बस्तर नक्सलमुक्ति की दहलीज पर पहुंच चुका है। सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों से नक्सल नेटवर्क लगभग ध्वस्त हो गया है, लेकिन IED का अदृश्य खतरा अब भी शांति की राह में सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। 2025 में 67 आईईडी ब्लास्ट में एएसपी सहित 12 जवान शहीद हुए हैं।

नक्सल नेटवर्क लगभग ध्वस्त, 90% कैडर खत्म या आत्मसमर्पण

दशकों तक नक्सल हिंसा की मार झेलने वाला बस्तर आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा तय समयसीमा के तहत 31 मार्च तक नक्सलवाद के खात्मे का लक्ष्य रखा गया है। सुरक्षा बलों की लगातार और आक्रामक रणनीति के चलते नक्सल संगठन की कमर लगभग टूट चुकी है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार करीब 90 प्रतिशत नक्सली या तो मारे जा चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शीर्ष नेतृत्व का सफाया हो चुका है और संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ गया है।
ग्रामीण इलाकों में प्रशासन की मौजूदगी बढ़ी है, सड़क निर्माण और विकास कार्यों को गति मिली है। लंबे समय बाद गांवों में शांति और सामान्य जीवन की उम्मीद जगी है। हालांकि इस सकारात्मक बदलाव के बीच एक गंभीर खतरा अब भी कायम है IED.

2025 में 67 ब्लास्ट, एएसपी सहित 12 जवान शहीद

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वर्षों पहले बिछाए गए आईईडी आज भी जानलेवा साबित हो रहे हैं। वर्ष 2025 में बस्तर संभाग में अब तक 67 आईईडी विस्फोट दर्ज किए गए हैं। इन धमाकों में एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) सहित 12 जवान शहीद हुए, जबकि 46 से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हुए हैं।
इसी अवधि में सुरक्षा बलों ने 875 जीवित आईईडी बरामद कर निष्क्रिय किए हैं, जो इस बात का संकेत है कि जंगलों और कच्ची सड़कों के नीचे अब भी बड़ी संख्या में विस्फोटक छिपे हो सकते हैं। पुलिस आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2005 से 2025 के बीच दो दशकों में आईईडी विस्फोटों में 509 से अधिक लोगों की जान गई है। इनमें 350 से ज्यादा जवान और 159 से अधिक निर्दोष ग्रामीण शामिल हैं।
यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि आमने-सामने की मुठभेड़ों की तुलना में छिपे हुए विस्फोटक ज्यादा घातक साबित हुए हैं। बंदूकें भले खामोश हों, लेकिन बारूदी सुरंगों का जाल अब भी बस्तर के लिए बड़ा खतरा है।

IED मुक्त बस्तर सबसे बड़ी चुनौती

आईईडी से निपटने के लिए सुरक्षा बलों ने माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल, बम डिस्पोजल स्क्वॉड, डॉग स्क्वॉड और आधुनिक सर्विलांस उपकरण तैनात किए हैं। संवेदनशील मार्गों की नियमित जांच की जा रही है और ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। लोगों को संदिग्ध वस्तुओं से दूर रहने और तुरंत सूचना देने की अपील की जा रही है।
इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक व्यापक और संगठित डिमाइनिंग अभियान नहीं चलाया जाता, तब तक बस्तर को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना संभव नहीं है। घने जंगल, दुर्गम पहाड़ी इलाकों और कच्ची सड़कों में वर्षों पुराने आईईडी की पहचान करना आसान नहीं है। समय और मौसम के साथ ये विस्फोटक और भी अस्थिर हो जाते हैं, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।

निर्दोष ग्रामीण भी बन रहे शिकार, जंगल जाने में डर

आईईडी का असर अब केवल सुरक्षाबलों तक सीमित नहीं रहा। जंगलों में लकड़ी, तेंदूपत्ता और महुआ बीनने जाने वाले आदिवासी ग्रामीण, खेतों में काम करने वाले किसान और पशुपालक भी इन विस्फोटों का शिकार बन रहे हैं। कई मामलों में मवेशियों की मौत के बाद गांवों में दहशत फैल जाती है और लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से भी डरने लगते हैं। सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे इलाकों में यह खतरा सबसे अधिक देखा गया है। हालांकि हालात पहले की तुलना में बेहतर हुए हैं, लेकिन पूर्ण सुरक्षा अभी भी दूर है।
एक ग्रामीण ने कहा, “नक्सलियों की वजह से हमारे गांव में सालों तक डर का माहौल रहा। अब प्रशासन की कार्रवाई से शांति लौट रही है। हम चाहते हैं कि नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो, ताकि हमारे बच्चे बिना डर के पढ़ सकें और गांव विकास की राह पर आगे बढ़े। स्पष्ट है कि बस्तर नक्सलमुक्ति की दहलीज पर जरूर पहुंचा है, लेकिन स्थायी शांति के लिए ‘IED मुक्त बस्तर’ बनाना अब सबसे अहम लक्ष्य बन चुका है। जब तक ज़मीन के नीचे छिपा यह अदृश्य खतरा समाप्त नहीं होता, तब तक शांति अधूरी रहेगी।

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