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February 14, 2026

न राख मिली, न कफन, बस दीवारों पर सन्नाटा: गाजा में कैसे ‘भाप बनकर गायब’ हो रहे हैं लोग? दिल दहला देगी ये रिपोर्ट

The CSR Journal Magazine
गाजा सिटी की गलियों में अब सिर्फ मलबा, धुआं और सन्नाटा बचा है। अगस्त 2024 की एक सुबह अल-ताबिन स्कूल सुलगता हुआ खंडहर बन चुका था। दीवारें जली हुई थीं, खिड़कियां टूट चुकी थीं और हवा में बारूद की गंध तैर रही थी। इसी तबाही में यास्मीन महानी अपने बेटे साद को खोज रही थीं। चारों तरफ लोग चीखते-पुकारते अपनों को ढूंढ रहे थे, लेकिन साद कहीं नहीं था। यास्मीन अस्पतालों, मुर्दाघरों और राहत शिविरों के चक्कर काटती रहीं, मगर न बेटे का शव मिला, न कोई पहचान का निशान। उनके सामने सिर्फ सवाल था—जब न शरीर है, न सबूत, तो कोई कैसे माने कि उसका अपना इस दुनिया में नहीं रहा?

मौत के आंकड़ों से परे एक रहस्य

अक्टूबर 2023 से शुरू हुए युद्ध के बाद से गाजा में मौतों का आंकड़ा हजारों में है, लेकिन कुछ कहानियां आंकड़ों से भी ज्यादा डरावनी हैं। हजारों लोग ऐसे हैं, जिनकी मौत तो मानी गई, लेकिन दफनाने के लिए न शव मिला, न हड्डी, न कपड़ा—कुछ भी नहीं।
अल जजीरा अरबी की जांच रिपोर्ट के अनुसार, गाजा की सिविल डिफेंस टीमों ने आधिकारिक तौर पर 2,842 मामलों को दर्ज किया है, जहां लोग पूरी तरह “गायब” हो गए। यानी मौत मानी गई, लेकिन कोई भौतिक सबूत नहीं मिला। इसके अलावा हजारों अन्य लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

‘भाप बनकर उड़ गए’ लोग?

जांच और फोरेंसिक डेटा के आधार पर रिपोर्ट में कहा गया है कि ये लोग सामान्य बमबारी से नहीं मरे, बल्कि ऐसे हथियारों से प्रभावित हुए, जिनका असर इंसानी शरीर पर पूरी तरह विनाशकारी होता है। विशेषज्ञों का दावा है कि इन घटनाओं के पीछे ‘वैक्यूम बम’ और ‘थर्मोबेरिक हथियारों’ का इस्तेमाल हुआ।
ये हथियार विस्फोट के समय 3,500 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पैदा करते हैं, जिससे इंसानी शरीर कुछ ही पलों में जलकर राख बन सकता है। न हड्डी बचती है, न पहचान—सिर्फ जली दीवारें और राख के निशान।

वैक्यूम बम कैसे करते हैं तबाही

सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, वैक्यूम बम पहले हवा में ईंधन का बादल फैलाते हैं और फिर उसमें आग लगा दी जाती है। इससे एक विशाल आग का गोला बनता है और आसपास की हवा खिंचकर खत्म हो जाती है, जिसे “वैक्यूम इफेक्ट” कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में एल्यूमीनियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व इंसानी शरीर को कुछ सेकेंड में जला देते हैं। नतीजा—इमारत खड़ी रह सकती है, लेकिन अंदर मौजूद इंसान पूरी तरह राख में बदल जाता है।

इमारत बची, इंसान नहीं

जांच रिपोर्ट में कुछ खास हथियारों का जिक्र भी है, जैसे भारी विस्फोटक बम, बंकर बस्टर और सटीक निशाना लगाने वाले ग्लाइड बम। इनका असर ऐसा होता है कि बंद जगहों के भीतर आग और दबाव की लहरें इंसानी फेफड़ों और नरम ऊतकों को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं।
कई जगहों पर सिर्फ दीवारों पर जले हुए निशान और खून के धब्बे ही बचे हैं—यही आखिरी सबूत हैं कि वहां कभी कोई इंसान मौजूद था।

सीजफायर के बाद भी डर खत्म नहीं

गाजा में फिलहाल औपचारिक युद्धविराम लागू है। इस समझौते को 100 दिन पूरे हो चुके हैं और यह अब दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है। इसके बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं और क्षेत्र में तनाव बना हुआ है। संघर्षविराम के बाद भी अब तक 500 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत की खबरें सामने आ चुकी हैं, जिससे शांति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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