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	<title>covid19 Archives - The CSR Journal</title>
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	<title>covid19 Archives - The CSR Journal</title>
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		<title>सरकार के इस फैसले से उत्तराखंड में होगा ज्यादा सीएसआर खर्च</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/uttarakhand-government-seek-csr-to-fight-corona-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 May 2021 10:30:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[Coronavirus]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[CSR News]]></category>
		<category><![CDATA[Uttarakhand]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>उत्तराखंड में सीएसआर के लिए कंपनियों की होगी पहचान कोरोना महामारी में सरकारों के साथ खड़ी देश की कॉर्पोरेट कंपनीज ने यूं तो कोरोना से निपटने के लिए कई उपाय और राज्य और केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है। महामारी के दौरान कॉर्पोरेट्स आर्थिक मदद के साथ साथ ऑक्सीजन, दवाईयों, अस्पताल बनाने [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h2><a href="https://thecsrjournal.in/top-csr-uttarakhand-uk-india-corporate-social-responsibility/">उत्तराखंड</a> में सीएसआर के लिए कंपनियों की होगी पहचान</h2>
<h5>कोरोना महामारी में सरकारों के साथ खड़ी देश की कॉर्पोरेट कंपनीज ने यूं तो कोरोना से निपटने के लिए कई उपाय और राज्य और केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है। महामारी के दौरान कॉर्पोरेट्स आर्थिक मदद के साथ साथ ऑक्सीजन, दवाईयों, अस्पताल बनाने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रही है। हर राज्य कॉर्पोरेट्स से सीएसआर फंड पाने के लिए अपील कर रहा है ताकि राज्यों की फाइनेंसियल हेल्प हो सके। लोगों को अस्पताल, दवाइयां और ऑक्सीजन मिल सके। उत्तराखंड सरकार ने भी अब सीएसआर के लिए कंपनियों की पहचान करनी शुरू कर दी है।</h5>
<h2>उत्तराखंड <a href="https://uk.gov.in/">सरकार</a> को राज्य में कार्यरत कंपनियों से CSR मदद की है दरकार</h2>
<h5>दरअसल इस महामारी के दौरान उत्तराखंड सरकार को राज्य में कार्यरत कंपनियों से CSR मदद की दरकार है। ऐसा नहीं है कि इन कंपनीज से राज्य को सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) मदद नहीं मिल पा रही है। लेकिन जो भी मदद मिल रही है वो ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। कोरोना महामारी से लड़ने के लिए बड़े पैमाने पर राज्य सरकार को मदद चाहिए जो कि सीएसआर से ये मदद संभव हो पायेगा। सरकार के प्रयासों के बाद भी उत्तराखंड में कार्यरत तमाम कंपनियों से अभी तक अपेक्षित मदद नहीं मिला है। लिहाजा, सीएसआर के दायरे में आने वाली कंपनियों की पहचान शुरू कर दी गई है।</h5>
<h2>स्टेट जीएसटी डिपार्टमेंट को सीएसआर के लिए सौंपी गई जिम्मेदारी</h2>
<h5>उत्तराखंड सरकार के सूत्रों की मानें तो सीएसआर से मदद पाने और इन कंपनियों की लिस्ट बनाने का काम राज्य माल एवं सेवा कर यानी स्टेट जीएसटी डिपार्टमेंट को सौंपा गया है। चूंकि स्टेट जीएसटी के पास इन कंपनीज का डेटा होता है इसलिए इस डिपार्टमेंट को ये जिम्मा दिया गया है। स्टेट जीएसटी डिपार्टमेंट ने राज्य में करीब 52 ऐसी कंपनियां को चिंहित किया हैं, जिनका लाभ पांच करोड़ रुपये या नेटवर्थ 500 करोड़ रुपये या न्यूनतम टर्नओवर 1000 करोड़ रुपये है। कॉरपोरेट मंत्रालय के नियमों के मुताबिक ऐसी कंपनियों को सीएसआर फंड में दो फीसदी राशि खर्च करनी होती है।</h5>
<h2>स्टेट जीएसटी डिपार्टमेंट ने राज्य में करीब 52 ऐसी कंपनियां को किया है चिन्हित</h2>
<h5>कुछ कंपनियां सीएसआर कानून का पालन करते हुए इस दिशा में आगे बढ़ी हैं। मगर अभी भी तमाम कंपनियों का रुख स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कंपनियों का डेटा तैयार किया जा रहा है। ताकि कंपनी प्रतिनिधियों से बात कर उन्हें राज्य के प्रति उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराया जा सके। हालांकि सीएसआर के दायरे वाली तमाम कंपनियों का मुख्यालय राज्य से बाहर है। लेकिन इनके यूनिट उत्तराखंड में मौजूद होने के बावजूद राज्य सरकार की ये मदद नहीं कर रहें है। ऐसे में इन कंपनीज को राज्य सरकार सीएसआर के लिए अपील कर रही है।</h5>
<h2>कोरोना से लड़ने के लिए उत्तराखंड को सीएसआर मदद की ज्यादा जरूरत</h2>
<h5>कोरोना संक्रमण के दौर में जब उत्तराखंड को सीएसआर मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, और तब कॉरपोरेट्स से अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के चलते राज्य सरकार को इस दिशा में रणनीति तैयार करने को मजबूर कर दिया है। भौगोलिक व जनसंख्या के लिहाज से उत्तराखंड छोटा प्रदेश है। इसके बाद भी सरकार यहां कारोबारी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कंपनियों को भूमि उपलब्ध कराने से लेकर तमाम टैक्सेस में रियायत दे रही है। शायद इस उम्मीद में कि राज्य के पास पर्याप्त सीएसआर आये और प्रदेश का विकास हो सके।</h5>
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		<title>कोरोना वैक्सीन लगवाने जा रहें हैं? ये जरूर पढ़ें</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/corona-vaccination-drive-18-dos-donts-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 May 2021 07:33:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Leaders Speak]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[corona]]></category>
		<category><![CDATA[Corona Vaccination Drive]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[vaccines]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कोरोना की इस जंग में 1 मई का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि 18 साल से ज्यादा की उम्र के लोगों को आज 1 मई से टीका लगने की शुरुआत हो चुकी है। टीकाकरण की आज पूरे देश भर में शुरुआत हुई है। बड़े पैमाने पर युवा वर्ग विश्व के सबसे बड़े टीका अभियान [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>कोरोना की इस जंग में 1 मई का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि 18 साल से ज्यादा की उम्र के लोगों को आज 1 मई से टीका लगने की शुरुआत हो चुकी है। टीकाकरण की आज पूरे देश भर में शुरुआत हुई है। बड़े पैमाने पर युवा वर्ग विश्व के सबसे बड़े टीका अभियान में हिस्सा ले रहा है। वैक्सीनेशन ड्राइव को लेकर तमाम सवाल भी है। वैक्सीन कितना सेफ है, वैक्सीन के पहले या बाद शराब का सेवन करना चाहिए या नही, प्रेग्नेंसी में कोरोना वैक्सीन कितना सेफ है इन तमाम सवालों का जवाब देने के लिए हमारे साथ मौजूद है डॉक्टर निर्मल गुजराती।</h5>
<p><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/4K6ikte1e3g" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<h3>बहुत बहुत स्वागत है The CSR Journal में। मेरा सबसे पहला सवाल आपसे है कि <a href="https://thecsrjournal.in/corona-vaccination-drive-things-to-know-about-vaccine-hindi/">कोरोना वैक्सीन</a> लगवाना कितना सेफ है?</h3>
<h5>कोरोना वैक्सीन लगवाना 100 फ़ीसदी सुरक्षित है। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने जो वैक्सीनेशन ड्राइव का डाटा पब्लिश किया हुआ है उसके मुताबिक पहला डोस लेने के बाद लगभग 12 करोड़ लोगों में से 0.03 लोग ही कोरोना संक्रमित हुए है। सेकंड डोस के बाद वैक्सीन का असर और बढ़ जाता है। यानी आंकड़ों में बात करें तो 12 करोड़ में से महज 18 हज़ार लोगों को कोविड हुआ है। इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोरोना वैक्सीन लगाने कितना महत्वपूर्ण है। कोरोना वैक्सीन बहुत असरदार है। आप नजदीकी सेंटर में जरूर जाकर वैक्सीन लगवाएं। वैक्सीन बिल्कुल सुरक्षित है। 100 फीसदी सुरक्षित है।</h5>
<h3>वैक्सीन लगने के बाद हमें क्या क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?</h3>
<h5>वैक्सीन लगवाने के बाद सावधानियां जरूर बरतनी चाहिए। सेंटर पर आपकी जागरूकता के लिए और वैक्सीनेशन के बाद क्या करें, क्या ना करें इसका ऑडियो सुनाया जाता है, बताया जाता है। वैक्सीन लगवाने के बाद आपको बुखार आ सकता है, अगर ऐसा होता है तो आपको बताया जाएगा कि आप बुखार की दवाई ले सकतें हैं। आपको शरीर, सिर में दर्द हो सकता है, किसी को थोड़ा बीपी बढ़ सकता है, ये सब बहुत नार्मल है। आधे घंटे तक आपको सेंटर पर बिठाकर चेक किया जाता है और फिर घर जाने दिया जाता है। अगर ये कुछ सिम्टम्स दिख रहे है तो आप पैरासिटामॉल की गोली खा सकते है। हां आपको वैक्सीन लगवाने के बाद भी मास्क पहनना है। हाथ सेनेटाइज करना है, दूरी बनानी है।</h5>
<h3>क्या प्रेग्नेंट महिलाएं भी कोरोना वैक्सीन लगवा सकती है?</h3>
<h5>गायनेकोलॉजिस्ट सोसाइटी ने तो वैक्सीन के लिए रेकमेंड किया है कि प्रेग्नेंट महिलाओं को भी वैक्सीन देना चाहिए। लेकिन भारत सरकार ने कहा है कि ये ट्रायल फेज है और सरकार की तरफ से अभी इसकी शुरुआत नही हुई है जैसे सरकार की तरफ से गर्भवती महिलाओं के लिए वैक्सीनेशन की शुरूआत होगी तो हम करेंगे।</h5>
