एमपी डिजिटल विधानसभा- पेपरलेस नेवा प्रणाली के साथ शुरू होगा नया शीतकालीन सत्र

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एमपी विधानसभा में डिजिटल बदलाव: विधायकों के लिए नया पेपरलेस सिस्टम, सर्दी में शुरू होगा नया सत्र

मध्य प्रदेश विधायी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात होने जा रहा है। राज्य की 16वीं विधानसभा का 12वां शीतकालीन सत्र आगामी 7 दिसंबर से आयोजित होने जा रहा है, जो तकनीकी दृष्टि से अत्यंत ऐतिहासिक और क्रांतिकारी साबित होगा। राज्यपाल मंगुभाई पटेल की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद विधानसभा सचिवालय ने इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इस बार का पांच दिवसीय सत्र पूरी तरह डिजिटल होगा, जिसके तहत दशकों से चली आ रही पारंपरिक कागजी प्रक्रिया को हमेशा के लिए समाप्त कर नेशनल ई-विधान एप्लिकेशन (NeVA) प्रणाली का शुभारंभ किया जा रहा है। इस नए सिस्टम के लागू होने से न केवल करोड़ों रुपये के राजस्व और हजारों टन कागजों की बचत होगी, बल्कि विधायी कामकाज में अभूतपूर्व पारदर्शिता और गति भी देखने को मिलेगी। यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘डिजिटल इंडिया’ विजन और न्यूनतम सरकार-अधिकतम शासन (Minimum Government, Maximum Governance) के सिद्धांत को धरातल पर उतारने की दिशा में मध्य प्रदेश सरकार की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

सत्र का पूरा कार्यक्रम और एजेंडा

विधानसभा सचिवालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह शीतकालीन सत्र 7 दिसंबर से शुरू होकर 11 दिसंबर तक चलेगा। कुल पांच दिनों की अवधि वाले इस संक्षिप्त सत्र की सबसे खास बात यह है कि इसके बीच में कोई भी शासकीय अवकाश नहीं रखा गया है। सदन की कार्यसूची के मुताबिक, सत्र के शुरुआती चार दिन यानी 7 से 10 दिसंबर तक केवल प्रश्नोत्तर काल और शासकीय कार्य संपादित किए जाएंगे। वहीं, सत्र के अंतिम दिन 11 दिसंबर (शुक्रवार) को दोपहर 1:30 बजे के बाद अशासकीय कार्य (निजी संकल्प और विधेयक) सदन के पटल पर लिए जाएंगे। इस संक्षिप्त अवधि के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली राज्य सरकार चालू वित्तीय वर्ष के लिए अपना दूसरा अनुपूरक बजट पेश करेगी, जिसे पारित कराना सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल है। इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण विधायी संशोधन विधेयक भी इस सत्र के दौरान पटल पर रखे और पारित कराए जाएंगे।

क्या है ‘नेवा’ (NeVA) प्रणाली और कैसे बदलेगा सिस्टम?

मध्य प्रदेश विधानसभा को पूरी तरह पेपरलेस बनाने के लिए केंद्र सरकार के संसदीय कार्य मंत्रालय की मदद से ‘नेशनल ई-विधान एप्लिकेशन’ (NeVA) को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है। इस प्रणाली के तहत सदन के भीतर प्रत्येक विधायक की टेबल पर अत्याधुनिक डिजिटल टच-स्क्रीन और टैबलेट लगाए गए हैं। अब तक विधायकों को विधानसभा में सवाल पूछने के लिए भौतिक रूप से कागज पर लिखकर फॉर्म जमा करना पड़ता था, जिसके बाद उसकी छपाई होती थी और संबंधित विभागों को फाइलें भेजी जाती थीं। लेकिन अब इस डिजिटल क्रांति के बाद विधायकों को विधानसभा परिसर में उपस्थित रहने की भी बाध्यता नहीं होगी। वे अपने घर, क्षेत्र या यात्रा के दौरान भी अपने टैबलेट या लैपटॉप के माध्यम से आधिकारिक पोर्टल मप्र विधानसभा नेवा पोर्टल पर जाकर सीधे अपने लॉगिन आईडी और पासवर्ड की मदद से सवाल दर्ज करा सकेंगे।

