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February 13, 2026

देहरादून में बढ़ती आपराधिक वारदातें क्या बेखौफ अपराधियों ने पुलिस को दी खुली चुनौती?

The CSR Journal Magazine
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में हाल के दिनों में लगातार हो रही हत्याओं और फायरिंग की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजपुर रोड से लेकर विकासनगर और ऋषिकेश तक फैली वारदातों से आमजन में दहशत का माहौल है और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

राजधानी में गोलियों की गूंज, बढ़ती असुरक्षा की भावना

राजधानी देहरादून में अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। हाल ही में राजपुर रोड स्थित सिल्वर सिटी कॉम्पलेक्स में जिम से बाहर निकल रहे एक युवक के सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना सुबह के समय हुई, जब आमतौर पर लोग अपने दैनिक कार्यों के लिए निकलते हैं। इस दुस्साहसी वारदात ने स्पष्ट कर दिया कि अपराधियों में कानून का कोई भय शेष नहीं है।
तीन दिन पहले 11 फरवरी को तिब्बती मार्केट के बाहर कारोबारी अर्जुन शर्मा की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने सार्वजनिक स्थान पर गोली मारकर हत्या की और फरार हो गए। इससे पहले 2 फरवरी को दूल्हा बाजार में गुंजन हत्याकांड ने भी शहर को हिला दिया था। आरोपी ने सरेआम धारदार हथियार से वार कर हत्या कर दी।
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं से आम नागरिकों में यह भावना गहराने लगी है कि राजधानी अब सुरक्षित नहीं रही। बाजार, जिम, शैक्षणिक क्षेत्र और सार्वजनिक स्थान तक अब अपराध से अछूते नहीं रहे हैं।

अपराध के पीछे कारण गैंगवार, व्यक्तिगत रंजिश या पुलिस की ढिलाई?

विशेषज्ञों का मानना है कि राजधानी में बढ़ती आपराधिक घटनाओं के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। कुछ मामलों में व्यक्तिगत रंजिश और पुरानी दुश्मनी प्रमुख कारण बनकर सामने आती है, तो कहीं जमीन या कारोबार से जुड़े विवाद हिंसक रूप ले लेते हैं। वहीं, कुछ घटनाएं सुनियोजित गैंगवार या आपराधिक गिरोहों की सक्रियता की ओर भी इशारा करती हैं। तेजी से शहरीकरण और बाहरी तत्वों की बढ़ती आवाजाही भी अपराध के स्वरूप को जटिल बना रही है।
सबसे गंभीर सवाल पुलिस की सक्रियता और खुफिया तंत्र पर उठ रहे हैं। यदि लगातार अपराधी बेखौफ होकर सरेआम वारदात को अंजाम दे रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है। हालांकि पुलिस कुछ मामलों में त्वरित कार्रवाई कर आरोपियों को गिरफ्तार करने में सफल रही है, लेकिन घटनाओं की पुनरावृत्ति यह संकेत देती है कि अपराधियों में भय का अभाव है। सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि युवा वर्ग में बढ़ता आक्रोश, नशे की प्रवृत्ति और बेरोजगारी भी अपराध की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। यदि इन सामाजिक कारणों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

क्या यह पुलिस प्रशासन के सामने खुली चुनौती है?

राजधानी में लगातार हो रही हत्याओं ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि पुलिस का दावा है कि अधिकतर मामलों में आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन आमजन की चिंता यह है कि अपराध होने से पहले रोकथाम क्यों नहीं हो पा रही। विकासनगर में 12वीं की छात्रा मनीषा तोमर की हत्या, ऋषिकेश में प्रीति रावत की गोली मारकर हत्या और तिब्बती मार्केट के बाहर कारोबारी की दिनदहाड़े हत्या जैसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि अपराध अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा।
यह स्थिति प्रशासन के लिए स्पष्ट संकेत है कि गश्त व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी, खुफिया नेटवर्क और अपराधियों की निगरानी प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मत है कि केवल गिरफ्तारी ही समाधान नहीं है, बल्कि अपराध की जड़ों पर प्रहार करना भी आवश्यक है।
राजधानी में कानून व्यवस्था की बहाली के लिए पुलिस, प्रशासन और समाज तीनों को मिलकर काम करना होगा। अन्यथा, अपराधियों के हौसले और बुलंद हो सकते हैं और दून की शांति पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।

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