<h3>जो कपल्स कंसीव करना चाहते है क्या वो वैक्सीन लगवा सकते है?</h3>
<h5>जो कपल्स कंसीव करना चाहते है उन्हें बिल्कुल वैक्सीन लगवाना चाहिए। आप प्रेग्नेंसी की अगर तैयारी करते है तो आपके लिए वैक्सीन बिल्कुल सुरक्षित है। वैक्सीन लेने से फर्टिलिटी की कोई दिक्कत नही होती है। ये जो आजकल व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर घूम रहा है वो पूरी तरह से गलत है। जो प्रेग्नेंसी चाहती है उनको अपने मन में कोई शंका रखना ही नही है। वैक्सीन जैसे मिले आप ले लो। आप पर या फिर आपके पति पर कोई फर्क नही पड़ेगा।</h5>
<h3>क्या मासिक पीरियड के दौरान महिलाएं कोरोना वैक्सीन लगवा सकती हैं?</h3>
<h5>पीरियड और वैक्सीन का कोई संबंध नही है। बिल्कुल पीरियड्स के दौरान, माहवारी के दौरान वैक्सीन लिया जा सकता है। प्लीज आप सोशल मीडिया, व्हाट्सएप या फिर कोई भी मेसेंजर के मेसेजेस को इग्नोर करें। प्रॉपर डॉक्टर की सलाह लें। ये सब भ्रांतियां है। अगर आप पीरियड्स में भी है तो भी आप जाकर वैक्सीन ले लीजिए।</h5>
<h3>क्या शराब का सेवन कोरोना वैक्सीन के पहले या फिर बाद में कर सकते है?</h3>
<h5>शराब से वैक्सीन के असर पर कोई फर्क नही पड़ता, ऐसा खुद गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का वेबसाइट कहता है। वैक्सीन की वजह से बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द हो सकता है ऐसे में इससे बचने के लिए शराब का सेवन नही करें यही सलाह है। वैक्सीन लेने से पहले 48 घंटे पहले शराब न पिएं, उसके बाद भी 48 घंटे शराब ना पिएं, यही एडवाइस दिया जाता है। ऐसा करना सेहतमंद भी है।</h5>
<h3>क्या अन्य नशे की लत, जैसे सिगरेट, तंबाकू या फिर दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन कर सकते है?</h3>
<h5>अब जिन लोगों को ये आदत है वो तो छोड़ने वाले नही है । लेकिन अभी तक ऐसा कोई डेटा या फिर प्रमाण नही है कि इन नशीली चीजों के सेवन के बाद वैक्सीन का असर कम हुआ हो। अभी तक नशीले पदार्थों जैसे मैंने शराब को लेकर बोला इन सब को लेकर कोई स्पष्ट गाइडलाइंस नही है। लेकिन हम यही एडवाइस करते है कि वैक्सीन लेने के कुछ घंटों तक इससे दूर रहें। अब तक ये पाया गया है कि जो लोग नशा करते है, शराब पीते है, उनका कोरोना से संक्रमित होने के ज्यादा चांसेस होते है। तो ऐसे में आप इन नशों से दूर रहकर वैक्सीन जरूर लगवाएं।</h5>
<h3>कोरोना वैक्सीन लगवाने के बाद क्या डाइट/खानपीन में कोई बदलाव लाना चाहिए?</h3>
<h5>डाइट और वैक्सीन का आपस में कोई लेनादेना नही है। आप जो हमेशा से खा रहे हो वही खाईये। संतुलित भोजन कीजिये, प्रॉपर हेल्थी डाइट लीजिये। खाने में कोई परहेज या रोकटोक नही है।</h5>
<h3>डायबिटीज बीपी के मरीजों के लिए तो वैक्सीन लगाना सेफ है। लेकिन उन मरीजों के लिए भी क्या वैक्सीन सेफ है जो कैंसर, HIV, या अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है?</h3>
<h5>वैक्सीन सबके लिए बनाया गया है। गंभीर बीमारियां जैसे किडनी की बीमारी हो, हार्ट की बीमारी हो, मिरगी की बीमारी हो या फिर डायबिटीज हो, ब्लड प्रेशर हो, आपको वैक्सीन लेना ही चाहिए। कोरोना के इस जंग में Vaccine लेना सबके लिए बेहद जरूरी है। वैक्सीन की वजह से किसी को कोई तकलीफ नही हुआ है। हा ये जरूर करें कि जब भी आप वैक्सीन ले रहें हो तब आप अपने ट्रीटिंग डॉक्टर से जरूर टच में रहें और जब कोई तकलीफ हो तो उनसें जरूर कंसल्ट करें।</h5>
<h3>Corona Vaccine लगवाने के बाद कई केसेस में बुखार तक आ जाते है या दूसरे साइड इफेक्ट्स हो जाते है ऐसे में वैसे ही अस्पतालों पर तनाव है और फिर ज्यादा तनाव तो नही आ जायेगी?</h3>
<h5>वैसे देखा जाय तो वैक्सीन लगवाने के बाद बहुत कम लोगों को तकलीफ हुई है। और जिनको कोई तकलीफ हुई है उनमें ये पाया गया है कि उन्होंने कुछ बात छुपाई है, जैसे पहले से ही आपको सर्दी बुखार है। वैक्सीन लगवाने के बाद आपको ऐसी कोई नौबत नही आती है कि आपको अस्पताल जाना पड़ जाए। हम वैक्सीन लगवाने के बाद आधा घंटा बिठाकर सब समझाते है। अगर आपको 2 दिन से ज्यादा बुखार आ ही रहा और तीन चार दिन तक बुखार रह रहा है और उसी दरमियान आपको कोरोना था और आपने वैक्सीन ले लिया है। ऐसे केसेस आये है। बहुत रेयर केसेस आये है ऐसे। लेकिन हॉस्पिटल्स पर कोई प्रेशर नही हो रहा है। मामूली बुखार और बदन दर्द में आप गोली खाईये और आपको आराम मिल जाएगा।</h5>
<h3>अगर कोई कोरोना से पहले ही संक्रमित हुआ है तो उसे कितने दिनों बाद कोरोना वैक्सीन लगवाना चाहिए?</h3>
<h5>अगर कोई पहले से ही कोरोना संक्रमित हो गया हो और कोरोना को हरा चुका हो तो वो भी वैक्सीन लगवा सकते है। लेकिन कब लगवाना है इसमें मेडिकल फ्रेटर्निटी में दो राय है। एक तबका कहता है कि 15 दिन बाद संक्रमित व्यक्ति वैक्सीन लगवा सकता है। लेकिन हम लोग यही एडवाइस कर रहे है कि 4 से लेकर 6 हफ़्ते बाद आप वैक्सीन लगवा सकते है।</h5>
<h3>वैक्सीन की कमी के चलते जिन लोगों ने वैक्सीन का पहला डोज़ ले लिया है लेकिन दूसरा डोज़ नही लग पाया है तो उसमें कोई दिक्कत है?</h3>
<h5>जैसे मैंने पहले आपको बताया कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का जो डेटा आया है कि वैक्सीन का पहला डोज़ लेने के बाद 99 फीसदी तक इम्यूनिटी बूस्टअप हो चुका है तो ऐसा में आपको डरने की बात नही है। छोड़ा आगे पीछे हो जाये तो भी चल जाएगा। लेकिन पहला जो डोज़ था वही आपको दूसरे डोज में भी लेना है, उसे चेंज नही करना है।</h5>
<h3>अच्छा यानी आपको डोजेज में बदलाव नही करना है?</h3>
<h5>नही, आपको डोजेज में बदलाव नही करना है। अगर पहले डोज़ में आपने कोवैक्सीन लिया है तो आपको दूसरे डोज़ में भी कोवैक्सीन ही लेना है। बदलना नही है। और अगर अपने कोविशिल्ड लगी है तो दूसरे डोज़ में भी कोविशिल्ड ही लगवाना है। दोनों मिक्स नही करना है।</h5>
<h3>कोवैक्सीन सही है या कोविशिल्ड?</h3>
<h5>देखिए, दोनों ही वैक्सीन सही है, अच्छे है। आपका जब भी नंबर आता है और जो भी मिलता है वो लगवाएं ।</h5>
<h3>आप The CSR Journal के दर्शकों से वैक्सीन को लेकर क्या अपील करेंगे?</h3>
<h5>अभी गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने 18 साल के ऊपर वालों के लिए वैक्सीनेशन ड्राइव की शुरुआत की है। रजिस्ट्रेशन हो रहा है। मोबाइल पर जाकर, वेबसाइट पर जाकर आप अपने आप को वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाएं। और प्लीज प्लीज प्लीज कोरोना को मात देने के लिए वैक्सीन जरूर लगवाएं। हमनें ये देखा है कि जिन्होंने वैक्सीन लिया है और अगर उन्हें कोरोना हुआ तो उन्हीने बहुत आसानी कोरोना को हराया है। उन्हें कोई खतरा नही हुआ है। 12 करोड़ में महज चंद लोग ही है जिन्हें कोरोना हुआ। वैक्सीन बिल्कुल सेफ है, सुरक्षित है। जो भी वैक्सीन मौजूद है आप वो जरूर लें।</h5>
<h3>आपने भी वैक्सीन ली है, क्या रहा आप का एक्सपीरियंस?</h3>
<h5>हेल्थकेयर वर्कर होने के नाते मुझे मेरे हॉस्पिटल से कोविशिल्ड वैक्सीन लगाया गया था। जिस दिन मैंने वैक्सीन लिया उस दिन मैंने तीन ऑपरेशन किये। घर पर जाने के बाद मैं थका हुआ था। थोड़ा मुझे बदन दर्द हुआ। उसके बाद मुझे कोई तकलीफ नही हुई। दूसरा डोज़ एक महीने बाद लिया। उसमें भी कोई तकलीफ नही। मैं पिछले एक साल से कोविड पेशेंट देख रहा हूं। मुझे कोई तकलीफ नही है। एक बार मैं फिर से अपील करता हूं कि आप जरूर वैक्सीन लें।</h5>
<h5>बिल्कुल, The CSR Journal भी आपसे यही अपील करता है कि आप भी जरूर वैक्सीन लें। ये पूरी तरह सुरक्षित है।</h5>
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		<item>
		<title>Citizen Social Responsibility (CSR): Classrooms turn Covid War-Zone for Students</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/university-exams-over-students-life-government-ugc-wrap-final-year-exams-covid19</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Amit Upadhyay]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Jul 2020 05:05:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[CSR Education and Skill Training]]></category>
		<category><![CDATA[Opinions]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Education System]]></category>
		<category><![CDATA[UGC]]></category>
