राजस्थान में विकास की रफ्तार इन दिनों बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स की सुस्त चाल के कारण सवालों के घेरे में है। करोड़ों नहीं, बल्कि लाखों करोड़ रुपए की लागत से शुरू की गई परियोजनाएं तय समय सीमा के बाद भी अधूरी पड़ी हैं। नतीजा यह है कि लागत दोगुनी-तिगुनी हो रही है और जनता को मिलने वाला लाभ लगातार टलता जा रहा है। अनुमान है कि सिर्फ दस प्रमुख परियोजनाओं में देरी से करीब 1.15 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है, जिसने राज्य की विकास योजनाओं पर ब्रेक लगा दिया है।
राजस्थान के 10 बड़े प्रोजेक्ट में भारी देरी
राजस्थान में विकास के नाम पर शुरू किए गए कई बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट तय समय सीमा से पीछे चल रहे हैं। लागत में दोगुनी-तिगुनी बढ़ोतरी ने राज्य की वित्तीय सेहत पर दबाव बढ़ा दिया है। अनुमान है कि यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी होतीं तो करीब 1.15 लाख करोड़ रुपए की बचत संभव थी। अब सवाल उठ रहा है कि इस आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
औद्योगिक और फ्रेट परियोजनाएं लागत में बेतहाशा वृद्धि
राज्य की सबसे बड़ी परियोजनाओं में शामिल बालोतरा जिले के पचपदरा में बन रही राजस्थान रिफाइनरी की शुरुआत 43,129 करोड़ रुपए की लागत से हुई थी, जिसे अक्टूबर 2022 तक पूरा होना था। अब इसकी समय सीमा मार्च 2026 कर दी गई है और लागत बढ़कर 79,459 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। अब तक 63,571 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं। यह परियोजना राज्य के औद्योगिक विकास की रीढ़ मानी जाती है, लेकिन देरी ने इसकी आर्थिक उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी तरह वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की शुरुआती लागत 51,101 करोड़ रुपए थी, जिसे मार्च 2022 तक पूरा होना था। अब इसकी नई डेडलाइन मार्च 2026 है और लागत 1,24,623 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है। यह कॉरिडोर माल परिवहन की गति बढ़ाने और उद्योगों को मजबूती देने के लिहाज से बेहद अहम है।
रेल परियोजनाएं वर्षों की देरी, दोगुनी होती लागत
रामगंजमंडी-भोपाल नई रेल लाइन की प्रारंभिक लागत 3,032 करोड़ रुपए थी, जिसे दिसंबर 2025 तक पूरा किया जाना था। अब लक्ष्य दिसंबर 2027 निर्धारित है और लागत बढ़कर 5,073 करोड़ रुपए हो गई है।
नीमच-बड़ी सादड़ी रेल लाइन भी लागत वृद्धि का शिकार हुई है। 495 करोड़ रुपए की यह परियोजना अब 825 करोड़ तक पहुंच गई है। इसी तरह धौलपुर-सरमथुरा रेल लाइन का नैरोगेज से ब्रॉडगेज में परिवर्तन 2019 तक पूरा होना था, लेकिन अब 2027 लक्ष्य तय किया गया है। आठ साल की देरी से इसकी लागत कई गुना बढ़ चुकी है। इन रेल परियोजनाओं की देरी से आम जनता को बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ नहीं मिल पा रहा, वहीं व्यापार और परिवहन क्षेत्र भी प्रभावित हैं।
एक्सप्रेस-वे और पुल निर्माण आधा काम, पूरा खर्च
कोटा जिले में दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेस-वे के तहत मुकुंदरा हिल्स टनल परियोजना 1,000 करोड़ रुपए की लागत से 2019 में शुरू हुई थी। दिसंबर 2024 की जगह अब अप्रैल 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है। देरी के कारण करीब 50 करोड़ रुपए की अतिरिक्त लागत का अनुमान है। डूंगरपुर में बेणेश्वर धाम पुल की लंबाई 1,345 मीटर है और इसे 132 करोड़ रुपए की लागत से शुरू किया गया था। अब इसकी लागत लगभग 20 करोड़ रुपए बढ़ चुकी है। दिसंबर 2024 की बजाय मार्च 2026 नई समयसीमा तय की गई है। अब तक करीब 100 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, जबकि कार्य केवल 60 प्रतिशत ही पूरा हुआ है।
आरओबी और ओवरब्रिज बजट अभाव और समन्वय की कमी
झुंझुनूं पुलिस लाइन आरओबी परियोजना 2019 में 51 करोड़ रुपए से शुरू हुई थी, लेकिन बजट अभाव के कारण इसकी लागत लगभग दोगुनी होने की स्थिति में है। जनवरी 2027 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है हनुमानगढ़-सतीपुरा आरओबी परियोजना में छह साल की देरी हो चुकी है। 60 करोड़ की लागत अब 7 करोड़ बढ़ चुकी है। अधिकारियों के अनुसार समन्वय की कमी इसका मुख्य कारण है। भीलवाड़ा के जोधडास ओवरब्रिज का कार्य भी पांच साल से लंबित है। 52 करोड़ की परियोजना में अब तक 30 करोड़ खर्च हो चुके हैं और जुलाई 2026 तक पूरा करने का दावा किया जा रहा है।
इन सभी परियोजनाओं में देरी ने न केवल लागत बढ़ाई है, बल्कि प्रदेश के विकास की रफ्तार भी धीमी कर दी है। राजनीतिक खींचतान, प्रशासनिक ढिलाई और निर्माण एजेंसियों की मनमानी का खामियाजा आम जनता भुगत रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि समयबद्ध निगरानी और जवाबदेही तय किए बिना ऐसे प्रोजेक्ट भविष्य में भी आर्थिक बोझ बनते रहेंगे।
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