अरुणाचल प्रदेश में विकास की नई तस्वीर: 1962 में सड़कें नहीं, आज सुरंग और सड़क नेटवर्क का जाल

The CSR Journal Magazine
सीमा की सुरक्षा केवल सैनिकों के साहस से नहीं, बल्कि मजबूत सड़कों, बेहतर संपर्क और आधुनिक बुनियादी ढांचे से भी सुनिश्चित होती है। चीन की सीमा से लगा भारत का सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश इसका बड़ा उदाहरण है। 1962 के भारत-चीन युद्ध को याद करें। यह एक ऐसा नासूर है जिसे वक्त भी नहीं मिटा पाया है। राजनेता हों, सेना हो या फिर जनता — 1962 के युद्ध की हार सभी के मन में एक टीस के समान मौजुद रहती है।

विकास की नई राहें

आजादी के बाद 1962 में अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक सड़कें नहीं थीं। उस समय सैनिकों को हवाई आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता था। आज उसी सीमांत क्षेत्र में 13,000 फीट की ऊंचाई पर बनी सुरंग और हजारों किलोमीटर का पक्की सड़कों का नेटवर्क भारत की बदलती रणनीतिक और सामरिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है। भारत की सीमाओं की सुरक्षा में इन्हीं मजबूत बुनियादी ढांचे की अहम भूमिका है।

1962 की हार के सबक

पीएम नेहरू के कार्यकाल में हुए 1962 के चीन युद्ध ने भारत की सैन्य और सीमाई तैयारियों की गंभीर कमियां उजागर कीं। हार के बाद पंडित नेहरू ने स्वयं स्वीकार किया था कि कई सीमावर्ती इलाकों में सड़कें नहीं थीं और सैनिकों के लिए जरूरी सामान हवाई मार्ग से पहुंचाना पड़ता था। दुर्गम भूभाग की चुनौतियों के बावजूद सीमा तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढाँचा विकसित नहीं हो पाया था।

मोदी सरकार का नया दृष्टिकोण

लेकिन 2014 में पीएम मोदी के सत्ता संभालने के बाद पूर्वोत्तर में सीमाओं के विकास को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। अरुणाचल प्रदेश में सड़कों का नेटवर्क इसका उदाहरण है। राज्य सरकार की 2023 की उपलब्धि पुस्तिका के अनुसार, 2016 के बाद सड़क नेटवर्क 64% बढ़कर 19,863 किलोमीटर तक पहुंच गया। राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई में भी 138% वृद्धि दर्ज की गई।

सेला सुरंग: एक मील का पत्थर

इस बदलाव की प्रमुख मिसाल सेला सुरंग है। मार्च 2024 में राष्ट्र को समर्पित ₹825 करोड़ की लागत वाली यह सुरंग 13,000 फीट की ऊंचाई पर बनी है। इससे तवांग तक हर मौसम में संपर्क बेहतर हुआ और सेना की आवाजाही को मजबूती मिली। डोनी पोलो हवाई अड्डे का नवंबर 2022 में उद्घाटन अरुणाचल प्रदेश की हवाई कनेक्टिविटी में महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।

वाइब्रेंट विलेजेज कार्यक्रम

वहीं, वाइब्रेंट विलेजेज कार्यक्रम के तहत राज्य के 455 सीमावर्ती गांवों को विकास के लिए चिह्नित किया गया है, ताकि सड़क, बिजली, संचार और आजीविका की सुविधाएँ बेहतर हों। पीएम मोदी के आह्वान पर सांसदों और मंत्रियों का सीमावर्ती गांवों में रात बिताना भी इन इलाकों को जोश से भर गया। खासकर गृहमंत्री अमित शाह का अरुणाचल की सीमा पर बसे गांव में एक दिन बिताना तो पूरी सीमा पर एकजुटता का संदेश दे गया।

रक्षा में मजबूती

रक्षा मोर्चे पर हाशिमारा में राफेल विमानों की तैनाती और S-400 वायु रक्षा प्रणाली भारत की सैन्य तैयारियों को मजबूती देती हैं। दूसरी ओर, सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ने वाला रणनीतिक मार्ग है। इसकी कनेक्टिविटी मजबूत करना राष्ट्रीय हित में महत्वपूर्ण है।

नई रणनीतिक तैयारी

नेहरू काल की कमजोरियों से सबक लेकर आज मोदी काल में अरुणाचल प्रदेश के सीमांत क्षेत्रों में सड़क, सुरंग, हवाई संपर्क और रक्षा क्षमता का विस्तार भारत की रणनीतिक तैयारी में आए बदलाव को दर्शाता है। आज का अरुणाचल प्रदेश एक नई पहचान बना चुका है, जो विकास और सुरक्षा की नई कहानी बुन रहा है।

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