		<category><![CDATA[University Grants Commission]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>I am writing this article with the hope that after reading it, all of us together fight for the rights of our children and take it to a positive, logical conclusion. A misleading situation still remains regarding exams. In view of the present Covid-19 pandemic, all government and non-government institutes, private institutions, schools, colleges are [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h5 class="gmail-MsoBodyText">I am writing this article with the hope that after reading it, all of us together fight for the rights of our children and take it to a positive, logical conclusion.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">A misleading situation still remains regarding exams. In view of the present Covid-19 pandemic, all government and non-government institutes, private institutions, schools, colleges are either closed or operating with a minimum attendance. From our Prime Minister to the Chief Ministers, MPs,  MLA’s to Corporators, everyone is very well aware that they have to take utmost care of their safety and health. So, they are all following strict social distancing. At such a time, is the exam assessment of children for one year so important that pressure is being built on them to sit for examinations despite serious risk to their lives?</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Students were eagerly waiting for the new exam guidelines by the University Grants Commission (UGC). Ending this wait, UGC has created a superstorm by releasing the new guidelines for universities on conducting final-year examinations. The commission’s insistence on online or pen-paper or a blend of the two modes in conducting examinations, although with a much-delayed timeline, has been widely criticised. Punjab, Maharashtra, West Bengal, Delhi, Odisha and Tamil Nadu have already raised objections. Uttar Pradesh has announced that its universities will hold examinations irrespectively. Delhi University students have termed the decision arbitrary and discriminatory, and have challenged it in the Delhi High Court.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">In April 2020, UGC constituted a committee of experts. The committee was to discuss and recommend matters relating to examinations and academic calendars. Based on the report of the committee, UGC released a guideline related to examinations and the academic calendar on 29 April 2020.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Before this information was revealed, there was a demand for cancellation of examinations in universities. This demand was made by a committee of the University Grants Commission. Looking at the situation of the Covid-19 pandemic at that time, it was expected that the results of the final year would be given on the basis of the marks of the previous examination.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">After receiving the new guidelines, all the universities and colleges started an uproar. In such a situation, the University Grants Commission approached the universities to give the status of the conduct of examinations. UGC received responses only from 755 universities with regards to the final year exams. About 560 of these universities have either conducted the exams or were reconsidering it. There are still about 168 universities that have not decided on the final year examinations. UGC has also reported that 27 private universities established during 2019-20 are not valid for the final year examination.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Later a committee of experts was again urged to review the guidelines and suggest options for examinations, admission to colleges and universities and start of a new academic session as the cases of Covid-19 were still increasing.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">The committee submitted its report which was recently discussed and approved by the UGC. According to the new guidelines, it is compulsory to conduct final year/ semester examinations in all universities. These guidelines of the UGC will affect those released on April 29. Earlier these exams were scheduled to be held in the second week of July but now it has been pushed to the month of September.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">It was wrongly assumed that the final year results would be prepared on the basis of the earlier exam and internal assessment on the lines of other semesters/term but now the commission has put an end to all rumours and has made it clear that examinations will be conducted.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Soon after UGC released the latest guidelines, Maharashtra Cabinet Minister, Aaditya Thackeray filed a petition in the Supreme Court on 18th July in which the UGC&#8217;s decision to conduct final year examinations before 30 September has been challenged. In his petition, he cited such a decision as inhumane and unimaginable amidst the ongoing war with the Coronavirus, also citing the current state of mind of students and parents. Strangely, this issue has been raised by a young leader and our intellectuals, educationalists and the central government choose to stay quiet. There has been a lot of uncertainty and speculation ever since all educational institutions, including schools, colleges and universities, were locked down in March. The month of March-April is very important for students from the examination point of view and so, all the courses under universities are still awaiting proper orders and guidelines.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">The students are in a dilemma whether they should focus on their final year exams or start preparing for their higher education and competitive exams. There is confusion in their minds if the certificates given by universities/colleges without appearing for exams will be valid in other states, all institutions and for appearing in various competitive exams.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">After the first case of Covid-19 was detected in India in January 2020, the government was determined not to allow its spread in the country. The central government had to order a lockdown in the entire country in March. The education system of the country was hugely affected with this decision. The central government gave a clear order to all the states for a complete lockdown, and requested the state governments to postpone all examinations scheduled for this year. Despite a lot of efforts and precautions, the Covid-19 pandemic has spread its wings across the country in a big way and the situation has only worsened.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">UGC and the states, since then, have been inconsistent in their approach and thought process, giving different time limits, different guidelines and different decisions on conducting examinations. For example, Karnataka CET exams have been scheduled on 30-31 July despite the rise in Covid-19 in Bengaluru. Students and parents are struggling with the outbreak of the epidemic and are raising their voices against it. The Rajasthan government decided to cancel the annual examinations last month and the final results were to be released on the basis of internal tests. The Punjab and Haryana governments had also proposed to cancel the examinations. The same decision was also made for states like Gujarat and Karnataka.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Even in the states most affected by the Covid-19 epidemic, the government in June passed the order to cancel the examinations and declare the results on the basis of internal tests. However, this decision came after a lot of ups and downs in Maharashtra. Maharashtra Education Minister, Uday Samant, said that it is not possible to conduct online or offline examinations due to rising cases of coronavirus in April-May. He feared that the health and security of students and their families will be at stake. However, no clear instructions have been issued for degree students till date.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">UGC again brought out a new order last week to put the students in a state of confusion and shock. As per the most recent guidelines, the examinations evaluate students&#8217; lives better and are necessary for the all-round development of talent. But given the deadly form of the epidemic, both the students and parents are not ready to risk the lives of their families and want the intervention of the Central government on this matter.