रियल टाइम स्टेटस और पारदर्शिता

डिजिटल सिस्टम में सुरक्षा और गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा गया है, जिसके लिए प्रत्येक सदस्य को 8 से 15 अक्षरों का एक बेहद कड़ा पासवर्ड बनाना अनिवार्य किया गया है। जैसे ही कोई विधायक अपने पोर्टल पर लॉगिन करेगा, उसके सामने एक व्यक्तिगत डैशबोर्ड खुलेगा। इस डैशबोर्ड पर वे अपनी पिछली डिजिटल गतिविधियों, तारांकित-अतारांकित प्रश्नों, ध्यानाकर्षण प्रस्तावों और शून्यकाल की सूचनाओं का पूरा ब्योरा लाइव देख सकेंगे। इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘रियल टाइम स्टेटस’ ट्रैकिंग सिस्टम है। जब तक कोई विधायक अपने प्रश्न को केवल ‘Save’ करके रखेगा, वह ड्राफ्ट मोड में रहेगा और स्क्रीन पर लाल पट्टी में दिखाई देगा। इस दौरान वे जब चाहें ‘Edit’ विकल्प में जाकर सुधार कर सकते हैं। परंतु, जैसे ही विधायक संतुष्ट होकर ‘Send’ बटन दबाएंगे, वह सवाल सीधे विधानसभा सचिवालय के सर्वर पर ट्रांसफर हो जाएगा और उसी सेकंड सिस्टम द्वारा एक यूनिक डिजिटल डायरी नंबर, तारीख और समय के साथ जारी कर दिया जाएगा। इसके बाद विधायक और आम जनता सीधे स्क्रीन पर देख सकेंगे कि सवाल ‘विचाराधीन’ (Under Consideration) है, ‘स्वीकृत’ (Accepted) हो चुका है या फिर खारिज कर दिया गया है।

पर्यावरण संरक्षण और करोड़ों की बचत

विधानसभा के इस पूर्ण रूप से डिजिटलीकरण होने से राज्य को व्यापक लाभ होने की उम्मीद है। पूर्व के सत्रों में हजारों प्रश्नों, उनके उत्तरों, विधेयकों की कॉपियों और कार्यसूची को छापने के लिए कई टन कागजों का इस्तेमाल होता था। इसके लिए न केवल लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते थे, बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचता था। विशेषज्ञों और विधायी अधिकारियों के अनुसार, पेपरलेस प्रणाली लागू होने से मध्य प्रदेश सरकार को सालाना करीब 54 करोड़ रुपये के राजस्व की सीधी बचत होने का अनुमान है। फाइलों को एक विभाग से दूसरे विभाग में भेजने में लगने वाला समय पूरी तरह बच जाएगा और समय सीमा के भीतर विभागों के जवाब ऑनलाइन अपलोड हो जाएंगे।

विधायकों को दी गई विशेष ट्रेनिंग

इस पूरी व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और सचिवालय के अधिकारियों की देखरेख में सभी 230 विधायकों, उनके निजी सहायकों (PAs) और विभिन्न शासकीय विभागों के नोडल अधिकारियों को अक्टूबर के अंत में विशेष प्रशिक्षण दिया जा चुका है। विधायकों को पांच अलग-अलग बैचों में बांटकर टैबलेट संचालन, सुरक्षा प्रोटोकॉल और ऑनलाइन प्रश्न सबमिशन की व्यावहारिक ट्रेनिंग दी गई, ताकि सत्र के दौरान किसी भी सदस्य को तकनीकी समस्या का सामना न करना पड़े।

विपक्ष की रणनीति और हंगामे के आसार

एक तरफ जहां सरकार इस सत्र को तकनीकी मील का पत्थर बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने सत्र की कम अवधि को लेकर तीखे तेवर अपनाए हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार पर जनता के बुनियादी सवालों से भागने का आरोप लगाया है। विपक्ष का कहना है कि प्रदेश में किसानों की समस्याएं, खाद-बीज की किल्लत, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, सागर और देवास में जहरीली शराब से हुई मौतें जैसे कई ज्वलंत मुद्दे हैं, जिन पर व्यापक चर्चा के लिए 5 दिन का समय बेहद कम है। कांग्रेस विधायक दल ने इन मुद्दों पर सरकार को सदन के भीतर और बाहर घेरने की पूरी रणनीति तैयार की है, जिससे इस पहले ऐतिहासिक पेपरलेस सत्र के काफी हंगामेदार रहने के आसार हैं।

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