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February 19, 2026

‘चिकन नेक’ से ब्रह्मपुत्र तक ज़मीन के नीचे भारत की रणनीतिक रेल-सुरंग क्रांति

The CSR Journal Magazine
पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले बेहद संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, में भारत सरकार 35.76 किमी लंबी भूमिगत रेलवे सुरंग बनाने की तैयारी में है। इसके साथ ही असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे रेल और सड़क की दोहरी सुरंग परियोजना को भी मंजूरी मिल चुकी है। दोनों परियोजनाएं सामरिक सुरक्षा, सैन्य परिवहन और क्षेत्रीय विकास की दृष्टि से ऐतिहासिक मानी जा रही हैं।

क्या है ‘चिकन नेक’ और क्यों है इतना अहम?

‘चिकन नेक’ के नाम से मशहूर सिलीगुड़ी कॉरिडोर पश्चिम बंगाल में स्थित वह संकरा भू-भाग है जिसकी औसत चौड़ाई लगभग 20–22 किलोमीटर है। यही गलियारा पूर्वोत्तर भारत को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र स्थलीय मार्ग है। इसके दक्षिण में बांग्लादेश, उत्तर में चीन (तिब्बत क्षेत्र) और पश्चिम में नेपाल की सीमाएँ लगती हैं। इस वजह से यह कॉरिडोर न केवल भौगोलिक बल्कि सैन्य दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील है। यात्रियों, रोज़मर्रा के सामान, पेट्रोलियम पाइपलाइन, बिजली लाइनों से लेकर सेना के जवानों और हथियारों तक की आवाजाही इसी रास्ते से होती है।

भूमिगत रेलवे लाइन अदृश्य लेकिन प्रभावी

इस रणनीतिक क्षेत्र में 35.76 किमी लंबी भूमिगत रेलवे लाइन बिछाने की योजना लगभग तैयार है। यह लाइन पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर ज़िले के तीन माइल हाट से शुरू होकर रांगापानी और बागडोगरा तक जाएगी। यह परियोजना पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे की निगरानी में पूरी होगी। दो समानांतर सुरंगों का निर्माण अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीनों से किया जाएगा। अनुमानित लागत लगभग 12,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ज़मीन के ऊपर नई लाइन बनाना यहाँ कठिन है, क्योंकि यह इलाका घनी आबादी और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के बेहद करीब है। भूमिगत लाइन किसी भी हमले, प्राकृतिक आपदा या अवरोध की स्थिति में निर्बाध रेल संपर्क बनाए रखेगी।

सैन्य दृष्टि से क्यों ज़रूरी है यह परियोजना?

सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, चिकन नेक पर संभावित खतरा भारत के लिए हमेशा चिंता का विषय रहा है। किसी भी युद्ध या मिसाइल हमले की स्थिति में यदि सतही मार्ग क्षतिग्रस्त होता है, तो भूमिगत रेलवे संपर्क को सुरक्षित रखा जा सकता है। पूर्व सैनिक अधिकारियों का कहना है कि इस सुरंग की दीवारें मोटी कंक्रीट परत से बनाई जाएंगी, जिससे यह उच्च तीव्रता वाले हमलों को भी झेल सके। इसके जरिए सेना के जवानों और सैन्य साजो-सामान की तेज और सुरक्षित तैनाती संभव होगी। बागडोगरा हवाई अड्डा और भारतीय सेना का 33 कोर मुख्यालय इस प्रस्तावित मार्ग के पास स्थित है, जिससे रेलवे और हवाई परिवहन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकेगा।

ब्रह्मपुत्र के नीचे देश की पहली रेल-सड़क सुरंग

14 फरवरी को आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे रेल और सड़क सुरंग परियोजना को मंजूरी दी। यह परियोजना गोहपुर को नुमलीगढ़ से जोड़ेगी। कुल लंबाई 33.7 किमी होगी, जिसमें 16.79 किमी हिस्सा नदी के नीचे से गुज़रेगा। इसमें दो समानांतर चार-लेन सुरंगें बनेंगी एक में ट्रेन चलेगी और दूसरी में सड़क वाहन। फिलहाल नुमलीगढ़ और गोहपुर के बीच 240 किमी की दूरी तय करने में लगभग छह घंटे लगते हैं। इस सुरंग के बनने से दूरी और समय दोनों में भारी कमी आएगी।

चीन सीमा और वायुसेना की रणनीति

असम और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। तेजपुर स्थित वायुसेना अड्डे पर भारतीय वायुसेना के सुखोई लड़ाकू विमानों का बेड़ा तैनात है। जनवरी में सरकार ने इस एयरबेस के विस्तार के लिए लगभग 383 एकड़ भूमि अधिग्रहण की घोषणा की थी। नई सुरंग परियोजना से तेजपुर और ईटानगर हवाई अड्डों के बीच संपर्क और मजबूत होगा। चीन सीमा की निकटता को देखते हुए तेज, सुरक्षित और हर मौसम में काम करने वाली कनेक्टिविटी राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता बन चुकी है।

क्षेत्रीय विकास और आर्थिक लाभ

रणनीतिक महत्व के अलावा इन परियोजनाओं का आर्थिक असर भी व्यापक होगा। बेहतर कनेक्टिविटी से असम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश में व्यापार, पर्यटन और उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। विश्वनाथ घाट और तेजपुर के बीच अंतरदेशीय जलमार्ग संपर्क बेहतर होगा। इससे पूर्वोत्तर के उत्पादों को राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंचाने में आसानी होगी। विश्लेषकों का मानना है कि चिकन नेक और ब्रह्मपुत्र सुरंगें मिलकर पूर्वोत्तर को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित होंगी। ये परियोजनाएं केवल परिवहन के साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा कवच और आर्थिक उन्नति की नई रीढ़ मानी जा रही हैं।
चिकन नेक कॉरिडोर में भूमिगत रेलवे और ब्रह्मपुत्र के नीचे दोहरी सुरंग परियोजना भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाती है। बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में यह कदम न केवल पूर्वोत्तर की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि विकास की नई धारा भी प्रवाहित करेगा। आने वाले वर्षों में ये परियोजनाएं भारत की सामरिक मजबूती और क्षेत्रीय संतुलन की आधारशिला साबित हो सकती हैं।

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