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">It has also been said that students with doubtful symptoms will be able to sit separately and appear for the exam. Are you serious? The common man is worried today for his child. The doors of temples have been closed to avoid crowd gatherings but the locks of the schools are being opened for examinations? Such a ridiculous and unimaginable rule! Where the 138 crore population is imprisoned in their homes for fear of a micro virus, there is so much fuss with regard to the lives of children. This is the time for the Central government to intervene. If we are one country and one Constitution, then why is the Central government – in coordination with the state governments – unable to come up with a common, safe, secure and logical solution for the students? If our Honourable Prime Minister can bring the whole nation together with applause and lamps to fight the Covid-19 pandemic, then why is he still silent on this very important and delicate issue?</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">This is an Emergency-like situation and we can&#8217;t take the lives of our youth for granted. If the pandemic continues, we might also need to implement a new education system in the country. ‘No examination is better than risking lives’. Do we really need to debate on this? Everyone is worth their lives. Shouldn&#8217;t it be that first, all government departments, corporate offices resume work with 100% attendance and only then we consider sending our children to schools and colleges and letting them appear for exams?</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Even while I am writing this article, I wonder why this carelessness with children? Are even 50% of the parents ready to follow the latest UGC guidelines? No. They are confused and worried about an uncertain future for their children. On one hand, while questions are being raised about the recent decision of the UGC in the Maharashtra government, the epidemic is at its peak. States like Assam are facing a double whammy of floods and epidemics, on the other hand, political games are being played, defections and horse-trading is rampant in Rajasthan. I wonder if this state, and also our country, has become corona-free, so some are playing the game of politics in their free time? Is the Central government putting its pieces on this board? If not, what is it doing to stop it? Maharashtra Youth Leader Aaditya Thackeray has raised a legitimate question &#8220;Are UGC decisions for another planet?&#8221; Why such negligence with the hands in which to hand over the reins of our future?</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">In the event of a disaster of this scale, the country expects our Honourable Prime Minister to lead from the front and take a wise and far-sighted decision. This issue is directly related to his pro-youth approach. The Prime Minister has given an important place to the youth, education and their problems. Under his leadership, the importance of education in the country has grown manyfold. So naturally, both the students and the parents are expecting a meaningful step for their problem.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Before taking the important decision of the lockdown, our Prime Minister met Chief Ministers of all the states through videoconferencing and after taking their opinions, took the important decision. When an anti-China decision can be made against the encroachment under the strong leadership of our Prime Minister, then why no concrete steps are taken in this case? In the last few years, the central government has taken many big decisions in the interest of the country and has ensured that the decisions take the form of reality rather than being up in the air.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">Is it appropriate to take such a big risk? Is it necessary to push the navigators of the country in this experiment? Can a few hours of examinations really determine the competence, performance and credibility that is necessary for global acceptability? It is a matter of concern that our education system still continues to be exam-centric and these guidelines fail to take into account the fact that the validity of exams fundamentally depends on their reliability. Most examinations in India merely test an ability to recall facts or information rather than an understanding of those facts or an ability to use them in practical situations. The Central government needs to take the right decision keeping these factors in mind. This matter ideally should have been settled between the public and the government instead of the Supreme Court. It shows the apathy of our system, the need to present such sensitive issues before the court.</h5>
<h5 class="gmail-MsoBodyText">This is an issue that should be decided by the mind and heart rather than the Constitution.</h5>
<p><img decoding="async" class="alignleft wp-image-10945 size-thumbnail" src="https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-150x150.jpg" alt="Amit Upadhyay" width="150" height="150" srcset="https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-150x150.jpg 150w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-300x300.jpg 300w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-1024x1024.jpg 1024w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-768x769.jpg 768w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-1534x1536.jpg 1534w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-2046x2048.jpg 2046w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-696x697.jpg 696w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-1068x1069.jpg 1068w, https://thecsrjournal.in/wp-content/uploads/2017/03/amit_mini-1920x1922.jpg 1920w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /><span style="font-style: italic; text-align: center;">The author, Amit Upadhyay, is Editor-in-Chief of The CSR Journal </span></p>
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		<title>टाटा की फिर दिखी दरियादिली, बीएमसी को दिए 10 करोड़, 20 एंबुलेंस और 100 वेंटिलेटर्स</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/coronavirus-tata-donates-ambulances-ventilators-for-setting-up-research-centre-to-bmc-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Jul 2020 10:20:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Business]]></category>
		<category><![CDATA[CSR Business Ethics & Philanthropy]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[Ratan Tata]]></category>
		<category><![CDATA[Tata Trust]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कोरोना महामारी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रहा है, कोरोना महामारी इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी मानी जा रही है। कोरोना से भारत में 7 लाख से ज्यादा लोग ग्रसित हैं। देश के हर राज्य, हर जिले में ये महामारी बढ़ती ही जा रही है, साथ ही इससे निपटने के लिए केंद्र [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>कोरोना महामारी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रहा है, कोरोना महामारी इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी मानी जा रही है। कोरोना से भारत में 7 लाख से ज्यादा लोग ग्रसित हैं। देश के हर राज्य, हर जिले में ये महामारी बढ़ती ही जा रही है, साथ ही इससे निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकार लॉक डाउन भी बढ़ा रही है। आलम ये है कि देश की जनता का हाल बद से बदतर होता जा रहा है, डर के इस माहौल के बीच कई बिजनेस घराने मदद को आगे आए हैं। इनमें टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन रतन टाटा (Ratan Tata) सबसे आगे हैं।</h5>
<h5>कोरोना को मात देने के लिए बीएमसी और टाटा ग्रुप एक साथ</h5>
