नक्सलवाद पर सरकार का दावा ‘लगभग खत्म’ जमीनी हकीकत क्या कहती है

The CSR Journal Magazine
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में दावा किया है कि देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है और 31 मार्च 2026 तक इसे पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। हालांकि विपक्ष और विशेषज्ञ इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं। बस्तर समेत प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा हालात भले बदले हों, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।

सरकार का दावा ‘नक्सलवाद अब अंतिम दौर में’

लोकसभा में बयान देते हुए अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद अब लगभग खत्म हो चुका है और यह किसी आर्थिक या विकास की समस्या नहीं, बल्कि एक विचारधारा से जुड़ा मुद्दा है। सरकार के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा और विकास दोनों मोर्चों पर बड़े बदलाव हुए हैं। देशभर में सैकड़ों नए पुलिस स्टेशन, हजारों किलोमीटर सड़कें और मोबाइल टावर स्थापित किए गए हैं। सरकार का कहना है कि बस्तर जैसे इलाकों में अब स्कूल, राशन दुकानें और प्रशासनिक पहुंच तेजी से बढ़ी है।

बस्तर में बदला समीकरण ऑपरेशन और बड़ी सफलताएं

2024 के बाद से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा अभियानों की तीव्रता काफी बढ़ाई गई। इन अभियानों में सुरक्षाबलों को नई तकनीक, बेहतर खुफिया नेटवर्क और अधिक स्वतंत्रता दी गई। इन दो वर्षों में सैकड़ों माओवादी मारे गए, हजारों गिरफ्तार हुए और बड़ी संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया। सरकार के अनुसार, शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा झटका लगा है, जिससे संगठन की संरचना कमजोर हुई है। कई बड़े नेताओं के मारे जाने या सरेंडर करने को निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।

विपक्ष के सवाल क्या वाकई सब सामान्य?

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार के दावों को चुनौती देते हुए कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ प्रयासों में राज्य सरकारों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं महुआ मोइत्रा ने लोकसभा में सवाल उठाया कि अगर नक्सलवाद खत्म हो चुका है, तो बस्तर में अब भी भारी संख्या में सुरक्षा बल क्यों तैनात हैं।
विपक्ष का कहना है कि सरकार जमीनी स्थिति को लेकर पूरी सच्चाई सामने नहीं रख रही।

इतिहास नक्सलबाड़ी से ‘रेड कॉरिडोर’ तक

भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत नक्सलबाड़ी से 1967 में हुई थी। यह आंदोलन धीरे-धीरे बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ तक फैल गया। 2004 में कई संगठनों के विलय से सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ, जिसने इसे संगठित रूप दिया। छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र लंबे समय तक इस आंदोलन का सबसे मजबूत गढ़ बना रहा, जहां घने जंगल और सीमित सरकारी पहुंच ने माओवादियों को बढ़त दी।

आगे की चुनौती पुनर्वास, भरोसा और विकास

विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर पड़ा हो, लेकिन सरकार के सामने असली चुनौती अब शुरू होती है। हजारों आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों का पुनर्वास, उन्हें समाज में स्वीकार्यता दिलाना और स्थायी रोजगार देना आसान नहीं है। इसके अलावा, स्थानीय आदिवासी समुदायों में जमीन और संसाधनों को लेकर आशंकाएं भी बनी हुई हैं। अगर विकास योजनाएं संतुलित और संवेदनशील नहीं रहीं, तो असंतोष फिर से उभर सकता है। सबसे बड़ी चुनौती उन क्षेत्रों में भरोसा कायम करना है, जहां अब पहली बार राज्य की मौजूदगी मजबूत हुई है।
सरकार के दावों के मुताबिक नक्सलवाद अब कमजोर जरूर पड़ा है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी हो सकती है। जमीन पर स्थायी शांति के लिए सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक विश्वास बहाली भी उतनी ही जरूरी है।

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