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January 24, 2026

भारत में मुंह के कैंसर का बड़ा कारण शराब और तंबाकू: 62% मामलों के लिए जिम्मेदार, देसी शराब सबसे खतरनाक

The CSR Journal Magazine
भारत में मुंह के कैंसर को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। नए शोध के मुताबिक खैनी, जर्दा, तंबाकू और शराब के सेवन से देश में मुंह के कैंसर के 62 फीसदी मामले सामने आ रहे हैं। शोध में यह भी पाया गया कि रोजाना सिर्फ एक पैग यानी नौ ग्राम शराब भी कैंसर का खतरा 50 फीसदी तक बढ़ा सकती है। खासकर देसी शराब और तंबाकू का संयुक्त सेवन इस बीमारी को कई गुना घातक बना रहा है।

शराब और तंबाकू जानलेवा गठजोड़

भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गए नए अध्ययन में साफ तौर पर सामने आया है कि शराब और तंबाकू का साथ में सेवन मुंह के कैंसर के खतरे को चार गुना तक बढ़ा देता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMजे) ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, शराब के साथ खैनी, जर्दा या अन्य चबाने वाले तंबाकू उत्पाद लेने से शरीर पर इनका असर कई गुना ज्यादा घातक हो जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में मुंह के कैंसर के हर दस में से छह मामले इन्हीं आदतों के कारण होते हैं।

देसी शराब क्यों है ज्यादा खतरनाक

अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ब्रांडेड शराब की तुलना में देसी शराब का जोखिम कहीं अधिक है। महुआ, देसी दारू, चुल्ली, अपोंग जैसी स्थानीय शराबों में अक्सर मेथनॉल और एसीटैल्डिहाइड जैसे जहरीले तत्व पाए जाते हैं। ये पदार्थ मुंह की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसरकारी तत्वों को शरीर में प्रवेश करने का रास्ता आसान बना देते हैं। शोध के अनुसार, देसी शराब पीने वालों में मुंह के कैंसर का खतरा 87 फीसदी तक बढ़ जाता है।

एक पैग भी नहीं है सुरक्षित

शोध की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शराब की बहुत कम मात्रा भी सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक रोजाना महज नौ ग्राम शराब, जिसे एक स्टैंडर्ड ड्रिंक माना जाता है, मुंह के कैंसर का खतरा 50 फीसदी तक बढ़ा देती है। यहां तक कि दो ग्राम से कम बीयर पीने पर भी जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया। शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि शराब के सेवन की कोई भी मात्रा सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।

भारत में मुंह के कैंसर की गंभीर स्थिति

अध्ययन के मुताबिक भारत में मुंह का कैंसर दूसरा सबसे आम कैंसर है। देश में हर साल इसके करीब 1.44 लाख नए मामले सामने आते हैं और लगभग 80 हजार लोगों की इससे मौत हो जाती है। यह कैंसर खासतौर पर गाल और होंठों की अंदरूनी परत यानी बक्कल म्यूकोसा को प्रभावित करता है। चिंता की बात यह है कि इस बीमारी से पीड़ित सिर्फ 43 फीसदी मरीज ही पांच साल तक जीवित रह पाते हैं। पुरुषों और युवाओं में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

जागरूकता और सख्त नियमों की जरूरत

शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत में शराब से जुड़े नियम जटिल और असमान हैं। जहां ब्रांडेड शराब पर कुछ हद तक नियंत्रण है, वहीं देसी शराब का बाजार लगभग अनियंत्रित है। कई बार इनमें अल्कोहल की मात्रा 90 फीसदी तक पाई गई है, जो बेहद खतरनाक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर शराब और तंबाकू के सेवन से बचा जाए, तो भारत में मुंह के कैंसर के मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके लिए सख्त नियमों, जन-जागरूकता और समय पर जांच को बेहद जरूरी बताया गया है।
शराब और तंबाकू सिर्फ आदत नहीं, बल्कि गंभीर जानलेवा जोखिम हैं। खासकर देसी शराब और चबाने वाले तंबाकू उत्पादों से दूरी बनाकर ही भारत में मुंह के कैंसर की भयावह स्थिति को बदला जा सकता है।

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