<h5>देश के शहरों की तुलना करें तो मुंबई एकमात्र शहर है जहां कोरोना के सबसे ज्यादा मामले है, और देश की सबसे बड़ी और सबसे धनी महानगर पालिका मुंबई बीएमसी (BMC) कोरोना के रोकथाम में जरूर कम पड़ रही है, जहां मुंबई की चमक धमक कोरोना की वजह से फीकी पड़ रही है वहीं मुंबईकरों की मदद के लिए टाटा ग्रुप सामने आया है। टाटा द्वारा किये गए मदद के पैसों से महाराष्ट्र सरकार Immunology &amp; Virus Infection Research Centre बनाएगी साथ ही इस कोरोना काल में मुंबई बीएमसी और टाटा ग्रुप मिलकर प्लाज्मा प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहे हैं।</h5>
<h5>कोरोना को हराने के लिए टाटा ने फिर खोली तिजोरी</h5>
<h5>कोरोना को हराने के लिए रतन टाटा और मुंबई बीएमसी प्लाज्मा प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इसी प्रोजेक्ट के तहत टाटा ग्रुप ने बीएमसी को 10 करोड़ रुपये के साथ 100 वेंटिलेटर्स के साथ 20 एम्बुलेंस की मदद की है। महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने इस बारें में टाटा ग्रुप की सराहना करते हुए कहा कि कोरोना के संकट में समाज के कई स्तर से मदद मिल रही है ऐसे टाटा ग्रुप जैसे बडी संस्था जब मदद करती है तो हौसला और बढ़ जाता है हम कोरोना की लढाई जरूर जीतेंगे। उद्धव ठाकरे के बेटे और मंत्री आदित्य ठाकरे ने भी टाटा की खूब तारीफ की।</h5>
<h5>पहले भी 1500 करोड़ रुपये की मदद का किया ऐलान</h5>
<h5>रतन टाटा के किसी आपदा में दान का यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी वे मदद के लिए आगे आते रहे हैं। इससे पहले टाटा ट्रस्ट ने कोरोना से निपटने के लिए 500 करोड़ का ऐलान किया था। टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा ने कहा कि इसके लिए इमर्जेंसी रिसोर्स की जल्द से जल्द आपूर्ति होनी चाहिए। वहीं मार्च माह में टाटा ग्रुप के बाद टाटा सन्स ने 1000 करोड़ रुपये का ऐलान किया था। सीएसआर यानि कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) के तहत कुल मिलाकर अब तक 1500 करोड़ रुपये की घोषणा की जा चुकी है।</h5>
<h5>बीएमसी देश की सबसे अमीर महानगर पालिका, स्वास्थ्य सेवाओं की फिर हालत खस्ता</h5>
<h5>बीएमसी यानि मुंबई महानगर पालिका का बजट देश के छोटे राज्यों के बजट से कहीं ज्यादा होता है, बीएमसी लगभग 30 हज़ार करोड़ रुपये का बजट पेश करती है, जिसमें स्वास्थ्य पर भी फोकस रहता है लेकिन बीएमसी के कामकाज में कितना करप्शन होता है ये किसी से छुपा नहीं है, शायद यही कारण है कि बीएमसी अस्पतालों की हालत खस्ता है।</h5>
<h5>स्वास्थ्य सेवाओं पर बजट की कमी नहीं, अमल करने में इच्छाशक्ति नहीं</h5>
<h5>बीएमसी ने 2019-20 के बजट में स्वास्थ्य बजट को पिछले साल से 15 पर्सेंट बढ़ा दिया था और इस बात का ध्यान रखा कि नई घोषणाओं पर पुराने अस्पतालों में सुधार को तरजीह दी जाए। पिछले साल के 3601 करोड़ रुपये के बजट को 15 प्रतिशत बढ़ाकर इस बार 4151 करोड़ रुपये किया गया है। बीएमसी के इतिहास में यह पहली बार है जब स्वास्थ्य का बजट 4 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंचा है। प्रशासन ने दावा है किया है कि बीएमसी अस्पतालों में उच्च दर्जे की मेडिकल सेवा देने के लिए पिछले साल 91.60 करोड़ रुपये खर्च कर अत्याधुनिक मशीनें खरीदी गईं। लेकिन आज भी बीएमसी के अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी है।</h5>
<h5>कोरोना में टाटा ने मरीजों के खाने का किया इंतजाम</h5>
<h5>कोरोना को कंट्रोल करने के लिए देश के सभी अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स और अन्य मेडिकल कर्मी दिन-रात काम कर रहे हैं। वे अपने जीवन और परिवार की परवाह छोड़कर इस मुहिम में जुटे हुए हैं। इंफेक्शन का डर इतना है कि वे घर तक नहीं जा रहे हैं। ऐसे में उनको दो वक्त का खाना भी ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। इन हालात में टाटा ग्रुप के ताज होटेल ने मुंबई में मेडिकल कर्मियों, मरीजों के लिए खाने का प्रबंध किया है। वाकई में टाटा द्वारा किये जा रहे इन कदमों से यकीन और पुख्ता हो रहा है कि जल्द ही फिर मुंबई की रंगीनियत वापस लौटेगी और कोरोना का खात्मा होगा।</h5>
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		<title>बोलो, अब कब बोलोगे&#8230;</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/covid-19-pandemic-stand-against-corruption-black-marketing-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anju Singh]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Jul 2020 06:11:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[Coronavirus]]></category>
		<category><![CDATA[Corruption]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Politics]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कब बोलोगे&#8230; इन दिनों देश कुछ अजीबो-गरीब हालात से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक सभी स्तर पर उथल-पुथल मची हुई है। लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति बन गई है। हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक अज्ञात सूक्ष्म वायरस ने समूचे विश्व को अपनी गिरफ्त [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>कब बोलोगे&#8230;</h5>
<h5>इन दिनों देश कुछ अजीबो-गरीब हालात से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक सभी स्तर पर उथल-पुथल मची हुई है। लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति बन गई है। हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक अज्ञात सूक्ष्म वायरस ने समूचे विश्व को अपनी गिरफ्त में ले लिया और सारा विज्ञान, सारा विकास और सारी टेक्नोलॉजी को पंगु बना दिया। सारी सरकारें अपने-अपने तरीकों से इस महामारी से निपटने की कोशिशें करती रहीं। सरकार के साथ-साथ आम जनता भी इस आपदा से युद्ध लड़ती नजर आई। &#8220;जान है तो जहान है&#8221; की कहावत चरितार्थ होती नजर आई। अपने अपनों से मुंह फेरते और मुर्दे कफन को तरसते रहे। &#8220;अतिथि देवो भव&#8221; की संस्कृति से ओत प्रोत दिलों के और घरों के दरवाजे बंद नजर आए। सड़कें लाचारों और मासूमों के कदमों के लहुलुहान चिन्हों से सनती रहीं। हम खामोशी से सब देखते और अपने जज्बातों को पीते रहे। गलवान घाटी में शहीद हुए जवानों की लाशें हमसे सवाल करती रहीं और हम मौन की चादर ताने रोते रहे। सरहद पर चीनी अतिक्रमण होता रहा और हम टिकटॉक बैन पर शोर मचाते रहे। महामारी के चलते अप्रत्याशित मंदी के दौर में भी जीवनावश्यक वस्तुओं, दवाइयों,सुरक्षा किटों की कालाबाजारी हमारी जेबें काटती गई और हम हालात और मजबूरी का रोना रोकर चुपचाप बैठे रहे।</h5>
<h5>कोरोना वैक्सीन के नाम पर कई तरह की दवाइयाँ बाजार में कई गुना ज्यादा दामों पर बिकीं। यह जानते हुए भी कि किसी बीमारी की दवा बनने, उसकी जांच होने और हम तक पहुंचने में वक्त लगता है। हम बिना किसी सवाल के दवाइयों को किसी भी कीमत पर हासिल करने की होड़ में लगे रहे। हवा की गति से फैलने वाली इस महामारी का इलाज डॉक्टर्स बिना किसी सुरक्षा और समुचित साधन के करने को मजबूर हैं, क्योंकि सरकार उन्हें उचित और जरूरी दवाइयाँ, पीपीई किट, मास्क आदि मुहैया कराने में असमर्थ है। इन अत्यावश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी हर जगह अपने चरम पर है। गरीबों और लॉकडाउन के चलते बेरोजगार हुए मजदूरों को सरकार मुफ्त राशन और आश्रय देने का काम तो कर रही है, परंतु इस आश्रय स्थलों का हाल और उपलब्धता असंतोषजनक है। इन तक पहुंचने वाला राशन, अनाज सरकारी गोदामों से चलकर इनकी झोली में आते-आते जानवरों को देने लायक भी नहीं रह जाता। अपने ही देश में &#8220;प्रवासी&#8221; कहलाने वाले पैदल ही अपने-अपने &#8220;वास&#8221; की ओर हजारों किलोमीटर भूखे नंगे चलते रहे और प्रशासन खामोश रहा। सोशल मीडिया पर मची हलचल के चलते कुछ श्रमिक ट्रेनें चलाई गई जिसके टिकटों की कालाबाजारी जमकर हुई। गरीब मरकर भी अपने घरों को ना पहुँच पाए। हालिया मार बिजली विभाग ने दी है। सरकार के इस आश्वासन के बावजूद, कि लॉकडाउन के मद्देनजर लोगों की आर्थिक परिस्थिती को ध्यान में रखते हुए सरकार बिजली, किराए और मूलभूत जरूरतों में माकूल रियायत बरतेगी, बिजली के कई गुना ज्यादा अनाप-शनाप बिल ने लोगों की नींद उड़ा दी है। कई महीनों से घरों में बैठे लोगों ने इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं की थी। एक नौकरी पेशा मध्यम वर्ग के लिए यूँ भी हालत बदतर हैं ।उस पर बिजली विभाग ने उन पर यह &#8220;बिजली&#8221; गिरा दी। लोगों के सामने &#8220;मरता क्या न करता&#8221; वाले हालात पैदा हो गए हैं। सरकार से गुहार लगाई जा रही है, मगर कोई संतोषजनक उत्तर आने की अपेक्षा कम ही है।</h5>
<h5>यदि पिछले कुछ महीनों के देश के हालात पर गौर करें तो हम सरकार को ही जिम्मेदार ठहराएँगे । पर सोच कर देखें तो पाएँगे कि सरकार के गैरजिम्मेदाराना रवैये, बढ़ते भ्रष्टाचार, मरती संवेदना और गिरती इंसानियत के हम भी उतने ही भागीदार हैं। हमने अपने कंफर्ट ज़ोन में जीना सीख लिया है। उससे बाहर निकलकर गलत का विरोध करना, आवाज उठाना हम भूल चलें हैं। हमें चीन के आक्रमणकारी हमले उतने व्यथित नहीं करते, जितना सस्ते चीनी उत्पादों पर बैन करता है। भ्रष्टाचार और कालाबाजारी हमें तब तक बुरी या गलत नहीं लगती, जब तक वह हमारी जेब में छेद नहीं करती।सरकारी और निजी अस्पतालों में चल रहा गोरखधंधा और लूटपाट हम तब तक बर्दाश्त करते हैं जब तक कोई हमारा अपना इसका शिकार नहीं बनता।  मुश्किल की इस घड़ी में मसीहा बनकर उतरे डॉक्टरों की तकलीफ और व्यथा हमें तब तक उद्वेलित नहीं करती, जब तक हमारा कोई परिजन इन डॉक्टरों की भीड़ में शामिल ना हो। सोशल मीडिया पर कुछ हो हल्ला मचा कर हम बिजली का बिल भी भर आएँगे,सिर्फ इसलिए क्योंकि &#8220;हम कुछ नहीं कर सकते&#8221;।</h5>
