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February 3, 2026

शोक में दिखावे पर सख्त वार: Bihar के इस गांव ने मृत्युभोज पर लगाई रोक, आइए जानते हैं वजह

The CSR Journal Magazine
समाज में जब बदलाव की शुरुआत भीतर से होती है, तब वह सिर्फ एक निर्णय नहीं, बल्कि मिसाल बन जाता है. बिहार के सहरसा जिले के सत्तरकटैया प्रखंड स्थित आरण गांव ने ऐसा ही साहसिक कदम उठाया है. सोमवार को आयोजित विशाल ग्राम सभा में गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से मृत्युभोज जैसी पुरानी सामाजिक परंपरा पर पूरी तरह पाबंदी लगाने का फैसला लिया. ग्रामीणों का मानना है कि यह परंपरा अब संवेदना नहीं, बल्कि शोकग्रस्त परिवार के लिए बोझ बन चुकी है.

संवेदना से बोझ तक पहुंची परंपरा

ग्राम बैठक में यह बात खुलकर सामने आई कि मृत्युभोज अब शोक जताने का माध्यम नहीं रहा. अपनों को खोने के बाद परिवार पहले ही मानसिक पीड़ा में होता है, लेकिन समाज के डर और परंपरा के दबाव में उन्हें बड़े स्तर पर भोज का आयोजन करना पड़ता है. इसके लिए कई परिवारों को कर्ज तक लेना पड़ता है, जिससे उनका भविष्य और भी असुरक्षित हो जाता है. ग्रामीणों ने इसे अमानवीय दबाव करार देते हुए इस परंपरा को खत्म करने की जरूरत बताई.

सादगी से दिखावे तक बदला स्वरूप

बैठक में चर्चा हुई कि समय के साथ मृत्युभोज का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है. पहले यह साधारण भोजन तक सीमित रहता था, लेकिन अब यह सामाजिक प्रतिष्ठा और हैसियत दिखाने का जरिया बन गया है. आज स्थिति यह है कि शादियों जैसे मेन्यू तैयार किए जाते हैं, जिनमें कचौड़ी, पुलाव, कई तरह की सब्जियां, दही, मिठाई और पारंपरिक पकवान शामिल होते हैं. इस दिखावे की दौड़ में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को उठाना पड़ता है.

धर्म और विवेक दोनों ने दिया साथ

गांव के बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों ने बैठक में साफ कहा कि किसी भी धर्मशास्त्र में मृत्युभोज की अनिवार्यता नहीं है. आत्मा की शांति प्रार्थना, सेवा और सद्भाव से मिलती है, न कि भव्य भोज से. समाजशास्त्री गणेश प्रसाद ने कहा कि शोक के समय परिवार को आर्थिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है. सामूहिक निर्णय ही ऐसी कुरीतियों को समाप्त कर सकता है.

महिलाओं की आवाज बनी बदलाव की ताकत

इस फैसले को महिलाओं का खास समर्थन मिला. महिलाओं ने कहा कि शोक की स्थिति में भी रसोई संभालना और मेहमानों की सेवा करना उनकी मानसिक पीड़ा को और बढ़ा देता है. उन्होंने इसे संवेदनहीन परंपरा बताते हुए कहा कि दुख के समय परिवार को आराम और सहानुभूति मिलनी चाहिए, न कि सामाजिक दबाव.

सिर्फ फैसला नहीं, ठोस रणनीति भी

आरण गांव के लोगों ने केवल संकल्प ही नहीं लिया, बल्कि भविष्य के लिए स्पष्ट रणनीति भी तय की है. यदि कोई व्यक्ति या समूह परंपरा के नाम पर किसी परिवार पर मृत्युभोज का दबाव डालता है, तो पूरा गांव एकजुट होकर उसका विरोध करेगा. गांव ने आसपास के इलाकों से भी अपील की है कि वे इस कुरीति के खिलाफ आगे आएं और सामाजिक बराबरी को मजबूत करें.

एक गांव, कई सवाल और नई राह

आरण गांव का यह फैसला सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं है. यह पूरे समाज के लिए सोचने का अवसर है कि क्या परंपराएं इंसान से बड़ी हो सकती हैं. शोक को बोझ से मुक्त करने की यह पहल आने वाले समय में कई गांवों और समाजों के लिए प्रेरणा बन सकती है.
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