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January 15, 2026

JLF 2026 लिखने की योजना नहीं लिखना ही सबसे बड़ा साहस है जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बानो मुश्ताक

The CSR Journal Magazine
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के फ्रंट लॉन सेशन में प्रख्यात लेखिका बानो मुश्ताक ने अपने 33 वर्षों के लेखकीय सफर, बदलते सामाजिक-साहित्यिक परिदृश्य और इंटरनेशनल बुकर प्राइज के अनुभवों पर खुलकर बात की। उन्होंने युवा पीढ़ी, अभिभावकों की बदलती सोच और लेखन के सामाजिक दायित्व पर गहन विचार साझा किए।

33 साल का लेखकीय सफर और बदलता समय

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में बानो मुश्ताक के साथ हुए संवाद का केंद्र उनका 33 वर्षों का लंबा लेखकीय सफर रहा। सत्र में जब उनसे पूछा गया कि इतने वर्षों तक कहानियों के साथ जीने के बाद और बीते एक साल की ऐतिहासिक उपलब्धियों के बीच वे अपने लेखन को कैसे देखती हैं, तो उन्होंने कहा कि हाल का वर्ष उनके जीवन का सबसे दिलचस्प समय रहा है।
उनका मानना है कि आज समाज में एक गहरा बदलाव दिखाई दे रहा है। एक पूरी पीढ़ी न केवल जाग रही है, बल्कि उससे भी अधिक सकारात्मक यह है कि अब माता-पिता भी जागरूक हो चुके हैं। पहले जहां अभिभावक अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, खिलाड़ी या कलाकार बनते देखना चाहते थे, वहीं अब वे लेखक के रूप में भी अपने बच्चों की पहचान बनते देखना चाहते हैं। यह बदलाव साहित्य के भविष्य के लिए एक मजबूत संकेत है।

अभिभावकों की बदलती भूमिका और साहित्य का नया दौर

बानो मुश्ताक ने कहा कि आज कई माता-पिता अपने बच्चों की किताबें प्रकाशित कराने के लिए खुद आगे आ रहे हैं। वे प्रकाशकों से संपर्क कर रहे हैं और बच्चों की रचनाओं को मंच दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने इसे साहित्य के लोकतंत्रीकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया।
उन्होंने एक उदाहरण साझा किया, जिसमें एक मां ने अपनी 14 वर्षीय बेटी की किताब का लोकार्पण मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के हाथों करवाया। अब वही मां चाहती हैं कि बानो मुश्ताक उनकी बेटी की किताब के लिए भूमिका लिखें। लेखिका के अनुसार, यह उदाहरण दर्शाता है कि साहित्य को लेकर समाज की सोच कितनी तेजी से बदल रही है और यह बदलाव आने वाले समय में नई, साहसी आवाज़ों को जन्म देगा।

बुकर प्राइज और भारतीय भाषाओं की ऐतिहासिक जीत

सत्र के दौरान बानो मुश्ताक ने साहित्यिक इतिहास में दर्ज हालिया उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पहली बार बुकर पुरस्कार के इतिहास में किसी लघु कहानी संग्रह को यह सम्मान मिला, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इसके साथ ही कन्नड़ जैसी भारतीय भाषा से पहली बार किसी कृति को बुकर पुरस्कार मिलना भी ऐतिहासिक क्षण है।
उन्होंने यह भी साझा किया कि बुकर पुरस्कार पाने वाली अब तक की सबसे वरिष्ठ लेखिका होना उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक, भारतीय और क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य की सामूहिक जीत है। उनके अनुसार, यह साबित करता है कि सशक्त कहानियां भाषा की सीमाओं को पार कर सकती हैं।

‘हमें और ज़्यादा लिखना चाहिए’  युवा लेखकों के लिए संदेश

इंटरनेशनल बुकर प्राइज के बाद दिए गए उनके स्वीकृति भाषण का जिक्र करते हुए बानो मुश्ताक ने कहा कि उस भाषण की एक पंक्ति “एक ऐसी दुनिया में जो हमें बाँटने की कोशिश करती है, हमें और ज़्यादा लिखना चाहिए” आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
उन्होंने बताया कि पुरस्कार की घोषणा से करीब पांच दिन पहले ही उन्होंने वह भाषण लिख लिया था, हालांकि तब उन्हें खुद भी पूरा भरोसा नहीं था। उन्होंने अपने पाठकों और साहित्यिक समुदाय का आभार जताते हुए कहा कि लेखन केवल पुरस्कारों के लिए नहीं, बल्कि संवाद, जुड़ाव और इंसानियत को बचाए रखने का माध्यम है।
युवा लेखकों को संदेश देते हुए उन्होंने साफ कहा, “लिखने की योजना मत बनाइए। बस लिखना शुरू कीजिए। लिखिए, लिखिए और लगातार लिखिए। यही सबसे बड़ा मंत्र है।”

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