<h5>कुछ नहीं कर सकते की इस सोच ने हमें अपाहिज और भ्रष्ट तंत्र को मजबूत बना दिया है। आखिर हम कब समझेंगे, कि वोट देकर जिन जनप्रतिनिधियों को हमने सत्ता सौंपी है, उनसे सवाल करने का हमें पूरा अधिकार है। हमें हक है यह जानने का, कि क्यों डॉक्टर्स बिना सुविधा के काम करने को मजबूर हैं। तालियां और थालियां इनकी सुरक्षा नहीं कर सकतीं। सड़े हुए गेहूं और चावल भूख से तड़पते लोगों की क्षुधा नहीं मिटा सकते। बिके हुए मीडिया के सामने दिए गए अर्थहीन भाषण लहुलुहान कदमों पर मरहम नहीं लगा सकते। महीनों से बंद पड़े घरों के दरवाजों में खोंसे गए बिजली के बिल लोगों के जख्मों पर नमक का काम कर रहे हैं। लोगों के दिलों में सरकार और व्यवस्था के खिलाफ असंतोष की एक लहर पैदा हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि इस लहर को सैलाब बनने से कैसे रोका जाए? एक ही रास्ता है &#8211; &#8220;आवाज उठानी होगी&#8221;।  लोकतंत्र से राजतंत्र में बदलती व्यवस्था का रुख मोड़ना होगा।  शासन तंत्र को अपनी उपस्थिति और अपने महत्व का एहसास कराना होगा। गलत के खिलाफ आवाज उठानी होगी, फिर चाहे वह हमारे साथ हो या किसी और के साथ। कोई और पहल करें, इसका इंतजार करना हल नहीं है। गिरती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के नाम पर शराब की खुली दुकानों पर टूट पड़ने वाली भीड़, मुफ्त राशन की कतारों में मुंह छुपाती रही। पर क्या वही भीड़ आपको किसी भी बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर दिखाई दी? नहीं, क्योंकि हम अपने अधिकारों के लिए लड़ना भूल चुके हैं। कोरोना के नाम पर मनमानी राशि बटोर रहे अस्पतालों के सामने हम मजबूर हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि जो हो रहा है, सरकारी महकमों की मिलीभगत से हो रहा है। या तो इस मनमानी को बर्दाश्त कीजिए या फिर आवाज उठाइए और अपने भीतर के सैलाब को तूफान का रूप लेने दीजिए। एक वैश्विक त्रासदी का रूप ले चुकी महामारी को हमने मजाक और मीम्स में उड़ा दिया।</h5>
<h5>लॉकडाउन के इस वक्त में हम अपने भीतर के शेफ़ को जगाने में इतने मशगूल रहे कि सरकार से यह पूछना ही भूल गए कि बड़े बड़े औद्योगिक घरानों के द्वारा दिए गए लाखों करोड़ रुपयों का लाभ वेंटिलेटर के अभाव में मरते कोविड-19 मरीजों तक क्यों नहीं पहुँचा? पीएम केयर फंड का कुछ हिस्सा महामार्गो पर दम तोड़ते श्रमिकों को राहत क्यों नहीं दे पाया? हम सरकार से यह सवाल क्यों नहीं कर पाए कि सरकारी राहत सामग्री की गुणवत्ता गरीबों के मुंह तक आते-आते निकृष्टतम कैसे हो गई ? करोड़ों रुपए खर्च कर खरीदी गई दवाइयां और पीपीई किट्स आखिर उन सेवाकर्मियों और डॉक्टरों तक क्यों नहीं पहुँचे जो इसके अभाव में कोरोना से संक्रमित हो गए? राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच एक संतुलन क्यों नहीं बन पाया जिससे इस विपत्ति को समय रहते रोका या नियंत्रित किया जा पाता? पहले ही आर्थिक तौर पर टूट चुकी जनता को अब बिजली की मार से आखिर सरकार क्यों नहीं बचा पा रही है? सवाल कीजिए मिलकर कि ट्विटर युद्ध करने वाली सरकार आखिर इन मुद्दों पर चुप क्यों हैं? हम मिडिल क्लास वाले ही अपने वोटों से सरकार चुनते हैं और हमारी चुनी सरकार हमारी ही अनदेखी क्यों करती है? आवाज बुलंद करनी ही होगी, क्योंकि खामोश शिकायतें दम तोड़ देती हैं। जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार को जनता के सवालों का जवाब देना ही होगा।</h5>
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		<item>
		<title>सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड ने विभिन्न कल्याणकारी पहलों के माध्यम से कोविड-19 और अम्फान संकट में योगदान किया</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/csr-news-satin-creditcare-network-limited-contributes-to-the-covid-19-and-amphan-crisis-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Jul 2020 11:20:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[cyclone Amphan]]></category>
		<category><![CDATA[satin creditcare]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://thecsrjournal.in/?p=24043</guid>

					<description><![CDATA[<p>देश की अग्रणी माइक्रोफाइनेंस कंपनियों में से एक सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड (SCNL) (NSE: SATIN, BSE: 539404) ने अपने कर्मचारियों को सहयोग देने और कोविड-19 तथा अम्फान संकट के पीड़ितों को राहत देने के लिये कई कल्याणकारी पहलें की हैं। यह उपाय भारत में घातक कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने में सरकार की सहायता [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://thecsrjournal.in/csr-news-satin-creditcare-network-limited-contributes-to-the-covid-19-and-amphan-crisis-hindi">सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड ने विभिन्न कल्याणकारी पहलों के माध्यम से कोविड-19 और अम्फान संकट में योगदान किया</a> appeared first on <a href="https://thecsrjournal.in">The CSR Journal</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>देश की अग्रणी माइक्रोफाइनेंस कंपनियों में से एक सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड (SCNL) (NSE: SATIN, BSE: 539404) ने अपने कर्मचारियों को सहयोग देने और कोविड-19 तथा अम्फान संकट के पीड़ितों को राहत देने के लिये कई कल्याणकारी पहलें की हैं। यह उपाय भारत में घातक कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने में सरकार की सहायता करने और अम्फान तूफान से हुई क्षति की भरपाई करने के लिये किये गये हैं। कंपनी कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिये सभी जरूरी उपाय कर रही है और सरकार तथा अथॉरिटीज द्वारा जारी निर्देशों और सलाहों का पालन कर रही है, ताकि उसके कर्मचारियों और उधार लेने वालों का स्वास्थ्य और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। प्रत्येक कर्मचारी की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है, इसलिये कंपनी ने अपने 13000 से अधिक कर्मचारियों का कोविड बीमा करने का निर्णय लिया है, जिसमें घातक कोरोना वायरस का उपचार कवर होता है। कंपनी ने पाँच राज्यों -असम, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और ओडिशा में ग्राहकों के लिये वित्तीय सशक्तिकरण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है, जहां प्रत्येक राज्‍य में औसतन 300 से 350 रोगी हैं।</h5>
<h5>कंपनी ने असम और ओडिशा में समुदायों को सहयोग प्रदान करने और सशक्त करने के लिये फानी और अम्फान तूफान के बाद कई राहत और कल्याणकारी उपाय किये हैं। इसकी शुरूआत बाढ़ राहत और कई निशुल्क स्वास्थ्य जाँच कैम्पों से हुई थी। कंपनी ने असम के शिवसागर में नौ जागरूकता कैम्पों का आयोजन भी किया, ताकि संकट के समय में लोगों को ॠण अनुशासन और वित्तीय साक्षरता पर शिक्षित किया जा सके। कंपनी ने स्टूडेन्ट्स को स्कूल बैग्स देकर असम के चार स्थानीय सरकारी स्कूलों को सहयोग किया। असम में उषा के साथ भागीदारी में सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड ने स्थानीय लोगों को सिलाई मशीन के उपयोग का प्रशिक्षण देकर कौशल विकास में मदद की।</h5>
<h5>सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक श्री एच.पी. सिंह ने कहा, ‘‘सैटिन में हम हमेशा से अपने कर्मचारियों, ग्राहकों और समाज के कम भाग्यशाली लोगों की भलाई में योगदान देने के लिये सक्रिय रूप से संलग्न रहे हैं। हमारा लक्ष्य उन्हें राहत देना, उनकी जरूरतें पूरी करना है, जिसके लिये उन्हें क्षमता निर्माण पर सशक्त किया जाता है, ताकि वे खुद को और अपने परिवार को सहयोग दे सकें। अपनी विभिन्न सामुदायिक राहत और कल्याणकारी पहलों के माध्यम से हम घातक कोविड-19 संकट से लड़ने और आजीविकाओं में बाधा उत्पन्न कर उन्हें प्रभावित करने वाले अम्फान तूफान से हुई क्षति को कम करने में अपनी भूमिका निभाने के लिये प्रतिबद्ध हैं। अपनी शुरूआत से ही SCNL ने सेंटर लीडर वर्कशॉप्स, मेडिकल कैम्प, स्वच्छता अभियान, वित्तीय साक्षरता प्रशिक्षण, आदि के आयोजन द्वारा उन समुदायों को लाभ पहुँचाने के लिये लगातार काम किया है, जहाँ कंपनी काम करती है। SCNL इस उम्मीद के साथ गैर-लाभकारी संस्थाओं और एनजीओ को भी दान देता आ रहा है, कि इससे SCNL को समाज की बेहतरी में सहायता और योगदान देने के व्यापक अवसर मिलेंगे और हमारा समाज रहने के लिये एक बेहतर जगह बनेगा। सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड का लक्ष्य अपने स्थायी प्रयासों और कार्यों के माध्यम से अपने से जुड़े सभी लोगों के लिये महत्व का निर्माण जारी रखना है।’’</h5>
<h5> SCNL ने असम और ओडिशा में फूड रिलीफ और पाँच निशुल्क स्वास्थ्य जाँच कैम्प का आयोजन किया</h5>
