कर्नाटक के बेंगलुरु के पास स्थित बिलपुरा पंचायत ने एक ऐसा प्रयोग किया है, जो बड़े शहरों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है। जहाँ पहले कचरे के ढेर और गंदगी आम बात थी, वहीं अब गांव के लोग अपने 90% कचरे को घर-घर से अलग करके निपटा रहे हैं। बिलपुरा का यह परिवर्तन किसी सरकारी निर्देश या बड़े बजट से नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों, पंचायत और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की मदद से संभव हो पाया है।
कचरे को खाद में बदलना
गांव के लोग अब अपने गीले कचरे से खाद बना रहे हैं, जिसका उपयोग वे फलदार पेड़ उगाने के लिए कर रहे हैं। पहले कचरा खुले में फेंका जाता था, लेकिन अब एक खुला केंद्र बनाया गया है, जहाँ रोजाना आने वाले कचरे को दो हिस्सों में बांटा जाता है। ये गीला कचरा कुछ समय बाद सड़कर बेहतरीन खाद बन जाता है, जिससे गांव में एक फलदार वन भी उगाया जा चुका है।
महिलाओं की सक्रिय भूमिका
इस अभियान में 6 महिलाएं सूखा और गीला कचरा अलग करने का काम कर रही हैं, जबकि 1 महिला कचरा वाहन चलाने की जिम्मेदारी ले रही हैं। इसके अलावा, यूनिवर्सिटी के छात्रों और एनजीओ ने मिलकर एक एप बनाया है, जिससे यह पता चल सके कि कौन-सा घर कचरा सही तरीके से अलग कर रहा है। इस एप के माध्यम से कचरे का पूरा हिसाब रखा जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम
बिलपुरा गांव के इस अनोखे प्रयोग से आसपास की 8 पंचायतें भी प्रभावित हुई हैं और उन्होंने इसी तरीके को अपनाने का फैसला लिया है। कामयाबी की एक और कहानी सुनाते हुए, 220 से ज्यादा महिलाएं अब रीयूजेबल पैड का इस्तेमाल कर पर्यावरण का बचाव कर रही हैं। यह पहल महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए भी लाभदायक सिद्ध हो रही है।
एक नई शुरुआत
बिलपुरा गांव का यह प्रयोग न केवल स्थानीय स्तर पर बदलाव ला रहा है, बल्कि अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक प्रेरणा बन रहा है। इस प्रयोग से रूबरू होकर अन्य पंचायतें भी इस दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। अब यह देखना होगा कि क्या अन्य गांव भी इस तरह के प्रयोग कर अपनी स्वच्छता और पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं।