महिलाओं का डर और ढोंगी बाबाओं का मायाजाल: पढ़ी-लिखी महिलाएं क्यों बनती हैं अंधविश्वास का शिकार?

The CSR Journal Magazine
भारत में ढोंगी बाबाओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो अंधविश्वास फैलाकर लोगों का शोषण कर रहे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के अशोक खरात के मामले ने सभी को चौंका दिया है, जहां महिलाओं का यौन उत्पीड़न और ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके बावजूद, ऐसे बाबाओं के खिलाफ कड़े कानून होने के बावजूद उनका फलना-फूलना एक बड़ी चिंता का विषय है। यह स्थिति यह दिखाती है कि समाज, सरकार और धर्मगुरुओं को मिलकर ऐसे पाखंडियों के खिलाफ आवाज उठानी होगी।

शिकागो का उदाहरण: सख्त कानून और सामाजिक भलाई

कनाडा जैसे लोकतांत्रिक देशों में जहां कानून बहुत सख्त हैं, वहां कोई भी यदि जादू-टोना या चमत्कार दिखाने की कोशिश करता है, तो उसे तुरंत सजा मिलती है। वहाँ की समाजिकता ने यह सुनिश्चित किया है कि सभी लोगों के खिलाफ समान नियम चलें। लेकिन भारत में हर धर्म और समुदाय में ऐसे ढोंगी मौजूद हैं जो समाज के भीतर आसानी से अपने शिकार तलाश लेते हैं। ये गतिविधियां खुल्लम-खुल्ला होती हैं और सरकार की अनदेखी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।

महिलाओं का भय और बाबाओं का जादू-टोना

नासिक जिले में एक बाबा ने अपने आश्रम को एक फार्म हाउस में बदलकर कई महिलाओं को अपने जाल में फंसाया। इस बाबा का भेद खुलने पर न केवल उनके कारनामों का सच्चाई सामने आई, बल्कि यह भी पता चला कि महालक्ष्मी महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर भी उनके चक्कर में फंस गई थीं। यह मामला उन महिलाओं के लिए एक सबक है जो अंधविश्वास का शिकार हो जा रही हैं।

क्या अब भी सरकार जागेगी?

अब जबकि महाराष्ट्र सरकार ने इस बाबा के मामले की जांच की घोषणा की है, यह सवाल उठता है कि ऐसे बाबाओं को सालों तक कोई क्यों नहीं रोक सका। क्या यह केवल महिलाओं की स्थिति पर आधारित है या फिर हमारी सामाजिक संरचना ही दोषी है? अंधविश्वास फैलाने और धोखा देने के खिलाफ जो कानून हैं, उनका कार्यान्वयन इतना कमजोर क्यों है?

बैकग्रंड और बुद्धिजीवियों की भूमिका

भारत के शिक्षित वर्ग ने भी कई बार अंधविश्वास का समर्थन किया है। उदाहरण के लिए, कुछ साल पहले एक बाबा टीवी चैनलों पर गोलगप्पे खिला कर हर समस्या का हल बताता था। इस पर किसी ने भी आवाज नहीं उठाई। इसका मतलब है कि बुद्धिजीवी वर्ग भी ऐसे ढोंगियों के जाल में फंसने को तैयार हैं। जब तक समाज ऐसे बाबाओं के खिलाफ ख़ुद कुछ नहीं करेगा, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।

महिलाओं का आत्म निर्भर होना सबसे बड़ी जरूरत

महिलाओं को समझना होगा कि किसी भी संकट का हल खुद से ही ढूंढना होगा। बाबा की कृपा की उम्मीद करना ही उनकी कमजोरी है। अगर महिलाएं आत्म निर्भर होंगी, तो उन्हें किसी बाबा या जादू-टोने की जरुरत नहीं पड़ेगी। पितृसत्तात्मक समाज में यह जरूरी है कि महिलाएं अपनी आवाज उठाएं और आगे बढ़ें।

अधिकार और आत्म विश्वास का महत्व

महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए। यदि वे खुद को मजबूत बनाएंगी, तो उन्हें बाबाओं की शरण लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। शिक्षा और रोजगार की दिशा में कदम उठाकर वे अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना सकती हैं। किसी बाबा की

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