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February 28, 2026

जज की थकान और बढ़ता कार्यभार: Allahabad High Court में सुनवाई रुकी

The CSR Journal Magazine
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने लंबी सुनवाई के बाद कार्यभार के कारण थकान महसूस करते हुए चंद्रलेखा सिंह की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा। जज का कहना था कि वे शारीरिक रूप से निर्णय लिखने में असमर्थ हैं। न्याय के इस हालात पर गंभीर चिंता जताई जा रही है।

सुनवाई का हाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 235 मामलों की सूची थी, जिनमें केवल 29 नए मामलों की ही हेयरिंग हो पाई। जस्टिस विद्यार्थी ने इस संदर्भ में कहा, “मैं भूखा, थका और शारीरिक रूप से निर्णय लिखाने में असमर्थ महसूस कर रहा हूं।” यह वाकया न केवल कोर्ट की स्थिति को दर्शाता है, बल्कि न्यायिक प्रणाली पर भी सवाल उठाता है।

क्या है चंद्रलेखा सिंह का मामला?

चंद्रलेखा सिंह की याचिका का यह मामला 2025 में कर्ज वसूली अधिकरण (DRT) के एक आदेश के खिलाफ दायर किया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया था और नए सिरे से सुनवाई के आदेश दिए थे। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है, जहां यह कहा गया है कि हाईकोर्ट को छह महीने के भीतर इस पर फैसला करना है।

समय सीमा का दबाव

हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा 24 फरवरी 2026 को समाप्त होने वाली है, लेकिन फिर भी मामला लंबित है। जज सुभाष विद्यार्थी ने बताया कि उनके सामने सुनवाई के लिए 235 केस थे, जिसमें अधिकतर पुराने मामले थे। इससे उनकी थकान और बढ़ गई थी।

अधिक मामलों की सुनवाई

जज ने बताया कि सुनवाई के दौरान केवल 29 नए मामलों की ही सुनी जा सकी। यह स्थिति न्याय प्रणाली में बढ़ते कार्यभार का संकेत देती है। समय सीमा के दबाव में काम करना कठिन होता जा रहा है, और जज भी इस परिस्थिति से परेशान हैं।

थकान के कारण निर्णय सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार इस मामले की सुनवाई शाम 4:15 बजे शुरू हुई और करीब 7:10 बजे तक चली। लंबी बहस के बाद जब जज ने कहा कि वे थक चुके हैं, तो यह दर्शाता है कि काम का बोझ कितना अधिक है। जज ने स्पष्ट किया कि यह थकान ही उनके निर्णय नहीं सुनाने का कारण है।

न्याय प्रणाली की चिंता

यह पूरी घटना न्यायिक प्रणाली में कार्यभार और जजों की कमी की स्थिति पर प्रकाश डालती है। जजों का यह हालात दर्शाता है कि न्यायालयों में लम्बी सुनवाई और मामले बढ़ते जा रहे हैं, जबकि जजों की संख्या कम होती जा रही है। इस स्थिति को सुधारने के लिए जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता है।
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