देशभर में टैक्स चोरी और बोगस डोनेशन के खिलाफ आयकर विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दो राजनीतिक दलों के ठिकानों पर छापेमारी की है। जांच में सामने आया है कि बीते तीन साल में करीब 500 करोड़ रुपये के फर्जी चंदे के जरिए टैक्स छूट का गलत फायदा उठाया गया, जिसे कमीशन काटकर नकद में लौटाया गया।
150 से ज्यादा ठिकानों पर एकसाथ छापेमारी
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के निर्देश पर 14 जुलाई से आयकर विभाग की अन्वेषण शाखा ने देशव्यापी कार्रवाई शुरू की। इस अभियान के तहत 150 से अधिक ठिकानों पर एक साथ तलाशी ली गई।
राजस्थान के भीलवाड़ा, मध्यप्रदेश के आलीराजपुर और महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित दो राजनीतिक दलों से जुड़े करीब 10 ठिकानों पर छापे मारे गए। इन छापों का उद्देश्य टैक्स बचाने के लिए किए जा रहे बोगस डोनेशन और फर्जी इनकम टैक्स छूट के नेटवर्क को उजागर करना था।
अधिकारियों के मुताबिक, यह कार्रवाई लंबे समय से चल रही खुफिया जानकारी और वित्तीय लेन-देन के विश्लेषण के आधार पर की गई।

दो राजनीतिक दलों पर गंभीर आरोप
जांच में जिन राजनीतिक दलों के नाम सामने आए हैं, उनमें मध्यप्रदेश की भारतीय सामाजिक पार्टी और महाराष्ट्र की युवा भारत आत्मनिर्भर दल शामिल हैं। आयकर विभाग का दावा है कि इन दोनों दलों ने बड़े पैमाने पर बोगस डोनेशन स्वीकार किए।
जांच में सामने आया कि दानदाताओं से चेक या ऑनलाइन माध्यम से चंदा लिया गया, ताकि वे आयकर अधिनियम के तहत टैक्स छूट का लाभ उठा सकें। इसके बाद डोनेशन की राशि में से कुछ प्रतिशत कमीशन काटकर बाकी रकम नकद में दानदाताओं को वापस लौटा दी गई।
अधिकारियों के अनुसार, यह राशि राजनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल नहीं हुई, बल्कि टैक्स चोरी का जरिया बनी। खासतौर पर राजस्थान के भीलवाड़ा समेत कई शहरों से इन दलों को भारी मात्रा में चंदा दिखाया गया।
संगठित गिरोह चला रहा था फर्जी टैक्स छूट का खेल
आयकर विभाग की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि इस पूरे मामले के पीछे एक संगठित गिरोह सक्रिय था।
इसमें आईटीआर फाइल करने वाले एजेंट, बिचौलिए, चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और टैक्स सलाहकार शामिल थे।
ये लोग करदाताओं को फर्जी छूट दिलाने के लिए नकली दस्तावेज तैयार करते थे। फर्जी मेडिकल खर्च, बच्चों की ट्यूशन फीस, मकान किराया भत्ता (HRA) और राजनीतिक डोनेशन की झूठी रसीदें बनाकर टैक्स रिटर्न में गलत दावे किए जाते थे।
राजनीतिक दलों के नाम पर दिखाए गए इन डोनेशन का इस्तेमाल केवल कागजों में टैक्स बचाने के लिए किया गया, जबकि असल में पैसा नकद में वापस लौटाया जाता था।


