मुंबई की विशेष अदालत के एक फैसले ने महाराष्ट्र की राजनीति और सहकारिता जगत में सालों से चल रही बहस को नया मोड़ दे दिया है। महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (MSCB) से जुड़े कथित 25,000 करोड़ रुपये के घोटाले में उपमुख्यमंत्री अजित पवार और उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार सहित 70 से अधिक नामजद लोगों को अदालत ने क्लीन चिट दे दी है। कोर्ट ने मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिससे यह मामला कानूनी रूप से लगभग समाप्ति की ओर बढ़ गया है।
कोर्ट का साफ संदेश: ‘कोई आपराधिक मामला नहीं बनता’
विशेष न्यायाधीश महेश जाधव ने EOW की ‘सी-समरी रिपोर्ट’ को मंजूरी देते हुए कहा कि जांच में ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया, जिससे आपराधिक मुकदमा चलाया जा सके। सी-समरी रिपोर्ट का सीधा मतलब होता है कि मामला अपराध की श्रेणी में नहीं आता। अदालत के इस फैसले के साथ ही अजित पवार, सुनेत्रा पवार और अन्य आरोपियों को कानूनी तौर पर बड़ी राहत मिल गई है।
कहां से शुरू हुआ था पूरा विवाद?
यह मामला 2019 में सामने आया था, जब बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश पर महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। आरोप था कि 2002 से 2017 के बीच कई चीनी मिलों (शुगर फैक्ट्रियों) को नियमों के खिलाफ कर्ज दिए गए, ब्याज में रियायतें दी गईं और बाद में कर्ज वसूली के नाम पर फैक्ट्रियों और उनकी जमीनों को बेहद कम कीमत पर नीलाम कर दिया गया। शुरुआती जांच में दावा किया गया कि इससे राज्य को करीब 25,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। उस समय अजित पवार बैंक के निदेशक मंडल से जुड़े थे, इसलिए उनका नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया था। इसी वजह से यह मामला राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील बन गया।
EOW की जांच में क्या निकला?
आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने करीब 35 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट तैयार की, जिसमें तीन बड़े ट्रांजैक्शन और कुछ प्रमुख शुगर फैक्ट्रियों की जांच की गई। जांच एजेंसी का निष्कर्ष था कि:
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किसी तरह की आपराधिक साजिश के ठोस सबूत नहीं मिले
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बैंक को वास्तविक वित्तीय नुकसान साबित नहीं हो पाया
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जांच के दायरे में आए लोन से ₹1,343 करोड़ से ज्यादा की वसूली पहले ही हो चुकी है

