PM Modi की वजह से असम के गमछे की डिमांड में तेजी, जानें ये खासियत

The CSR Journal Magazine
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में असम में एक जनसभा के दौरान गमछा लहराया, जिससे इसकी मांग में अचानक वृद्धि हो गई। असम में इसे स्थानीय भाषा में गमोसा कहा जाता है, जो असमिया संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पीएम मोदी के इस अंदाज ने लोगों का ध्यान खींचा है, और अब हर कोई जानना चाहता है कि ये खास गमछा कहां से मिल सकता है।

बागिचों की शान

गुवाहाटी में रहने वाली फुलेश्वरी मेधी इस गमछे को तैयार करती हैं। उनका कहना है कि दिनभर हथकरघा पर बैठने के बाद वे सिर्फ दो गमछे बना पाती हैं, जिससे उनकी थोड़ी सी आमदनी हो जाती है। फुलेश्वरी की बेटी हिमाद्री कहती हैं कि उनकी पढ़ाई का खर्च इसी गमछे की बिक्री से पूरा होता है। पीएम मोदी द्वारा इस गमछे के पहनने के बाद इसकी डिमांड में काफी बढ़ोतरी हुई है।

गमोसा की पहचान

गमोसा असम की पारंपरिक पहचान है और इसे सम्मान एवं स्वागत का प्रतीक माना जाता है। जब भी कोई शुभ अवसर आता है, तब इसे पहनने या भेंट देने की परंपरा है। अब जब PM मोदी ने इसे अपनाया है, लोग इसकी कीमत और महत्व को और अधिक समझ रहे हैं।

अनूठी डिज़ाइन और बनावट

फुलेश्वरी ने बताया कि गमोसा सफेद रंग के कपड़े पर लाल कढ़ाई के साथ तैयार किया जाता है। यह ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे अहोम राजाओं के समय से पहचान मिली है। पिछले कुछ समय में यह प्रेम, सम्मान, और अभिवादन का प्रतीक बन चुका है। बिहू जैसे त्योहारों के दौरान इसे खासतौर पर प्रियजनों को भेंट किया जाता है।

स्थानीय बुनकरों की मेहनत

गमोसा को असम के चाय बागानों और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनकर हाथ से तैयार करते हैं। यह पारंपरिक हथकरघा उद्योग का हिस्सा है, जो केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि असम की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। स्थानीय बुनकरों की मेहनत इस गमछे को अद्भुत बनाती है, और इसकी वैल्यू को बढ़ाती है।

नई जिंदगी की शुरुआत

अब, फुलेश्वरी जी जैसे गमछा बनाने वाले परिवारों में नई उम्मीद जगी है। लोग सिर्फ गमछा खरीद रहे हैं, बल्कि उसके साथ उनकी मेहनत और संस्कृति को भी सराह रहे हैं। पीएम मोदी की एक छोटी सी पहल ने इस पारंपरिक वस्त्र को एक नई पहचान दी है। बड़े शहरों से लेकर छोटे गांवों तक, गमछा अब हर जगह छा गया है।

कहा मिलता है गमोसा?

आप गमोसा को असम के कई बाजारों में देख सकते हैं, जहां स्थानीय बुनकर इसे बेचते हैं। गुवाहाटी के मेघालय और असम के अन्य हिस्सों में यह आसानी से उपलब्ध है। लेकर चलें अपने घर की पहचान, क्योंकि यह गमछा अब सिर्फ एक वस्त्र नहीं, बल्कि गर्व और सम्मान का प्रतीक बन चुका है।

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