राजस्थान की राजधानी जयपुर में रमजान से पहले मुस्लिम धर्मगुरुओं ने मस्जिदों के लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। इस पहल का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ बुजुर्गों, मरीजों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की सहूलियत का ध्यान रखना है। धर्मगुरुओं ने स्पष्ट किया कि इबादत के साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाना भी इस्लाम का अहम हिस्सा है।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बना जयपुर
राजस्थान लंबे समय से अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी सौहार्द के लिए जाना जाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जयपुर के मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पवित्र रमजान माह के आगाज़ से पहले एक सराहनीय कदम उठाया है। धर्मगुरुओं ने शहर की विभिन्न मस्जिद कमेटियों को निर्देश दिया है कि रमजान के दौरान लाउडस्पीकर का इस्तेमाल संयम और जिम्मेदारी के साथ किया जाए। खासतौर पर सेहरी के समय होने वाली घोषणाओं में ध्वनि स्तर सीमित रखा जाए ताकि आसपास के लोगों को असुविधा न हो। इस पहल का मकसद किसी परंपरा को खत्म करना नहीं, बल्कि बदलते शहरी परिवेश में उसे संतुलित और संवेदनशील तरीके से निभाना है। जयपुर जैसे घनी आबादी वाले शहर में यह कदम सामाजिक समरसता की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बुजुर्गों, मरीजों और विद्यार्थियों की सुविधा सर्वोपरि
रमजान में अलसुबह सेहरी के लिए लोगों को जगाने की परंपरा सदियों पुरानी है। पहले यह काम व्यक्तिगत तौर पर किया जाता था, लेकिन समय के साथ लाउडस्पीकर का उपयोग बढ़ा। हालांकि, शहर के कई इलाकों जैसे परकोटा, टोंक रोड और कोचिंग हब में घनी आबादी के साथ अस्पताल और शिक्षण संस्थान भी बड़ी संख्या में हैं। ऐसे में तेज आवाज कई बार मरीजों, बुजुर्गों और परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए परेशानी का कारण बनती है। धर्मगुरुओं ने अपील की है कि लाउडस्पीकर की आवाज केवल मस्जिद के आसपास सीमित दूरी तक ही रहे। अनावश्यक रूप से बार-बार अनाउंसमेंट न किए जाएं। इस पहल को समाज के सभी वर्गों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।
‘दीन के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी’
दारुल उलूम रजविया के मुफ्ती हिफजुर्रहमान मिस्बाही ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जरूरत से ज्यादा या बार-बार (जैसे हर 10 मिनट में) घोषणा करना उचित नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मजहबी कर्तव्यों के साथ सामाजिक दायित्व निभाना भी हर मुसलमान का फर्ज है। वहीं शहर मुफ्ती मोहम्मद जाकिर नोमानी ने इस्लाम की मूल शिक्षाओं का हवाला देते हुए ‘पड़ोसी के हक’ को अहम बताया। उन्होंने कहा कि इस्लाम दूसरों की सहूलियत और अधिकारों का सम्मान करना सिखाता है। इसलिए मस्जिद कमेटियां सीमित साउंड सिस्टम या कम आवाज वाले स्पीकरों का ही उपयोग करें। धर्मगुरुओं का मानना है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक संवेदनशीलता एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। रमजान आत्मसंयम, करुणा और अनुशासन का महीना है, इसलिए ध्वनि अनुशासन भी उसी का हिस्सा होना चाहिए।
शिया समाज की अनूठी पहल और संवाद की अपील
जयपुर की शिया जामा मस्जिद के इमाम-ए-जुमा, सैय्यद नाजिश अकबर काजमी ने बताया कि उनके समाज की मस्जिदों से सेहरी के लिए लाउडस्पीकर पर ऐलान नहीं किया जाता। इसके बजाय रमजान का टाइम-टेबल छपवाकर पहले ही घर-घर बांट दिया जाता है। यह पहल तकनीकी शोर से दूर रहते हुए परंपरा को निभाने का एक सकारात्मक उदाहरण बनकर सामने आई है।
धर्मगुरुओं ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि किसी को लाउडस्पीकर की आवाज से असुविधा हो, तो वे विवाद या टकराव का रास्ता न अपनाएं। सीधे मस्जिद प्रबंधन से संवाद करें। आपसी समझदारी और भाईचारे से ही समाधान संभव है। जयपुर की यह पहल न केवल राजस्थान बल्कि देशभर के लिए एक प्रेरक संदेश है धर्म और सामाजिक जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकते हैं। रमजान के पवित्र अवसर पर यह कदम सौहार्द, संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान की नई मिसाल बनकर उभरा है।

