभीर रूप से घायल हो गईं और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। उनकी बहादुरी ने पूरे गांव को झकझोर दिया है।

आंगनबाड़ी में गूंजी चीखें, हिम्मत बनकर आगे आईं कंचन बाई

सोमवार दो फरवरी की दोपहर नीमच ज़िले के जावद थाना क्षेत्र के रानपुर गांव में स्थित आंगनबाड़ी परिसर में अचानक अफ़रा-तफ़री मच गई। करीब साढ़े तीन बजे आंगनबाड़ी के आसपास मौजूद बच्चों पर मधुमक्खियों का एक बड़ा झुंड टूट पड़ा। उस समय परिसर में लगभग 20 से 25 बच्चे मौजूद थे, जिनमें प्राथमिक स्कूल के बच्चे भी शामिल थे।
जहां रोज़ बच्चों की हंसी-खुशी गूंजती थी, वहां अचानक चीख-पुकार सुनाई देने लगी। इसी दौरान 55 वर्षीय आंगनबाड़ी सहायिका कंचन बाई ने हालात की गंभीरता को समझा और बिना एक पल गंवाए बच्चों की ओर दौड़ पड़ीं।

दरियां, कंबल और साड़ी से ढककर बचाई 25 जिंदगियां

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मधुमक्खियां सीधे बच्चों पर हमला कर रही थीं। कंचन बाई ने बच्चों को अंदर की ओर ले जाना शुरू किया। उन्होंने आंगनबाड़ी में मौजूद दरियां और कंबल निकालकर बच्चों को ढका और फिर अपनी साड़ी से उन्हें बचाने की कोशिश की।
स्कूल की शिक्षिका गुणसागर जैन बताती हैं कि उस वक्त पूरा माहौल भयावह हो गया था, लेकिन कंचन बाई ने अद्भुत साहस दिखाया। उनके इस कदम से लगभग 25 बच्चों की जान बच गई, जिनमें उनका अपना पोता भी शामिल था। हालांकि बच्चों को बचाते-बचाते कंचन बाई खुद मधुमक्खियों के हमले में बुरी तरह घायल हो गईं।

अस्पताल पहुंचने से पहले मौत

गंभीर हालत में कंचन बाई को सरवानिया महाराज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। नीमच के पुलिस अधीक्षक अंकित जायसवाल ने बताया कि मधुमक्खियों के हमले के दौरान बच्चों को बचाने की कोशिश में कंचन बाई की जान चली गई।
डॉक्टरों के मुताबिक, मधुमक्खियों के कई डंक लगने से एनाफ़िलेक्टिक शॉक आ सकता है, जो बेहद जानलेवा होता है।
गांव के लोग एक सुर में कहते हैं “अगर कंचन बाई ने हिम्मत न दिखाई होती, तो न जाने कितने बच्चे मारे जाते।” गांव के लिए वह सिर्फ़ एक आंगनबाड़ी सहायिका नहीं, बल्कि भरोसे और सुरक्षा की प्रतीक थीं।

परिवार शोक में, आर्थिक संकट गहराया

कंचन बाई के परिवार में पति शिवलाल, बेटा रवि मेघवाल और पोता है। पति कुछ साल पहले लकवाग्रस्त हो गए थे और लंबे समय से बिस्तर पर हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी कंचन बाई पर ही थी।
बेटे रवि कहते हैं कि पिता के इलाज में अब तक पांच से छह लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, जिसके लिए ज़मीन तक बेचनी पड़ी। आज भी हर महीने दवाइयों पर हज़ारों रुपये खर्च होते हैं।
रवि भावुक होकर कहते हैं, “मां पर गर्व है। उन्होंने बच्चों को हमेशा भगवान का रूप माना। उन्होंने इस काम को कभी नौकरी नहीं समझा, बल्कि अपना धर्म माना।”
गांव के सरपंच लालाराम रावत ने परिवार को सहायता देने और सरकार से आर्थिक मदद व बेटे के रोज़गार के लिए सिफ़ारिश करने का भरोसा दिया है।
कंचन बाई की शहादत ने रानपुर गांव को गहरे शोक में डुबो दिया है। उनकी कहानी सिर्फ़ बहादुरी की नहीं, बल्कि उस निस्वार्थ सेवा की है, जिसमें एक महिला ने बच्चों की जान बचाने के लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी।

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