फ्रांस ने जिस टेक्नोलॉजी को देने से किया था इनकार, DRDO ने भारत में ही बनाया, जानिए राफेल से जुड़ी ये सीक्रेट स्टोरी

The CSR Journal Magazine
भारत ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड (GaN) सेमीकंडक्टर तकनीक का विकास कर लिया है, जिसे फ्रांस ने देने से मना कर दिया था। यह तकनीक रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। DRDO ने दिल्ली स्थित सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (SSPL) और हैदराबाद स्थित गैलियम आर्सेनाइड टेक्नोलॉजी इनेबलिंग सेंटर (GAETEC) के सहयोग से इस तकनीक को विकसित किया है। GaN तकनीक का मतलब है कि भारत ने अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर बनाने की क्षमता हासिल कर ली है। इस तकनीक का उपयोग रडार, मिसाइलों के सीकर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और हाई-पावर मिलिट्री कम्युनिकेश में होता है।

GaN तकनीक का महत्व

GaN का पूरा नाम गैलियम नाइट्राइड है। यह ज्यादा ताकतवर रडार सिग्नल पैदा करता है और रडार की क्षमता को बढ़ाता है। आधुनिक एडवांस AESA रडार में GaN तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। फ्रांस ने 2016 में GaN तकनीक देने से इनकार कर दिया था, जब भारत ने राफेल लड़ाकू विमान के लिए यह तकनीक मांगी थी। फ्रांस ने इसे संवेदनशील बताया था, जबकि भारत ने 50 प्रतिशत ऑफसेट डील के हिस्से के रूप में इसे मांगा था।

DRDO की उपलब्धि और भविष्य की संभावनाएं

नवंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने बताया कि SSPL ने 4-इंच सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) वेफर और 150 वॉट तक के GaN HEMT बनाने की स्वदेशी क्षमता विकसित कर ली है। इसके अलावा, 40 वॉट तक की क्षमता वाले GaN-आधारित MMIC भी विकसित किए गए हैं। GaN तकनीक से भारत की सैन्य ताकत में इजाफा होगा। GaN आधारित MMIC से ज्यादा शक्तिशाली और क्षमता वाला AESA रडार डेवलप करने में मदद मिलेगी। इससे दुश्मन के विमानों और लक्ष्यों का पता लगाने की क्षमता बेहतर हो जाएगी।

चुनौतियां और समाधान

हालांकि, भारत को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना है। पहले, बड़े पैमाने पर स्वदेशी उत्पादन की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। दूसरे, इन चिप्स को तेजस, AMCA, युद्धपोतों और एयर डिफेंस सिस्टम के रडार में इंटीग्रेट करना होगा। तीसरे, विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करते हुए पूरी सप्लाई चेन तैयार करना जरूरी है। GaN-आधारित चिप्स बनाना आसान नहीं है।

विशेषज्ञों की राय

भारतीय वायुसेना के पूर्व पायलट विजयेन्द्र के ठाकुर ने कहा कि DRDO ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इसे बनाने के लिए अत्यधिक सटीकता की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि यदि भारत का कोई लड़ाकू विमान दुश्मन के विमान को 150 या 200 किलोमीटर की दूरी से पहचानने की कोशिश कर रहा है, तो इसके लिए एक अच्छा रडार होना जरूरी है। GaN आधारित MMIC इसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, भारत अभी भी बहुत उच्च शुद्धता वाली गैसों और विशेष रिएक्टरों का आयात करता है। इनकी कीमत सैकड़ों करोड़ रुपये तक हो सकती है। GaN तकनीक से भारत की सैन्य ताकत में इजाफा होगा और यह देश को आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम और बढ़ाएगा।

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