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आजादी के ७० वर्षो में भारत में महिलाएँ कितनी आजाद हुई है?

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आए दिन अखबारों के पन्ने काली स्याही से भरे होते हैं, स्याही समाचारों से।कभी निर्भया की दिल दहलाने वाली दास्तान तो कभी किसी मासूम की सिसकियाँ जिसने अभी तक लड़की होने का फर्क भी जाना न था।अब हमारा समाज इन बातों का आदि सा हो गया लगता है।हमारा देश महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में बलात्कार के मामले मैं विशव मैं चौथे नंबर पर आता है नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के अनुसार २०१७ मैं महिलाओ के यौन उत्पीड़न के मामलो की दर हर घंटे मैं ६ बलात्कार दर्ज होने की है।२०१६ मैं भारत मैं यौन उत्पीड़न के ३४,६०० मामले दर्ज हुए जिनमे से ज्यादा मामले दिल्ली मैं सामने आए।३४,६०० मैं से तकरीबन ३४,००० मामलों मैं आरोपी पीड़ितो के परिवार या परिचितजन थे ।

हैरान करने वाली बात ये है की भारत जैसे धर्मभीरु देश में जहाँ पर नारी को देवी का स्थान दिया जाता है, इतना घिनौना अपराध, इतनी हैवानियत क्यों? हम सभी जानते है कीभारत विश्व के चुनिंदा विकासशील देशो मैं अग्रणी स्थान पर है ।हमारे देश की महिलाओं ने चाँद पर कदम रख दिया है।नारी सशक्तीकरण का नारा आज हम जोर-शोर से बुलंद करते है।लेकिन कथनी और करनी का अंतर आज भी साफ़ नजर आता है।केवल नारेबजी के जरिए समाज को बदला नहीं जा सकता।आज भी नौकरीपेशा महिलाओं को प्रमोशन पाने के लिए कई समझौते करने पड़ते है।कास्टिंग काउच जैसे शब्द से हम सभी परिचित हैं।ग्लैमर की दुनिया भी नारी को शोषित करने के मामले मैं काफी बदनाम है।कुछ वर्षो पहले रिंकू नमक छात्रा को उसके स्कूल में जिंदा जला देने की भयानक घटनाके हम सभी साक्षी हैं। आज भी दिल्ली-मुंबई जैसी मेट्रो सिटीज में भी रात के वक्त अकेले लड़की का घर से बहार निकलना सुरक्षित नहीं है।

हमारा सविंधान हर एक भारतीय को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बराबर के अधिकार देता है। परंतु यह केवल संविधान की पुस्तक तक ही सीमित रह गया है।आम मानस पटल तक यह विचार पहुँच ही नहीं पाया।उस पर हमारे जन प्रतिनिधयों के बयान आते है। “महिलाये छोटे कपडे पहनकर पुरुषो को उत्तेजित करती हैं, इसलिए बलात्कार की शिकार होती है।” ऐसे बयान देते वक्त हमारे रक्षक, हमारे नेता यह भूल जाते हैं कि एक नारी की देह, उसकी अपनी सम्पति है।उसे नियमों में, मर्यादा में बांधने का निर्णय केवल उसका अपना है।किसी भी अन्य को उसका चरित्र हनन करने या, उसकी अस्मिता से खिलवाड़ करने काकोई हक़ नहीं।यदि छोटे कपडो से मर्द उत्तेजित होते है तो क्या आज तक बुर्का पहनने वाली किसी कड़की का बलात्कार नहीं हुआ? क्या २ वर्ष की मासूम बच्ची, जिसे अभी तक अपनी शारीरिक रचना का, लड़के-लड़की मैं फर्क का ज्ञान नहीं था, उसका बलात्कार नही हुआ?

आज व्याभिचार की ये जो लहर समाज में फेंल रही है, इसका उत्तरदायी कौन है? “हम सभी” हम सब इसके जिम्मेदार है।हम महिलाओं के छोटे कपडे, उघडे शरीर और सिनेमा को दोषी ठहरा कर अपना पल्ला झाड़ सकते है पर क्या हम कभी अपने संस्कारो को, अपनी परवरिश को ज़िम्मेदार ठहराते हैं? महज नारी मुक्ति या नारी सशक्तीकरण का नारा बुलंद करने से स्थिति नहीं सुधर सकती। शुरुआत अपने घर से करनी होगी।हमें अपने बेटों को बचपन से यह सिखाना होगा की उन्हें हर लड़की, हर स्त्री का सम्मान करना है।उन्हें बताना होगा की नारी पूजनीय होना नहीं चाहती, आदरणीय होना चाहती है।

राजनितिक गलियारों में भी आज महिलाएं एक सफल राजनीतिज्ञ बन कर उभरी हैं।मीड़िया द्वारा महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए जागरूक किया जा सकता है।कई संस्थाएँ है जो गाँव देहातों मैं महिलाओं को शिक्षित करने और उन्हें उनकी योग्यतानुसार उचित अवसर देने का कार्य सफलता पूर्वक कर रही हैं।जरुरत यह भी है की हम समाज को दो वर्गो मैं बाँटना बंद कर दें।पुरुष और महिला होने का तमगा हटा दें। दोनो को केवल इंसान समझने की जरुरत है।यही पहला कदम होना चाहिए।महिलाओं के खिलाफ अपराध तभी रुकेगा जब पुरुष समाज उन्हें एक स्त्री की तरह न देखकर एक इंसान की तरह देखे। हर क्षेत्र मैं पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली स्त्री को वास्तव मैं बराबरका हक़ मिलना चाहिए।उसे अपनी शर्तो पर, अपनी मर्जी से जिंदगी जीने की आज़ादी मिलनी चाहिए।तभी हम सच्चे मायनों में खुद को आजाद कह पाएँगे।

दूसरा हल इस समस्या का खुद महिलाओं के हाथ में है।महिलाएँ खुद को कमतर समझना बंद कर दें तभी वह समाज को समझा पाएँगी की वो बराबरी का माददा रखती हैं। मैं जगह-जगह पर होने वाले नारी सम्मेलनों, महिला शिक्षा संस्थानों, नारी संगठानों आदि से इत्तफाक नहीं रखता।इन सबसे हम महिलाओं की मदद नहीं करते, बल्कि ऐसा करने से हम महिलाओं और पुरुषों को बाटँते है।सहशिक्षा संस्थानों की बात की जाये, नारी संगठनों मैं पुरुषो की भी भागीदारी हो, नारी सम्मलेन आयोजित न करके सामाजिक सम्मलेन किये जाएँ, जहाँ स्त्री-पुरुष दोनों की सामान भूमिका हो। दुनिया की आबादी को दो हिस्सों में न बाँट कर इसे एक विश्व की ताकत के रूप में देखा जाए, तभी हम अपने मकसद में कामयाब हो पाएँगे।