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January 9, 2026

जम्मू के वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस दाख़िलों पर विवाद, छात्रों का भविष्य अधर में

The CSR Journal Magazine
जम्मू में वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज का एमबीबीएस कोर्स में मुस्लिम छात्रों की संख्या ज्यादा होने पर हिंदूवादी संगठनो का विरोध, मान्यता रद्द सियासत और सांप्रदायिक विवाद के बीच छात्रों का भविष्य अधर में
जम्मू के रियासी स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल एक्सीलेंस में एमबीबीएस कोर्स की अनुमति राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने गंभीर खामियों के आधार पर रद्द कर दी है। कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की संख्या अधिक होने को लेकर पहले से चल रहे विरोध और राजनीतिक बयानबाज़ी के बीच यह फैसला लिया गया, जिससे छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।

एनएमसी का फ़ैसला निरीक्षण में उजागर हुईं गंभीर ख़ामियां

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने 2 जनवरी को कॉलेज का आकस्मिक निरीक्षण किया था, जिसके बाद 6 जनवरी को एमबीबीएस कोर्स संचालित करने की अनुमति वापस ले ली गई। एनएमसी ने अपने आदेश में साफ़ किया कि संस्थान न्यूनतम मानकों पर खरा नहीं उतर पाया। निरीक्षण के दौरान फैकल्टी की संख्या कम पाई गई, क्लिनिकल मटीरियल की पर्याप्त उपलब्धता नहीं थी और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कई गंभीर कमियां सामने आईं।
यह कॉलेज का पहला एमबीबीएस बैच था, जिसे सितंबर 2025-26 सत्र के लिए 50 सीटों पर अनुमति मिली थी।
एनएमसी के मुताबिक़, मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और तय मानकों का पालन न होने की स्थिति में मान्यता रद्द करना अनिवार्य है।

दाख़िलों को लेकर विवाद विरोध से आंदोलन तक

कॉलेज में 50 सीटों में से 40 से अधिक पर मुस्लिम छात्रों के दाख़िले के बाद नवंबर 2025 में विरोध शुरू हुआ। ये दाख़िले नीट परीक्षा की मेरिट के आधार पर हुए थे, लेकिन इसके बावजूद श्री माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति के बैनर तले कई हिंदूवादी संगठनों ने इसे मुद्दा बनाया।
22 नवंबर को समिति का गठन हुआ, जिसमें आरएसएस और बीजेपी से जुड़े संगठनों सहित 50 से अधिक संगठन शामिल थे। बजरंग दल द्वारा उग्र प्रदर्शन किए गए, धरने हुए और जम्मू सिविल सचिवालय के बाहर चक्का जाम की चेतावनी भी दी गई। एनएमसी के फ़ैसले से एक दिन पहले तक आंदोलन जारी रहा।
एनएमसी की कार्रवाई के बाद संघर्ष समिति ने इसे अपने आंदोलन की “जीत” बताया और जश्न मनाया।
मिठाइयाँ बांटी गईं और ढोल-नगाड़ों के साथ समारोह आयोजित हुए, जिसने इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया।

राजनीति गरमाई उमर अब्दुल्ला बनाम बीजेपी

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कॉलेज बंद होने पर जश्न मनाने को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “अगर बच्चों का भविष्य खराब करके आपको खुशी मिल रही है तो पटाखे फोड़िए।” उन्होंने सवाल उठाया कि जब कॉलेज को अनुमति दी गई थी, तब निरीक्षण किसने किया और जिम्मेदारी किसकी है।
उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि अगर खामियां थीं तो यूनिवर्सिटी के नेतृत्व और चांसलर से सवाल होने चाहिए। बिना नाम लिए उन्होंने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की भूमिका पर भी संकेत किया, जो यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं।
वहीं, बीजेपी नेताओं ने एनएमसी के फ़ैसले का स्वागत किया। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सत शर्मा ने कहा कि यह गुणवत्ता से समझौता न करने का उदाहरण है। विधायक आरएस पथानिया ने कहा कि “गुणवत्ता संख्या से ऊपर है” और मानकों पर खरा न उतरने पर अनुमति रद्द होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। बीजेपी ने मुख्यमंत्री पर इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाया।

छात्रों का भविष्य और आगे की राह

एनएमसी और जम्मू-कश्मीर सरकार दोनों ने भरोसा दिलाया है कि प्रभावित छात्रों का भविष्य सुरक्षित किया जाएगा। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि छात्रों को उनके घरों के नज़दीक अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला दिलाने की व्यवस्था की जाएगी। राज्य की स्वास्थ्य मंत्री सकीना मसूद इटू को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप के निर्देश दिए गए हैं।
जम्मू-कश्मीर के 20 ज़िलों में से 11 में सरकारी मेडिकल कॉलेज मौजूद हैं, जहां इन छात्रों को समायोजित किया जाएगा। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थानांतरण प्रक्रिया आसान नहीं होगी और इससे छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ सकता है।
श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी की स्थापना 1999 में हुई थी और इसे श्राइन बोर्ड व सरकार से फंडिंग मिलती है। ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान में मेडिकल कॉलेज का बंद होना न सिर्फ़ शैक्षणिक बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस को भी जन्म देता है।
यह मामला दिखाता है कि मेडिकल शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक दबाव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है। अब सवाल यह है कि क्या ज़िम्मेदारी तय होगी और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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