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March 16, 2026

एक ही तिथि पर क्यों मनते हैं ये तीन नववर्ष गुढी पड़वा, उगादी और चेती चांद, क्या है अर्थ और फर्क? जानिए अनोखी परंपराएं

The CSR Journal Magazine
भारत में चैत्र मास की शुरुआत के साथ कई समुदाय अपने-अपने तरीके से नए साल का स्वागत करते हैं। महाराष्ट्र में गुढी पड़वा, दक्षिण भारत में उगादी, और सिंधी समुदाय में चेती चांद के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। तीनों त्योहार अलग-अलग परंपराओं से जुड़े हैं, लेकिन इनका मूल संदेश एक ही है—नई शुरुआत, समृद्धि और खुशहाली। 2026 में गुढी पड़वा, उगादी और कई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला हिंदू नववर्ष 19 मार्च को मनाया जाएगा।

गुढी पड़वा: मराठी नववर्ष की शुरुआत

गुढी पड़वा मुख्य रूप से महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में मनाया जाता है और इसे मराठी नववर्ष की शुरुआत माना जाता है। “गुढी” शब्द का अर्थ ध्वज या विजय पताका से है, जबकि “पड़वा” का मतलब चंद्र मास की पहली तिथि से होता है।
इस दिन घरों के बाहर बांस की डंडी पर रेशमी कपड़ा, फूल, आम और नीम के पत्तों से सजाकर गुढी स्थापित की जाती है। इसे जीत, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन सृष्टि की रचना करने वाले Brahma ने ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए इसे नई शुरुआत का शुभ दिन माना जाता है। लोग इस दिन घरों को सजाते हैं, रंगोली बनाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और पारंपरिक भोजन का आनंद लेते हैंI

उगादी: नए युग की शुरुआत का प्रतीक

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में उगादी को हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। “उगादी” शब्द संस्कृत के “युग” और “आदि” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—नए युग की शुरुआत।
इस दिन लोग सुबह स्नान कर नए कपड़े पहनते हैं और घरों को आम के पत्तों और फूलों से सजाते हैं। घर के सामने सुंदर रंगोली बनाई जाती है। मंदिरों में पूजा के बाद लोग पंचांग श्रवणम् सुनते हैं, जिसमें आने वाले वर्ष की भविष्यवाणियां बताई जाती हैं।
उगादी का सबसे खास हिस्सा “उगादी पचड़ी” नामक व्यंजन है। इसमें मीठा, खट्टा, कड़वा, नमकीन और तीखा—जीवन के छह स्वाद शामिल होते हैं। यह जीवन के अलग-अलग अनुभवों का प्रतीक माना जाता है।

चेती चांद: सिंधी नववर्ष और झूलेलाल जयंती

सिंधी समुदाय के लिए चेती चांद नए साल की शुरुआत के साथ-साथ Jhulelal की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। “चेती” का अर्थ चैत्र महीना और “चांद” का अर्थ चंद्रमा होता है।
इस दिन भक्त झूलेलाल की पूजा करते हैं और “बेहराना साहिब” नामक विशेष अनुष्ठान करते हैं। इसमें दीपक, इलायची, मिश्री, फल और कलश से सजाया गया प्रसाद शामिल होता है। बाद में इसे नदी या जलाशय में विसर्जित किया जाता है और Varuna से आशीर्वाद मांगा जाता है।
मान्यता है कि सिंधी लोगों की प्रार्थना पर जल देवता Varuna के आशीर्वाद से झूलेलाल का जन्म हुआ था, जिन्होंने लोगों की रक्षा की। सिंधी समाज इस अवसर पर शोभायात्राएं निकालता है, भजन-कीर्तन करता है और पारंपरिक व्यंजन जैसे ताहिरी और साईं भाजी का आनंद लेता है।

अलग परंपराएं, एक ही संदेश

हालांकि गुढी पड़वा, उगादी और चेती चांद अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में मनाए जाते हैं, लेकिन इनका संदेश समान है—नई उम्मीद, नई शुरुआत और खुशहाल जीवन की कामना। यही विविधता भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को और भी खास बनाती है।
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