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March 6, 2026

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- वॉट्सएप चैट नहीं, सबूत चाहिए तलाक के लिए

The CSR Journal Magazine
बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल वॉट्सएप चैट के आधार पर तलाक का आदेश नहीं दिया जा सकता। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की बेंच ने महिला की फैमिली कोर्ट की अपील पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(1)(आई-ए) के तहत क्रूरता के आरोपों को कानूनी रूप से मान्य सबूतों से साबित करने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत, विरोधी पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर भी मिलना चाहिए।

एकतरफा आदेश पर सवाल

महिला ने फैमिली कोर्ट के 27 मई 2025 को दिए एकतरफा फैसले को चुनौती दी थी। इस फैसले में फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी को क्रूरता के आधार पर मंजूर किया था। महिला ने तर्क दिया कि यह डिक्री एकतरफा पास हुई, जिससे उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ। फैमिली कोर्ट ने केवल दोनों पक्षों के बीच वॉट्सएप चैट और एसएमएस एक्सचेंज पर निर्भर रहकर निर्णय लिया।

हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का यह आदेश रद्द करते हुए कहा कि बिना ठोस सबूतों के केवल डिजिटल बातचीत के आधार पर किसी भी शादी को समाप्त नहीं किया जा सकता है। कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में भी महत्वपूर्ण है जहां ऐसी आरोप-प्रत्यारोप होते हैं। फैसले ने यह साबित कर दिया कि भारतीय न्यायालयों में तलाक से संबंधित मामलों में सबूतों की जरूरत कितनी महत्वपूर्ण है।

अतिरिक्त तलाक सम्बन्धी मामलों की सुनवाई

बॉम्बे हाईकोर्ट ने तलाक के अन्य मामलों में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। इसमें तलाक-ए-अहसन पर कोई रोक नहीं होने की बात कही गई है। जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस संजय देशमुख ने कहा कि मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत तलाक की परिभाषा में ऐसे रूप शामिल हैं जिनका प्रभाव तत्काल होता है।

पत्नी के आरोप और मानहानि

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर पत्नी अपने पति को नपुंसक कहती है तो इसे मानहानि नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि यह आरोप विशेष रूप से तलाक की कार्यवाही के दौरान लगाए गए हों, तो महिला का यह अधिकार है। ऐसे में यह नियमों के अंतर्गत आता है कि वो अपनी रक्षा कर सकती है।

क्रूरता का नया मानक

एक अन्य मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी शारीरिक संबंध से इनकार करती है और पति पर किसी अन्य महिला से संबंध होने का शक जताती है, तो इसे क्रूरता माना जाएगा। इस स्थिति को न्यायालय ने तलाक का वैध आधार बताया। जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस नीला गोखले ने पुणे फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए यह स्पष्ट किया।

सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि अगर किसी पति-पत्नी में झगड़े होते हैं तो बच्चों की हालत और घर की स्थिरता को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेना चाहिए। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच का यह बयान विवाह संबंधों की जटिलताओं को समझने में मदद
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