गोदावरी में प्रदूषण का खतरा बढ़ा, पानी में ऑक्सीजन खत्म; कुंभ मेले से पहले बढ़ी चिंता 

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सीवेज प्रदूषण ने बढ़ाई प्रशासन की चुनौती, तीन जगह ऑक्सीजन शून्य, तपोवन में BOD 85; कुंभ मेले से पहले क्या साफ हो पाएगी गोदावरी?

महाराष्ट्र की प्रमुख नदियों में शामिल गोदावरी के प्रदूषण को लेकर बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) की ओर से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में नासिक के तीन प्रमुख स्थानों पर पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर शून्य पाया गया। वहीं, तपोवन में गोदावरी और कपिला नदियों के संगम पर जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) 85 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई। पानी की गुणवत्ता से जुड़े इन आंकड़ों ने नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य, जलीय जीवों के अस्तित्व और लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि नासिक में गोदावरी के घाट धार्मिक गतिविधियों और आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले की तैयारियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में नदी के पानी में प्रदूषण का इतना अधिक स्तर सामने आना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। नदी को स्वच्छ बनाने के लिए चल रही योजनाओं, सीवेज के उपचार और प्रदूषण पर नियंत्रण की व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

तीन स्थानों पर घुली हुई ऑक्सीजन शून्य

रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल की नासिक स्थित प्रयोगशाला ने 5 अक्टूबर 2026 को गोदावरी नदी के अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लिए थे। इनकी जांच के निष्कर्ष 19 अक्टूबर को जारी किए गए। जांच में तपोवन स्थित गोदावरी-कपिला संगम, दसक क्षेत्र और टाकळी क्षेत्र के तीन प्रमुख नमूना स्थलों पर घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर शून्य दर्ज किया गया। नदी के पानी में घुली ऑक्सीजन जलीय जीवों के जीवन के लिए आवश्यक होती है। मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को सांस लेने तथा जीवित रहने के लिए इसी ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। जब पानी में ऑक्सीजन का स्तर बहुत नीचे चला जाता है, तो जलीय जीवन पर गंभीर संकट पैदा हो सकता है। इसका स्तर शून्य दर्ज होना उस स्थान पर अत्यधिक खराब जल गुणवत्ता और गंभीर जैविक प्रदूषण का संकेत है। है। तीन प्रमुख स्थानों पर सामने आए ये नतीजे नदी की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता पैदा करते हैं।

तपोवन में बीओडी 85, सामान्य स्तर से कई गुना अधिक प्रदूषण

जांच में सबसे चिंताजनक आंकड़ा तपोवन स्थित गोदावरी-कपिला संगम से सामने आया। यहां जैविक ऑक्सीजन मांग यानी बीओडी 85 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। दसक क्षेत्र में यह 52 मिलीग्राम प्रति लीटर और टाकळी क्षेत्र में 17 मिलीग्राम प्रति लीटर रही।  बीओडी पानी में मौजूद जैविक पदार्थों को विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा को दर्शाती है। पानी में सीवेज, मल-मूत्र और दूसरे जैविक अपशिष्टों की मात्रा बढ़ने पर बीओडी का स्तर भी बढ़ सकता है। इसका अधिक होना बताता है कि पानी में ऐसे पदार्थों का भार काफी ज्यादा है और उनके विघटन के दौरान उपलब्ध ऑक्सीजन तेजी से खर्च हो सकती है। पानी में बीओडी का स्तर जितना अधिक होगा, ऑक्सीजन की कमी का खतरा उतना ही बढ़ सकता है। हालांकि, किसी नदी के पानी की समग्र गुणवत्ता का आकलन केवल बीओडी से नहीं होता। इसके लिए घुली हुई ऑक्सीजन, रासायनिक ऑक्सीजन मांग, रोगाणुओं और अन्य प्रदूषकों की भी जांच जरूरी है।

रासायनिक प्रदूषण के संकेत भी चिंताजनक

रिपोर्ट में रासायनिक ऑक्सीजन मांग यानी सीओडी के आंकड़े भी सामने आए हैं। तपोवन में सीओडी 196 मिलीग्राम प्रति लीटर और दसक में 140 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। सीओडी पानी में मौजूद ऑक्सीकरण योग्य पदार्थों की मात्रा का संकेत देती है। इसका अधिक होना पानी में प्रदूषणकारी पदार्थों के बड़े भार की ओर इशारा करता है। हालांकि, केवल सीओडी के आधार पर किसी खास औद्योगिक रसायन या उसके स्रोत की पहचान नहीं की जा सकती। तपोवन के नमूने में पानी का रंग धूसर और दुर्गंधयुक्त होने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई है। इस तरह के बदलाव पानी में जैविक अपशिष्ट, सीवेज या अन्य प्रदूषणकारी पदार्थों की मौजूदगी के संकेत हो सकते हैं। प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पुष्टि के लिए नालों, सीवेज निकासी बिंदुओं और औद्योगिक अपशिष्ट के संभावित स्रोतों की अलग-अलग जांच जरूरी है।

