महाराष्ट्र में कचरे और खेती के अवशेषों से बनेगी गैस, एक साल में शुरू होंगे प्लांट

The CSR Journal Magazine
Maharashtra Compressed-Biogas Plants: महाराष्ट्र में प्राकृतिक गैस की दूसरे देशों से होने वाली खरीद पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार खेती के बचे हुए अवशेषों और शहरों के गीले कचरे से गैस बनाने पर जोर दे रही है। राज्य में अगले एक साल के भीतर 30 से 40 Compressed Bio-Gas – CBG प्लांट शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। Maharashtra Institution for Transformation (MITRA) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रवीण परदेशी (Praveen Pardeshi, IAS) ने मुंबई में आयोजित एक कार्यशाला में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन प्लांटों के लिए कचरा इकट्ठा करने से लेकर किसानों और कंपनियों के बीच तालमेल बनाने तक की व्यवस्था तैयार की जा रही है। जिलाधिकारियों को इस काम में मुख्य भूमिका दी जाएगी।

Maharashtra Compressed-Biogas Plants: महाराष्ट्र में गैस की मांग और सप्लाई में बड़ा अंतर

प्रवीण परदेशी के अनुसार, महाराष्ट्र में हर दिन करीब 5 करोड़ घनमीटर प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है, जबकि सप्लाई लगभग 90 लाख घनमीटर ही है। यानी मांग और सप्लाई के बीच काफी अंतर है। उन्होंने कहा कि खेती के अवशेषों और शहरों के जैविक कचरे से गैस बनाकर इस अंतर को कम करने का मौका है। इससे दूसरे देशों से आने वाले ईंधन पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिल सकती है।

खेती के अवशेष और गीले कचरे से बनेगी गैस

परदेशी ने बताया कि राज्य में उपलब्ध खेती के अवशेषों से प्राकृतिक गैस की कुल जरूरत का करीब 8 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने की क्षमता है। वहीं, छोटे-बड़े शहरों के अलग किए गए जैविक कचरे से करीब 90 प्रतिशत जरूरत पूरी करने की संभावित क्षमता बताई गई है। हालांकि, इस क्षमता का फायदा उठाने के लिए कचरे को सही तरीके से इकट्ठा करना और प्लांट तक पहुंचाना जरूरी होगा।

गांवों और छोटे शहरों के कचरे को भी जोड़ा जाएगा

बड़े शहरों में काफी कचरा मिलता है, इसलिए वहां बड़े प्लांट लगाना आसान हो सकता है। लेकिन छोटे शहरों में एक ही जगह पर्याप्त कचरा नहीं मिलता। गांवों में खेती के अवशेष भी अलग-अलग जगह बिखरे होते हैं, जिससे उन्हें इकट्ठा करने और ले जाने का खर्च बढ़ जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए जिलाधिकारी छोटे शहरों के जैविक कचरे और गांवों के खेती वाले अवशेषों को एक साथ इकट्ठा कर साझा प्लांट तक पहुंचाने की व्यवस्था करेंगे। सरकार किसान उत्पादक संगठनों, कृषि उपज मंडियों और किसानों की कंपनियों के साथ लंबे समय के समझौते करने पर भी जोर देगी। इससे प्लांटों को लगातार कच्चा माल मिलता रहेगा।

विदर्भ के जिलों में भी काम आगे बढ़ा

प्रवीण परदेशी ने बताया कि वर्धा, चंद्रपुर, नागपुर और नांदेड़ में तीन से चार परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ा है। इनमें से कुछ परियोजनाएं उत्पादन के चरण में हैं। परियोजनाओं की स्थिति पर नजर रखने के लिए एक ऑनलाइन डैशबोर्ड भी बनाया जाएगा। इससे पता चलेगा कि किस जिले में प्लांट का काम कितना आगे बढ़ा है और कचरे की उपलब्धता कैसी है। मुंबई, ठाणे और नवी मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ-साथ लातूर और धाराशिव जैसे जिलों में भी छोटे स्तर पर कचरा इकट्ठा करके साझा प्लांट लगाने पर ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार की गोबरधन योजना और महाराष्ट्र की नीति का लाभ लेने की योजना है।

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