बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा मोड़ आ चुका है। हालिया आम चुनाव में Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 210 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार गठन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनने जा रही है। करीब 35 वर्षों बाद बांग्लादेश को एक बार फिर पुरुष प्रधानमंत्री मिलने की स्थिति बन गई है।
लेकिन इस चुनाव की खास बात सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि इसके साथ कराया गया ऐतिहासिक जनमत संग्रह भी है, जिसने पूरे शासन तंत्र को बदलने की नींव रख दी है।
जनता ने कहा ‘हां’, बदलाव को मिली मंजूरी
चुनाव के साथ ही 84 सूत्रीय सुधार पैकेज पर जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें जनता से ‘जुलाई नेशनल चार्टर 2025’ को मंजूरी देने की सहमति मांगी गई। इस जनमत संग्रह में 60.26% मतदान हुआ और भारी बहुमत से ‘हां’ को जीत मिली। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक लगभग 70% मतदाताओं ने सुधारों के समर्थन में वोट किया। चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्टि की कि करोड़ों मतदाताओं ने इस चार्टर के पक्ष में समर्थन दिया, जिससे यह साफ हो गया कि जनता केवल सरकार नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम बदलना चाहती है।
जुलाई चार्टर: विद्रोह से सुधार तक
‘जुलाई चार्टर’ की जड़ें जुलाई 2024 के छात्र-आंदोलन से जुड़ी हैं, जिसने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदल दी थी। इसी आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद एक संवैधानिक सुधार परिषद का गठन हुआ, जिसे 270 कार्यदिवसों में व्यापक सुधार लागू करने की जिम्मेदारी दी गई। यही सुधार अब ‘जुलाई नेशनल चार्टर 2025’ के रूप में सामने आए हैं।
सिस्टम रीसेट का प्लान: सत्ता नहीं, संतुलन का मॉडल
इस चार्टर का मूल उद्देश्य सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना और निरंकुश शासन की संभावनाओं को खत्म करना है। इसके तहत देश की शासन व्यवस्था को नए सिरे से डिजाइन करने की योजना बनाई गई है। 84 सुधार प्रस्तावों में से 47 के लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी हैं, जबकि 37 को कानून और कार्यकारी आदेशों के जरिए लागू किया जा सकता है।
प्रमुख प्रस्ताव जो बदल देंगे बांग्लादेश
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प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा: सत्ता में लंबे समय तक बने रहने की प्रवृत्ति पर रोक।
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दो सदनों वाली संसद: 100 सीटों वाला ऊपरी सदन, जिससे विधायी शक्ति में संतुलन बने।
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कार्यकारी शक्ति में कटौती: प्रधानमंत्री कार्यालय की ताकत घटाकर राष्ट्रपति की भूमिका मजबूत करना।
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न्यायपालिका की स्वतंत्रता: अदालतों और संस्थानों को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखना।
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विपक्ष की भागीदारी: संसदीय समितियों में विपक्ष को नेतृत्व की भूमिका।
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‘जुलाई फाइटर्स’ को संरक्षण: आंदोलनकारियों को कानूनी सुरक्षा।
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महिला प्रतिनिधित्व: संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने का प्रावधान।

