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February 21, 2026

बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सिंगल मदर को मिला पूर्ण अभिभावक का दर्जा

The CSR Journal Magazine
बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसमें रेप पीड़िता मां की याचिका पर सुनवाई की गई। कोर्ट ने कहा कि एक सिंगल मदर को उसके बच्चे का पूर्ण अभिभावक मानना न केवल न्याय संगत है, बल्कि यह संविधान की भावना के अनुरूप भी है। जस्टिस विभा कांकणवाड़ी और जस्टिस हितेन वेणुगावकर की बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी ऐसे पिता से बच्चे की पहचान कैसे जोड़ी जाए जो उसके जीवन में मौजूद नहीं है।

स्कूल रिकॉर्ड में बदलाव की जरूरत

इस मामले में मां का दावा था कि बच्ची के पिता का नाम स्कूल रिकॉर्ड से हटाया जाए, क्योंकि डीएनए टेस्ट से यह सिद्ध हो चुका है कि वह बच्ची के जैविक पिता हैं, लेकिन उन्होंने बच्चे से अलग रहने का निर्णय लिया। इससे पहले स्कूल ने रिकॉर्ड में बदलाव करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद यह मामला न्यायालय पहुंचा। कोर्ट ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं और इन्हें समय के साथ सही और अपडेटेड रखना आवश्यक है।

सिंगल मदर्स के अधिकारों की पहचान

जजों ने कहा कि उन माताओं के अधिकारों को मान्यता दी जानी चाहिए जो अपने बच्चों की परवरिश अकेले कर रही हैं। कोर्ट ने ये भी कहा कि यह प्रशासन का कर्तव्य है कि ऐसे मामलों में सिंगल मदर्स को समर्थन दिया जाए। इस निर्णय से न केवल इस मां को बल्कि सभी सिंगल मदर्स को एक सकारात्मक संदेश गया है।

जाति प्रमाणन पर अदालत की राय

कोर्ट ने जाति को लेकर भी कुछ महत्वपूर्ण बातें कीं। बेंच ने कहा कि स्कूल जाति प्रमाणन की संस्था नहीं है और जाति बदलने की अपील को ऐसे ही मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए और इसलिए किसी बच्चे को उसके पिता से अलग रखने का भी अधिकार है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि रिकॉर्ड में सुधार आवश्यक है ताकि वर्तमान सामाजिक और कानूनी स्थिति को सही तरीके से दर्शाया जा सके।

बच्चे की भलाई में सर्वोच्चता

कोर्ट ने निर्णय में कहा कि बच्चे की भलाई हमेशा सर्वोपरि होनी चाहिए। जजों ने जाति प्रमाणपत्र के दुरुपयोग की संभावनाओं और उसके असर पर गंभीरता से विचार किया। उन्होंने कहा कि जो प्रक्रियाएं अपनाई जाएंगी, उनमें ईमानदारी बरकरार रहनी चाहिए, ताकि बच्चे का हित भी सुनिश्चित हो सके। यह फैसला न सिर्फ इस मामले के लिए, बल्कि सभी सिंगल मदर्स के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर आया है।

अभिभावक का दर्जा संजीवनी

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि कानून सिंगल मदर्स के प्रति संवेदनशील है। इससे औरंगाबाद की सिंगल मदर को न केवल न्याय मिला, बल्कि समाज में उनकी भूमिका को भी एक नई पहचान मिली। ऐसे फैसलों से यह साबित होता है कि न्यायालय की नज़रों में हर माता-पिता का अभिभावक होने का हक समान है। इस निर्णय ने सिंगल मदर्स को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया है और उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने का एक नया रास्ता प्रशस्त किया है।

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