<h5> SCNL अपने 13000 कर्मचारियों का कोविड बीमा करेगा, जिसमें घातक कोरोनावायरस से संक्रमित होने पर उपचार कवर होता है</h5>
<h5> SCNL ने पाँच राज्यों में वित्तीय सशक्तिकरण कार्यशालाओं का आयोजन किया- असम, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और ओडिशा और असम के शिवसागर में नौ जागरूकता कैम्प लगाये</h5>
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		<title>कोरोना पर 342 करोड़ में से किया सिर्फ 23 करोड़ खर्च</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/maharashtra-govt-spent-23crore-on-hospitals-out-of-342-cm-coronavirus-relief-fund-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Jun 2020 11:20:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[CM Relief Fund]]></category>
		<category><![CDATA[corona]]></category>
		<category><![CDATA[Coronavirus]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[Uddhav Thackery]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>महाराष्ट्र देश का वो राज्य जहां लगातार कोरोना के मामले बढ़ रहे है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई चीन की वुहान बन गयी है, आम जनमानस के साथ ही मंत्री, संत्री, पुलिस, पत्रकार हर कोई कोरोना की चपेट में आ रहा है। मामला लगातार गंभीर बना हुआ है, अस्पतालों में इलाज के लिए जगह नहीं [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>महाराष्ट्र देश का वो राज्य जहां लगातार कोरोना के मामले बढ़ रहे है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई चीन की वुहान बन गयी है, आम जनमानस के साथ ही मंत्री, संत्री, पुलिस, पत्रकार हर कोई कोरोना की चपेट में आ रहा है। मामला लगातार गंभीर बना हुआ है, अस्पतालों में इलाज के लिए जगह नहीं है, लोगों की मौत हो रही है लेकिन महाराष्ट्र सरकार का गज़ब कार्य भार है। महाराष्ट्र के सीएम रिलीफ फंड कोविड 19 अकाउंट में दानदाताओं ने की हुई मदद से 342 करोड़ रुपए जमा हुए जबकि जिस कोविड के नाम पर दान दिया गया उसपर सिर्फ 23.82 करोड़ रुपये ही अबतक खर्च किया गया है। और तो और ताज्जुब की बात यह भी हैं कि सबसे अधिक धनराशि 55.20 करोड़ की रकम प्रवासी मजदूरों की यात्रा पर खर्च हुई हैं। वही 80 लाख रुपए औरंगाबाद रेल दुर्घटना के प्रभावितों को दिए गए हैं।</h5>
<h2><a href="https://www.maharashtra.gov.in/">महाराष्ट्र सरकार</a> ने 342 करोड़ में से कोरोना पर सिर्फ 23 करोड़ किये खर्च</h2>
<h5>आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल गलगली ने रिलीफ फंड कोविड 19 अकाउंट में जमा हुई कुल धनराशि और आवंटित रकम का ब्यौरा मांगा था। सीएम रिलीफ फंड के सहायक लेखाधिकारी मिलिंद क़ाबाडी ने आरटीआई के तहत जानकारी देते हुए बताया कि 18 मई 2020 तक कुल रु 342.01 करोड़ रुपये जमा हुई हैं। इस धनराशि से कुल रु 79,82,37,070/- रकम खर्च की गई हैं। खर्च हुई धनराशि से कोविड 19 पर सिर्फ रु 23, 82,50,000/- खर्च की गई हैं। इसमें से रु 20 करोड़ सेंट जार्ज अस्पताल, मुंबई को आवंटित किया गया और रु 3,82,50,000/- रकम मेडिकल शिक्षा और संशोधन विभाग को दी गई हैं।</h5>
<h5>प्रवासी मजदूरों के लिए जो रकम आवंटित की गई हैं उसे राज्य के कलेक्टरों को सौंप दी गई हैं ताकि रेलवे का किराया का भुगतान समय पर हो सकें। इसमें 36 जिलों के जिलाधिकारियों को प्रवासी मजदूरों का किराया देने के लिए आवंटित किया गया है जिसकी रकम रु 53,45,47,070/- हैं। रत्नागिरी जिलाधिकारी को मजदूर का रेलवे का किराया देने के लिए रु 1.30 करोड़ और सांगली में मजदूर का रेलवे का किराया रु 44.40 लाख अदा किया गया हैं। औरंगाबाद में हुए रेलवे दुर्घटना में प्रति मृतक व्यक्ति को रु 5 लाख के हिसाब से रु 80 लाख रुपए की आर्थिक मदद सीएम रिलीफ फंड कोविड 19 के अकाउंट से की गई हैं।</h5>
<h5>The CSR Journal से ख़ास बातचीत करते हुए अनिल गलगली ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना को लेकर कुल जमा रकम में से सिर्फ 7 फीसदी रकम स्वास्थ्य सेवा पर खर्च किया हैं। प्रवासी मजदूरों की रेलवे टिकट पर 16 प्रतिशत रकम खर्च की हैं और रेलवे दुर्घटना के मृतकों पर 0.23 प्रतिशत रकम खर्च की हैं। आज भी सीएम रिलीफ फंड में रु 262.28 करोड़ रुपए की धनराशि हैं।</h5>
<h2>मुख्यमंत्री राहत कोष कोविड-19 में दान देने की अपील के बाद मिले 342 करोड़</h2>
<h5>28 मार्च, 2020 को महाराष्ट्र सरकार ने कोरोनो वायरस महामारी के प्रभाव से निपटने में सरकार की मदद करने के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष कोविड-19 की स्थापना की थी और लोगों से इसमें धन दान करने की अपील की थी। देनदाता इस दान पर धारा 80 (जी) के तहत आयकर से छूट भी प्राप्त कर पा रहें थे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अपील के बाद महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर लोगों ने इस राहत कोष में दान दिया था।</h5>
<h2>कॉर्पोरेट्स कंपनियों ने अपने <a href="https://thecsrjournal.in/how-corporate-csr-is-helping-to-tackle-coronavirus/">सीएसआर फंड</a> का इस्तेमाल किया और दान दिया</h2>
<h5>कोरोना के इस संकट में महाराष्ट्र सरकार को कोई आर्थिक दिक्कत और संकट ना आये इसलिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव की अपील के बाद आम जनता ने तो दान दिया ही लेकिन कई NGO, कॉरपोरेट और धार्मिक संगठन संकट को दूर करने के लिए राज्य के प्रयासों में योगदान देने के लिए आगे आये। कॉर्पोरेट कंपनियों ने अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड का भी इस्तेमाल किया और सरकार की तिजोरी भरी। लेकिन कोरोना के इस संकट काल में अगर इस महामारी को हराने के लिए पैसे ही खर्च ना हो तो सरासर सरकार की नाकामी है।</h5>
<h5>कोरोना से लड़ने के लिए जहां अस्पतालों की कमी, बेड्स की कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी साफ़ तौर पर दिख रही है, इन्ही कमी को पूरा करने के लिए जनता ने बढ़चढ़ कर दान दिया ताकि बीएमसी, सरकारी अस्पतालों में मेडिकल से जुड़ी सेवाओं की पूर्ति पर पैसे की कमी ना आये। फिलहाल पैसों की कमी नहीं है, अकूत पैसा है लेकिन शायद सरकार को ये समझ में नहीं आ रहा कि इस पैसों का खर्च कैसे किया जाय ताकि कोरोना की महामारी से बचा जा सके।</h5>
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		<title>गज़ब!! राम भरोसे चलती हैं रेलवे की श्रमिक ट्रेनें</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/shramik-express-trains-no-planning-no-facilities-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 May 2020 10:57:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[corona]]></category>
		<category><![CDATA[Coronavirus]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[migrant worker]]></category>
		<category><![CDATA[Shramik Express]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>देश में पलायन की तस्वीर देख हर कोई विचलित होने लगा, सरकार की लाचारी पर सवाल खड़े होने लगे, सरकार की नाकामी ने मजदूरों के बीच वो गुस्सा पैदा किया कि मानों ये गुस्सा अब फूटे कि तब। इस बीच राहत की खबर आई, मजदूरों को उनके घरों तक भेजने का सरकारी इंतेज़ाम किया गया, [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>देश में पलायन की तस्वीर देख हर कोई विचलित होने लगा, सरकार की लाचारी पर सवाल खड़े होने लगे, सरकार की नाकामी ने मजदूरों के बीच वो गुस्सा पैदा किया कि मानों ये गुस्सा अब फूटे कि तब। इस बीच राहत की खबर आई, मजदूरों को उनके घरों तक भेजने का सरकारी इंतेज़ाम किया गया, स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ, नाम दिया गया श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन, जैसे तैसे शुरू हुई <a href="https://thecsrjournal.in/coronavirus-shramik-express-train-migrant-labours-hindi/">श्रमिक एक्सप्रेस</a> मजदूरों के लिए एक उम्मीद की किरण लेकर आयी। राहत की बात रही कि अब मजदूर पैदल फासलों को नहीं नापेंगे और ना ही मजदूर के पैरों में छाले पड़ेंगे। लेकिन अफ़सोस रेलवे और सरकारें ये वाहवाही बहुत दिनों तक नहीं लूट पायी और अब श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों की बदइंतजामी सामने आने लगी।</h5>
<h2><a href="http://www.indianrailways.gov.in/">रेलवे</a> की लापरवाही की बेइंतेहां, राम भरोसे चलती हैं रेलवे की श्रमिक ट्रेनें</h2>
<h5>पहले से कोरोना की महामारी जलते मजदूर, ना मजदूरी बची ना पैसे बचे, किसी तरह अपने गांव जाने की लालसा लिए मजदूरों के साथ अब रेलवे भी मजाक ही कर रही है। दावे तो खूब किये जाते है, सरकार, रेलवे हर कोई ऐसे ऐसे दावे कर रही हो जैसे चारों ओर रामराज्य आ गया हो, मजदूरों को कोई तकलीफ नहीं हो रही है लेकिन सरकारी बदइंतजामी ऐसी है कि मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया हो। 36-36 घंटों के सफर में मजदूरों को ना खाना दिया जा रहा है और ना पीने के लिए पानी दिया जा रहा है। भेड़ बकरियों की तरह भरकर राज्य सरकारें भेज दे रही है। ये तक नहीं सोच रही है कि ये मजदूर भी हमारे ही है, इन्ही की वजह से देश की जीडीपी बढ़ती है और पीएम नरेंद्र मोदी ट्रिलियन इकॉनमी का सपना देख पाते है।</h5>
