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January 17, 2026

चाबहार पोर्ट और भारत की कूटनीति अमेरिकी दबाव, रणनीतिक मजबूरी और सख़्त होते सवाल

The CSR Journal Magazine
ईरान के चाबहार पोर्ट को लेकर भारत की भूमिका एक बार फिर बहस के केंद्र में है। अमेरिका द्वारा ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर सख़्त रुख और संभावित टैरिफ़ के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से पीछे हट रहा है या यह एक व्यवहारिक कूटनीतिक मजबूरी है। चाबहार, भारत की मध्य एशिया तक पहुँच और पाकिस्तान को बाइपास करने की नीति का अहम आधार रहा है।

चाबहार पोर्ट भारत के लिए क्यों है रणनीतिक महत्व

ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि भू-रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच देता है। साथ ही, यह चीन द्वारा संचालित पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का संतुलनकारी जवाब भी माना जाता है।
भारत ने 2003 में चाबहार के विकास का प्रस्ताव रखा था और 2016 में इस पर औपचारिक समझौता हुआ। 2019 में पहली बार अफ़ग़ानिस्तान से भारत तक इसी रास्ते से माल आया, जिसे नई कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा गया।

अमेरिकी प्रतिबंध और भारत की मुश्किलें

अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध और अब अतिरिक्त टैरिफ़ की चेतावनी ने भारत के सामने कठिन विकल्प खड़े कर दिए हैं। भले ही भारत-ईरान व्यापार कुल व्यापार का बहुत छोटा हिस्सा है, लेकिन अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था और तकनीकी निर्भरता भारत को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।
अमेरिका ने चाबहार परियोजना को लेकर अस्थायी छूट दी थी, जिसकी वैधता अप्रैल 2026 तक है। इसी बीच रिपोर्टें आईं कि भारत की सरकारी कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड ने परियोजना से दूरी बनानी शुरू कर दी है, ताकि भविष्य में किसी क़ानूनी या आर्थिक जोखिम से बचा जा सके। हालांकि सरकार ने साफ़ किया है कि वह अमेरिका और ईरान दोनों से संपर्क में है।

आलोचना, क्या भारत दबाव में झुक रहा है?

विपक्षी दलों, वरिष्ठ पत्रकारों और सामरिक विशेषज्ञों का आरोप है कि भारत बार-बार अमेरिकी दबाव में अपने दीर्घकालिक हितों से समझौता कर रहा है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि भारत कब तक अमेरिका को अपने फैसलों को प्रभावित करने देगा।
सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि 2019 में ईरान से तेल आयात बंद करने से भारत-ईरान ऊर्जा संबंध लगभग समाप्त हो गए और इसका फायदा चीन को मिला। उनका मानना है कि चाबहार से पीछे हटना भारत की रणनीतिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है।

व्यावहारिक विदेश नीति या मजबूरी का संतुलन?

दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञ इसे भारत की मजबूरी और यथार्थवादी विदेश नीति मानते हैं। थिंक टैंक ब्रुकिंग्स की फेलो तन्वी मदान के अनुसार, भारत एक मल्टिपोलर विदेश नीति अपनाता है, जिसमें संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है ख़ासकर ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में।
उनका तर्क है कि औपचारिक सैन्य गठबंधनों से दूर रहने वाले देशों को अपनी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए अधिक सतर्क रहना पड़ता है। इसी कारण भारत को रिश्तों में विविधता और सावधानी दोनों बनाए रखनी पड़ती है।
चाबहार पोर्ट को लेकर मौजूदा बहस भारत की विदेश नीति की जटिलता को उजागर करती है। एक ओर रणनीतिक हित हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक शक्तियों का दबाव। सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका या ईरान में से किसे चुने, बल्कि यह है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में वह अपने दीर्घकालिक हितों को कितनी कुशलता से सुरक्षित रख पाता है।

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