UP में MLC Election के जरिए बीजेपी ने सवर्ण वोट बैंक को एकजुट करने की तैयार में

The CSR Journal Magazine
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट महसूस की जा रही है, और इस बीच विधान परिषद (MLC) की 11 शिक्षक और स्नातक सीटों पर चुनाव ने राजनीति को गर्म कर दिया है. समाजवादी पार्टी ने अपने 11 कैंडिडेट पहले ही घोषित कर दिए थे, जबकि बीजेपी ने आज छह कैंडिडेटों का नाम जारी कर सबको चौंका दिया है. इन उम्मीदवारों की सूची से यह स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी अपने पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (PDA) मॉडल पर कायम है, जबकि बीजेपी ने ब्राह्मण और राजपूत चेहरों पर दांव खेलकर सवर्ण वोट बैंक को एकजुट करने की योजना बनाई है.

बीजेपी के रणनीति में सवर्णों की प्राथमिकता

दोनों पार्टियों की कैंडिडेट लिस्ट को देखा जाए तो राजनीतिक प्राथमिकताओं का अंतर साफ नजर आता है. बीजेपी ने ब्राह्मण और राजपूत जातियों को प्राथमिकता दी है. वाराणसी स्नातक सीट से केदार नाथ सिंह को राजपूत के रूप में उतारा गया है, जबकि ब्राह्मण चेहरों को भी खास तवज्जो दी गई है. आगरा से इंजीनियर हरि किशोर त्रिपाठी और गोरखपुर से ध्रुव त्रिपाठी जैसे उम्मीदवारों ने ब्राह्मण समुदाय का प्रतिनिधित्व किया है. इस बार बीजेपी ने विभिन्न जातियों से उम्मीदवारों को मैदान में उतार कर फोकस किया है.

समाजवादी पार्टी का जवाबी हमला

समाजवादी पार्टी ने भी बीजेपी की रणनीति का जवाब देने के लिए अपने उम्मीदवारों को तय किया है. अखिलेश यादव ने पिछड़े और अल्पसंख्यक कैंडिडेट्स की नियुक्ति की है, जैसे लाल बिहारी यादव और कमलेश यादव. यह स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी ने अपने कोर-कैडर को मजबूत करने का लक्ष्य रखा है. इसके साथ-साथ उन्होंने विभिन्न समुदायों के चेहरों को भी शामिल किया है ताकि राजनैतिक समीकरण को साधा जा सके.

क्या 2027 में दिखेगा यही पैटर्न?

यह सवाल अब सभी राजनीतिक चर्चा में है कि क्या बीजेपी का यह पैटर्न 2027 के चुनावों में जारी रहेगा. 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को पिछड़ा और अति-पिछड़ा वोट बैंक से कुछ हानि हुई थी, और सवर्णों में भी असंतोष की रिपोर्टें आई थीं. विधायक परिषद (MLC) चुनाव में शिक्षित वर्ग का वोट काफी महत्वपूर्ण होता है, जिसमें ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य समुदाय की प्रमुखता रहती है. बीजेपी ने इस बार इस समुदाय को संतुष्ट करने का प्रयास किया है.

अखिलेश यादव का ‘PDA’ और बीजेपी की रणनीति

बीजेपी सवर्णों को यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी उनके प्रतिनिधित्व में कोई कमी नहीं करेगी. वहीं, समाजवादी पार्टी यदि यादव-मुस्लिम-दलित गठबंधन को मजबूत करती है, तो बीजेपी को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह सवर्णों को भी अपने पक्ष में रख सके. बीजेपी के लिए 2027 के टिकट वितरण में सवर्णों को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा, ताकि उसकी पारंपरिक शक्ति बनी रहे. इस पूरे परिदृश्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिरकार कौन सी पार्टी किस रणनीति को अपनाती है.

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