मलजनित प्रदूषण ने बढ़ाई स्वास्थ्य संबंधी चिंता

पानी के नमूनों में मलजनित प्रदूषण के संकेत भी दर्ज किए गए। प्रकाशित जांच विवरण के अनुसार, तपोवन में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 70 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर और कुल कोलीफॉर्म का स्तर 280 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर था। ये जीवाणु समूह पानी में मानव या पशु मल से होने वाले संदूषण के संकेतक के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि जांच में हर रोग पैदा करने वाले जीवाणु की मौजूदगी साबित हो गई है। लेकिन मलजनित संदूषण की आशंका को देखते हुए पानी के संपर्क और उसके उपयोग को लेकर सावधानी जरूरी हो जाती है। दूषित पानी के संपर्क में आने से त्वचा और आंखों में जलन हो सकती है। यदि पानी में बीमारी फैलाने वाले रोगाणु मौजूद हों और वह गलती से निगल लिया जाए, तो दस्त, पेट संबंधी संक्रमण और दूसरी जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

कुंभ मेले से पहले प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

नासिक में गोदावरी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रामकुंड, पंचवटी और तपोवन जैसे क्षेत्रों में धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले के मद्देनजर नदी की स्वच्छता और जल गुणवत्ता का महत्व और बढ़ गया है। यदि नदी के प्रमुख घाटों पर प्रदूषण का स्तर अधिक बना रहता है, तो श्रद्धालुओं के स्नान, नदी के पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय लोगों की जरूरतों पर असर पड़ सकता है। इसलिए केवल सफाई अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। नदी में प्रदूषित पानी पहुंचने के कारणों को दूर करना और उपचारित जल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा। प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शहर से निकलने वाले सीवेज का कितना हिस्सा वैज्ञानिक तरीके से उपचारित किया जा रहा है और कितना दूषित पानी नदी तक पहुंच रहा है। इसके साथ ही सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता, उनकी वास्तविक कार्यक्षमता और नालों से होने वाले प्रदूषण की निगरानी की भी जांच करनी होगी।

मई 2027 तक गोदावरी को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य

गोदावरी के प्रदूषण की समस्या के बीच नासिक महानगरपालिका ने नदी को स्वच्छ बनाने के लिए सीवेज शोधन और निकासी व्यवस्था को मजबूत करने की योजनाओं पर काम शुरू किया है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, महानगरपालिका आयुक्त ने मई 2027 तक गोदावरी को प्रदूषणमुक्त बनाने और उसका पानी स्नान योग्य करने का लक्ष्य बताया था। इस योजना के तहत तपोवन में 180 एमएलडी, अगार्टाकळी में 97 एमएलडी, छेहेड़ी में 64 एमएलडी और पंचक में 75 एमएलडी क्षमता वाले नए सीवेज शोधन संयंत्र विकसित किए जा रहे हैं। अगार्टाकळी में पहले से मौजूद 70 एमएलडी क्षमता वाले संयंत्र को उन्नत करने की योजना भी बताई गई है। इन परियोजनाओं के पूरा होने पर नासिक की कुल सीवेज शोधन क्षमता 342 एमएलडी से बढ़कर 486 एमएलडी होने की उम्मीद है।
इसके अतिरिक्त, शहर में लगभग 400 किलोमीटर लंबा नया सीवेज नेटवर्क विकसित करने, पुराने पाइपों को बदलने और 29 नालों के दूषित पानी को सीधे नदी में जाने से रोककर शोधन संयंत्रों तक पहुंचाने की योजना है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य नदी में अनुपचारित सीवेज का प्रवाह कम करना है। हालांकि, इन परियोजनाओं की सफलता केवल संयंत्रों के निर्माण से तय नहीं होगी। यह देखना भी जरूरी होगा कि सभी संयंत्र नियमित रूप से काम कर रहे हैं या नहीं, सीवेज पाइपलाइन का कितना हिस्सा पूरा हुआ है और उपचार के बाद पानी निर्धारित पर्यावरणीय मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।

अब निगरानी और जवाबदेही पर जोर जरूरी

गोदावरी के तीन स्थानों पर ऑक्सीजन का शून्य स्तर और तपोवन में बीओडी का 85 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंचना बताता है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रभावी और लगातार कार्रवाई की जरूरत है। सबसे पहले नदी में गिरने वाले नालों की पहचान, सीवेज शोधन संयंत्रों की कार्यक्षमता की जांच और पानी के नमूनों की नियमित निगरानी की जानी चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण मंडल और महानगरपालिका को अलग-अलग स्थानों पर जल गुणवत्ता के आंकड़े सार्वजनिक करने, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करने और निर्धारित मानकों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर नियमानुसार कार्रवाई करने की जरूरत है। साथ ही नदी में घुली ऑक्सीजन की बहाली और जलीय जीवन पर पड़ रहे प्रभाव का आकलन भी किया जाना चाहिए। गोदावरी की स्वच्छता केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का भी सवाल है। आगामी कुंभ मेले से पहले नदी की वास्तविक स्थिति में सुधार लाने के लिए योजनाओं को समय पर पूरा करना, सीवेज को नदी में जाने से रोकना और सुधार के परिणामों की स्वतंत्र जांच करना बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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