बाबा बागेश्वर के बयान पर विवाद, ‘राम सीधे तो कृष्ण टेढ़े’ कहने के पीछे क्या है वजह?

The CSR Journal Magazine

धार्मिक अभिव्यक्ति की सीमाएं

नई दिल्ली: धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में सार्वजनिक मंच पर कही गई बातें अक्सर विवाद का कारण बन जाती हैं। खासकर जब बात करोड़ों लोगों के आराध्य देवी-देवताओं की हो, तब शब्दों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। हाल ही में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें बाबा बागेश्वर के नाम से जाना जाता है, के एक बयान ने इसी बहस को फिर से हवा दी है। उनके इस बयान ने यह सवाल उठाया है कि धार्मिक अभिव्यक्ति की आजादी कहां तक है और कानून की सीमाएं क्या हैं।

क्या है पूरा मामला?

इस विवाद की शुरुआत मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में एक रामकथा के दौरान हुई। बाबा बागेश्वर ने भगवान कृष्ण की झुकी मुद्रा का जिक्र करते हुए उन्हें “टेढ़ा” बताया, जबकि भगवान राम को “सीधा” बताया। इसके साथ ही उन्होंने बांसुरी और धनुष की तुलना भी की। उनकी इस टिप्पणी पर न केवल कुछ धार्मिक नेताओं ने आपत्ति जताई, बल्कि कई राजनेताओं ने भी इसे अनुचित करार दिया और सरकार से कार्रवाई की मांग की।

बाबा बागेश्वर का स्पष्टीकरण

जैसे ही विवाद बढ़ा, बाबा बागेश्वर ने अपनी टिप्पणी पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनकी बात का गलत अर्थ निकाला गया और उनका उद्देश्य भगवान राम और कृष्ण के बीच भेद करना नहीं था। उन्होंने इसे भक्ति के भाव में कही गई बात बताया और कहा कि यदि किसी की भावना आहत हुई है तो उन्हें खेद है।

क्या धार्मिक भावनाएं आहत करना Hate Speech है?

भारतीय न्याय संहिता BNS की धारा 196 के अनुसार, विभिन्न धार्मिक या सामाजिक समुदायों के बीच दुश्मनी या नफरत फैलाने वाले कार्यों से संबंधित है। इसमें धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर नफरत फैलाना शामिल है। यदि कोई अपराध पूजा स्थल या धार्मिक कार्यक्रम के दौरान किया गया हो, तो सजा पांच साल तक हो सकती है।

क्या बाबा बागेश्वर को मिलेगी सजा?

भारत में बाबा बागेश्वर के इस बयान पर ‘ईश निंदा’ का कोई स्वतंत्र कानून लागू नहीं होगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि धार्मिक टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे Hate Speech के मामलों में जरूरी तत्वों की जांच किए बिना आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।

धार्मिक टिप्पणी, ईशनिंदा या Hate Speech?

भारतीय कानूनों में इस तरह के मामलों का फैसला केवल इस आधार पर नहीं होता कि किसी की धार्मिक भावना आहत हुई है। चूंकि भारत में ईशनिंदा का कोई सामान्य आपराधिक धारा नहीं है, लेकिन धार्मिक विश्वासों का जानबूझकर अपमान करने पर BNS की धारा 299 लागू हो सकती है।

क्या होगी आगे की कार्रवाई?

बाबा बागेश्वर की सफाई को देखते हुए इस बयान को अभी सीधे हेट स्पीच या साबित अपराध घोषित करना उचित नहीं होगा। इसे अपने आराध्य भगवान को सबसे अच्छा बताने की एक कोशिश माना जा सकता है। भारत के मध्यकालीन साहित्य में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां संतों और कवियों ने अपने आराध्य को दूसरों से श्रेष्ठ बताया है।

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