जम्मू-कश्मीर में शराब पर बवाल: धर्म और मजहब के मुद्दे में उलझा मामला

The CSR Journal Magazine
जम्मू-कश्मीर में धार्मिक संगठनों का शराब की दुकानों के विस्तार के खिलाफ जोरदार विरोध चल रहा है। सिख और इस्लामी समूहों ने मिलकर पूर्ण शराबबंदी की मांग की है। ऐसा तब हो रहा है जब नेशनल कांफ्रेंस के विधायक हसनैन मसूदी ने शराब की दुकानों के फायदों की चर्चा की थी। इसके बाद मीरवाइज-ए-कश्मीर के डॉ. मौलवी उमर फारूक ने सरकार से अपील की कि शराब के लाइसेंस बढ़ाने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए। धार्मिक संगठनों ने कठुआ और आरएस पुरा में धरने प्रदर्शन किए।

राज्यों की धूमिल कमाई का मुख्य कारण?

राज्य सरकार को शराब की दुकानों से मिलने वाली आमदनी बेहद आकर्षक लगती है। यही कारण है कि रिहायशी क्षेत्रों और धार्मिक स्थल के पास शराब की दुकानों का विस्तार हो रहा है। हालांकि, सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि नई दुकानों का खोलना उनके कार्यक्रम में नहीं है, फिर भी चर्चाओं के दौर में यह बात उभरकर आई है कि जम्मू-कश्मीर में शराब एक प्रमुख आर्थिक स्रोत बन चुकी है, खासकर जब पर्यटन उद्योग से कमाई बढ़ती है।

अस्तित्व के खिलाफ प्रतिरोध की लहर

पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य में 83 नए शराब लाइसेंस जारी किए गए थे, जिसके बाद से विरोध और भी तेज हो गया। विधायक मसूदी ने कहा था कि अगर शराब की दुकानों को लाइसेंस नहीं दिए गए, तो मनमाने तरीके से नकली शराब का कारोबार बढ़ सकता है। इस पर मत्थे हुए मुत्तहिदा मजलिस उलेमा (MMU) ने तिरस्कार करते हुए कहा कि इस्लाम में शराब को गुनाह समझा जाता है।

समाज पर शराब का प्रभाव

मौलवी उमर ने कहा कि शराब का सेवन परिवारों में क्लेश और अपराधों को बढ़ाता है। उनके अनुसार, राज्य में शराब की दुकानों का बढ़ता विस्तार समाज की नैतिकता को प्रभावित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या Jammu-Kashmir में भविष्य में डांस बार भी खोले जाएंगे, जैसे कि शराब की दुकानों का विस्तार हो रहा है।

धर्मी दृष्टिकोण और विरोध के कारण

इस विवाद की जड़ें धार्मिक आस्थाओं में हैं। जम्मू-कश्मीर मुस्लिम जनसंख्या बहुल क्षेत्र है और यहां शराब पीना इस्लाम में ‘शैतान का काम’ माना गया है। इसके विपरीत, कुछ अन्य धर्मों में शराब को विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा माना जाता है।

दैहिक दुविधा और क्षेत्रीय परंपराएं

कई धर्मों में शराब के प्रति विभिन्न दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। जैसे कि जैन, सिख और कुछ हिंदू संप्रदायों में इसे वर्जित माना गया है। वहीं यहूदियों और ईसाइयों में इसे अनुकूल माना गया है। बौद्ध धर्म में भी नशीली सामग्रियों पर रोक है, लेकिन कई स्थानों पर इसके आचरण देखे जाते हैं। इस प्रकार, समाज में शराब को लेकर एक वैविध्य पाया जाता है।

अर्थशास्त्र और धर्म एक साथ?

शराब पर रोक लगाने के लिए धार्मिक अपीलों का सहारा लेना सही नहीं लगता। जब धर्म के आधार पर किसी चीज़ को सही या गलत ठहराया जाता है, तब तर्क से दूर होकर हीनता का अनुभव होता है। यही कारण है कि कुछ जगहों पर शराब की दुकानों के खुलने और उसके विरोध में यह चर्चाएं हो रही हैं।

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