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February 12, 2026

Assam में मुस्लिम बहुल जिलों में वोटरों की भारी बढ़ोतरी: बारपेटा ने तोड़ा रिकॉर्ड, आने वाले चुनावों में राजनीतिक भूचाल मुमकिन

The CSR Journal Magazine
असम के 35 जिलों में जो मुसलमानों की आबादी ज्यादा है, वहां वोटरों की संख्या में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। फाइनल वोटर लिस्ट के अनुसार, केवल 10 जिलों में वोटरों की संख्या बढ़ी, जिनमें से 8 जिले मुस्लिम बहुल हैं। इन जिलों में बारपेटा, धुबरी, गोलपारा, मोरीगांव, नागांव, साउथ सलमारा, बोंगाईगांव और हैलाकांडी शामिल हैं। जबकि दो गैर-मुस्लिम बहुल जिलों में भी मामूली बढ़ोतरी देखी गई, जिनमें माजुली और बजाली हैं।

नम्बर गेम: बारपेटा की लीड

वोटरों की सबसे ज्यादा वृद्धि बारपेटा जिले में हुई है। पिछले साल के ड्राफ्ट रोल की तुलना में यहां 28,625 नए वोटर जुड़े हैं। इसके अलावा, ऊपरी असम के पारंपरिक असमिया जिलों में मतदाताओं की संख्या में कमी आई है। उदाहरण के तौर पर, सोनितपुर में 22,186, लखीमपुर में 20,998, और गोलाघाट में 20,027 वोटरों की कमी देखी गई है।

राज्य में जनसंख्या का गणित

2011 की जनगणना के अनुसार, असम में मुसलमानों की आबादी 34.22% थी। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने चेताया है कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो 2041 तक असम मुस्लिम-बहुल राज्य बन सकता है। उनका दावा है कि मुस्लिम समाज पहले से ही राज्य की आबादी का लगभग 40% हिस्सा हैं।

वोटर लिस्ट में बदलाव: नाम कटने का सवाल

चुनाव आयोग ने हाल ही में फाइनल वोटर लिस्ट जारी की है, जिसमें ड्राफ्ट रोल से 2.43 लाख नाम हटा दिए गए हैं। इसके अंतर्गत कुल 2.49 करोड़ वोटर हैं, जो ड्राफ्ट रोल से 0.97 प्रतिशत कम है। यह SR (स्पेशल रिवीजन) प्रक्रिया के चलते किया गया है।

विरोध: SR प्रक्रिया पर उठते सवाल

SR प्रक्रिया को लेकर राज्य में विवाद खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि इसका इस्तेमाल वोटों की चोरी के लिए किया जा रहा है। खास तौर पर धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को परेशान करने का बयान भी आया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वे ‘मियाओं’ को नोटिस देकर दबाव में लाने की कोशिश कर रहे हैं। मिया शब्द असम में बंगाली बोलने वाले मुसलमानों के लिए प्रयोग होता है।

क्या है आगे का रास्ता?

जिलेवार आंकड़ों की समीक्षा के साथ यह साफ है कि असम की राजनीतिक तस्वीर में मुसलमानों की बढ़ती भागीदारी दिलचस्प बदलाव ला सकती है। आने वाले चुनावों में यह आंकड़े अहम भूमिका निभा सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपने रणनीतियों में बदलाव करने की आवश्यकता महसूस हो सकती है।
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