बंगाल के काली मंदिरों में कमल की बढ़ी मांग, अड़हुल के फूलों का चलन घटा

The CSR Journal Magazine

राजनीतिक बदलाव का असर

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में हाल ही में सत्ता परिवर्तन के बाद न केवल राजनीतिक माहौल में बदलाव आया है, बल्कि भक्ति के तरीकों में भी नया मोड़ आया है। अब काली मंदिरों में देवी-देवताओं को अर्पित करने के लिए भक्त कमल के फूलों का चयन कर रहे हैं। दक्षिणेश्वर से कालीघाट तक के मंदिरों में मां काली के लिए अड़हुल के फूल की जगह कमल का फूल अधिक पसंद किया जा रहा है। इस साल बंगाल में कमल की फसल भी जबरदस्त हुई है, जिससे इसकी मांग में तेजी आई है।

कमल का फूल बना पसंदीदा

कमल का फूल, जो पहले केवल विशेष अवसरों पर ही अर्पित किया जाता था, अब रोजमर्रा की पूजा का हिस्सा बन गया है। अप्रैल में बीजेपी की पश्चिम बंगाल में जीत के बाद, कमल का फूल तेजी से लोकप्रियता हासिल कर रहा है। धार्मिक स्थलों पर अड़हुल के फूलों की जगह अब गुलाबी और सफेद कमल की मांग बढ़ गई है। भक्तों के बीच कमल प्रसाद का नया चलन भी देखने को मिल रहा है।

पुजारियों का समर्थन

बिष्णुपुर मंदिर के पुजारी बापी बनर्जी ने बताया कि कमल के फूल ने अड़हुल की जगह ले ली है। उन्होंने कहा कि वह भी भक्तों को कमल चढ़ाने की सलाह दे रहे हैं, क्योंकि देवताओं को यह फूल पसंद है। तारकेश्वर काली मंदिर के पुजारी असीम मुखोपाध्याय ने कहा कि अड़हुल के फूल चढ़ाने की परंपरा 18वीं सदी में शुरू हुई थी, लेकिन अब कमल के साथ रामप्रसाद सेन का युग समाप्त हो गया है।

बीजेपी कार्यकर्ताओं की भूमिका

फूल विक्रेता असित संतरा ने बताया कि जैसे ही सरकार बदली, कमल की मांग में तेजी आई। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने रैलियों और सजावट के लिए बड़ी मात्रा में कमल खरीदना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद बीजेपी नेताओं ने कई काली पूजाओं पर नियंत्रण कर लिया है। ऐसे में कमल फूल की डिमांड और बढ़ने की संभावना है।

आध्यात्मिक केंद्रों में बदलाव

दक्षिणेश्वर और कालीघाट जैसे प्रमुख मंदिरों में भी भक्त अब कमल के फूल अर्पित कर रहे हैं। यह बदलाव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि राजनीतिक बदलाव का भी संकेत देता है। भक्तों का मानना है कि कमल का फूल मां काली को प्रसन्न करता है और इससे उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं।

कमल का बढ़ता चलन

कमल का फूल अब केवल पूजा का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि यह एक सांकेतिक रूप ले चुका है। भक्तों के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही यह राजनीतिक प्रतीक भी बन गया है। कमल की बढ़ती मांग से यह स्पष्ट होता है कि भक्त अब अपने धार्मिक आस्था के साथ-साथ राजनीतिक पहचान को भी जोड़ने लगे हैं।

भक्ति और राजनीति का संगम

इस बदलाव ने यह साबित कर दिया है कि भक्ति और राजनीति का गहरा संबंध है। भक्त अब कमल के फूलों के माध्यम से अपनी आस्था को व्यक्त कर रहे हैं, जो कि राजनीतिक परिवर्तनों का भी संकेत है। यह न केवल धार्मिक परंपराओं में बदलाव है, बल्कि समाज में भी एक नई दिशा की ओर इशारा करता है।

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