<h2>मुंबई से चली थी ट्रेन गोरखपुर के लिए पहुंच गई राउरकेला</h2>
<h5>रेलवे की तरफ से एक बड़ी लापरवाही सामने आई है, बीते 21 मई को महाराष्ट्र के वसई से गोरखपुर के लिए निकली श्रमिक स्पेशल ट्रेन राउरकेला ओडिशा पहुंच गई। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह रेलवे की इस लापरवाही पर ट्वीट किया है। आरपीएन सिंह ने अपने ट्वीट में लिखा है, मुंबई से गोरखपुर जाने के लिए निकली श्रमिक स्पेशल ट्रेन राउरकेला, ओडिशा पहुंच गई है क्योंकि ड्राइवर रास्ता भूल गया।</h5>
<h5>वसई से गोरखपुर के लिए निकली श्रमिक स्पेशल ट्रेन का रूट डाइवर्ट होने की लेकर पश्चिम रेलवे की तरफ से सफाई आई है। रेलवे ने कहा है कि बड़ी संख्या में श्रमिक ट्रेनों के चलने की वजह से जलगांव-भुसावल-खंडवा-इटारसी-जबलपुर रुट पर काफी ट्रैफिक था। इसलिए बिलासपुर रुट से गोरखपुर जाने के लिए ट्रेन को डाइवर्ट किया गया। रुट बदलने के चलते उड़ीसा में ट्रेन के पहुंचने के बाद यात्रियों ने हंगामा किया था, जिसके बाद पश्चिम रेलवे की तरफ से यह सफाई जारी की गई है।</h5>
<h2>रेलवे की श्रमिक ट्रेनें  का हाल, 10-10 घंटे तक आउटर पर सिग्नल नहीं</h2>
<h5>प्रवासी मजदूर श्रमिक ट्रेनों में दुदर्शा हो रही है, एक तो ट्रेनें देरी से चल रही हैं और न रास्ते में उनको खाना दिया जा रहा है, न डिब्बों की साफ-सफाई हो रही है। कुछ मजदूरों ने ट्रेनें रोके जाने पर रास्ते में प्रदर्शन भी किया है। इसी तरह आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम से श्रमिक ट्रेनों में बैठकर आए मजदूरों का गुस्सा उस समय फूट पड़ा जब उनकी ट्रेन को दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन के आउटर सिंग्नल पर 10 घंटे तक रोके रखा गया।</h5>
<h5>इस तरह एक और ट्रेन जो कि महाराष्ट्र के पनवेल से जौनपुर आ रही ट्रेन को वाराणसी में करीब 10 घंटे तक रोके रखा गया। इससे गुस्साए मजदूरों ने रेलवे ट्रैक पर बैठकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। हालांकि बाद में रेलवे पुलिल ने इन लोगों के खाने की व्यवस्था की तब जाकर ट्रेन को आगे बढ़ाया गया। इस ट्रेन में सफर कर रहे एक यात्री ने बताया कि महाराष्ट्र में एक बार खाना दिया गया था लेकिन उसके बाद यूपी में कुछ नहीं मिला।</h5>
<h5>इससे पहले भिवंडी से मधुबनी चली श्रमिक ट्रेन बनारस से गोरखपुर चली गई। और फिर गोरखपुर से रक्सौल बॉर्डर, फिर वापस नरकटियागंज होते हुए करीब 24 घंटे की देरी से दंरभगा पहुँची थी। बोरीवली से मधुबनी चली श्रमिक ट्रेन जलगांव तक ठीक गई, उसके बाद नागपुर पहुंच गई। इससे पहले गोरखपुर जाने वाली ट्रेन के साथ भी ऐसी ही खबरें सामने आई थीं।</h5>
<h2>लापरवाही का जिम्मेदार कौन ?</h2>
<h5>बहरहाल रेलवे और सरकार पर सवाल उठना लाज़मी हैं कि इस भीषण गर्मी में रेलवे ने यात्रियों के साथ इस तरह क मजाक क्यों किया जा रहा है ? जब सामान्य ट्रेन का परिचालन नहीं हो रहा है तो रेलवे ट्रैफिक का बहाना क्यों बना रहा है? अगर ट्रैफिक इतनी थी तो इसकी जानकारी पैसेंजर को क्यों नहीं दी गई? मुंबई के वसई से गोरखपुर के लिए निकली श्रमिक स्पेशल ट्रेन में रूट के बारे में टिकट पर साफ-साफ जानकारी है तो फिर ट्रेन राउरकेला कैसे पहुंच गई? तमाम सवाल है लेकिन जवाब ना रेलवे के पास और ना सरकार के पास।</h5>
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		<item>
		<title>कोरोना रिकवरी को लेकर यूपी में कानपुर अव्वल</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/coronavirus-kanpur-recovery-rate-highest-up-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 May 2020 10:19:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[corona]]></category>
		<category><![CDATA[Coronavirus]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[Kanpur]]></category>
		<category><![CDATA[UP Government]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कोरोना को लेकर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से अच्छी ख़बर है, उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में कोरोना के मरीज तेजी से ठीक होने लगे हैं। कानपुर के कोरोना संक्रमित मरीजों का रिकवरी रेट उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों से काफी बेहतर है। यही कारण है कि कानपुर में कोरोना के केसेस में भारी कमी [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h5>कोरोना को लेकर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से अच्छी ख़बर है, उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में कोरोना के मरीज तेजी से ठीक होने लगे हैं। कानपुर के कोरोना संक्रमित मरीजों का रिकवरी रेट उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों से काफी बेहतर है। यही कारण है कि कानपुर में कोरोना के केसेस में भारी कमी देखने को मिल रही है जो कि यूपी सरकार (UP Government) के लिए राहत की ख़बर है। यूपी (UP) में एक समय ऐसा था कि <a href="https://kanpurnagar.nic.in/">कानपुर</a> शहर में इतने मामले बढ़े कि शहर का नाम पूरे राज्य में तीसरे नंबर पर आ गया लेकिन अब राहत की बात है कि नए केसेस में तेजी से गिरावट आयी है।</h5>
<h2>नए केस ना के बराबर, तेजी से ठीक होते कोरोना के मरीज</h2>
<h5>यूपी के मेनचेस्टर के रूप में प्रख्यात कानपुर में 40 से ज्यादा हॉट स्पॉट हो गए थे, लिहाजा सीएम योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने दो सीनियर अधिकारीयों को कानपुर भेजा और डॉक्टरों, प्रशासन और स्थानीय लोगों की मदद से कोरोना को कण्ट्रोल करने की नीति तैयार हुई और आज जाकर नतीजे सामने आ रहें है। कानपुर की तुलना राजधानी लखनऊ से करें तो लखनऊ का कोरोना रिकवरी रेट 78 फीसदी है तो वहीं कानपुर में 90 फीसदी। नए केसेस ना के बराबर आ रहें है वहीं बड़े पैमाने पर कोरोना पॉजिटिव मरीजों की अलग अलग अस्पतालों से छुट्टी हो रही है।</h5>
<h2>आकड़ों में कोरोना</h2>
<h5>कोरोना के ग्राफ की बात करें तो बुधवार को कोरोना के कानपुर में सिर्फ एक ही केस आया, सोमवार और मंगलवार को कानपुर में कोई केस नहीं आया, अबतक कानपुर में 317 केसेस आये है, जिनमे से 288 कोरोना मरीज अस्पताल से डिस्चार्ज होकर अपने घर जा चुके है, कानपुर में कोरोना से अबतक 9 लोगों की मौत हुई है और महज 20 ही ऐसे मरीज है जिनका इलाज अलग अलग अस्पतालों में जारी है, यानि एक्टिव केस सिर्फ 20 बचें है।</h5>
<h5>कानपुर में प्रवासी मजदूरों का आने का सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन गनीमत है कि अबतक के आकड़ों में उछाल नहीं हो रहा है। <a href="https://thecsrjournal.in/coronavirus-shramik-express-train-migrant-labours-hindi/">यूपी</a> के अन्य जिलों की हालत बहुत ठीक नहीं है, प्रवासी मजदूरों की वजह से कोरोना के मामले भी बढे है। प्रवासी मजदूरों में अगर स्क्रीनिंग के बाद उनमें लक्षण नहीं दिखता है तो उन्हें 21 दिन के लिए घर पर क्वारंटीन में रखा जा रहा है। अगर लक्षण हैं तो जांच कराकर सात दिन के लिए क्वारंटीन सेंटर पर रखा जाता है और पुन: परीक्षण में निगेटिव पाये जाने पर 14 दिन के लिए घर पर क्वारंटीन में रखा जाता है।</h5>
<h2>कानपुर कोरोना फ्री की राह पर</h2>
<h5>स्वास्थ्य विभाग के आकड़ों की माने तो अभी तक 7442 नमूनों की जांच रिपोर्ट निगेटिव मिली है। हॉट स्पॉट क्षेत्रों से रैंडम सैम्पल किए जा रहे है, ख़ासकर उन जगहों से अधिक रैंडम सैम्पल लिए गए हैं जहां अधिक केस मिले हैं। इनमें कुली बाजार और कर्नलगंज क्षेत्र के इलाके सबसे अधिक प्रभावित पाए गए हैं। कानपुर के कर्नलगंज और चमनगंज इलाके में भी टीमें सक्रिय है। नौ हजार से अधिक घरों में स्क्रीनिंग की गई है। बहरहाल अगर ऐसे ही नए केसेस नहीं आये और पॉजिटिव मरीजों के सेहत में सुधार होता गया तो वो दिन दूर नहीं जब यूपी का कानपुर कोरोना मुक्त हो जायेगा।</h5>
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			</item>
		<item>
		<title>पलायन के दर्द का अंत करो सरकार &#8211; मजबूर मजदूर</title>
		<link>https://thecsrjournal.in/endless-pain-migrant-labourers-hindi</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rahuldeo Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 May 2020 12:24:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी मंच]]></category>
		<category><![CDATA[corona]]></category>
		<category><![CDATA[Coronavirus]]></category>
		<category><![CDATA[covid19]]></category>
		<category><![CDATA[migrant worker]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://thecsrjournal.in/?p=22673</guid>

					<description><![CDATA[<p>सरकार आप माई बाप हो, सरकार आप मजदूरों के पालनहार हो, सरकार आप ही के बलबुते मजदूर भले मज़बूरी में ही सही जिंदा है, मर रहा है, खुद को कोस रहा है कि क्यों मैं ऐसे मुल्क में पैदा हुआ जहां के प्रधानमंत्री पता नहीं कैसे ट्रिलियन इकॉनमी का सपना देखते है। ट्रिलियन इकॉनमी ये [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h5>सरकार आप माई बाप हो, सरकार आप मजदूरों के पालनहार हो, सरकार आप ही के बलबुते <a href="https://thecsrjournal.in/coronavirus-shramik-express-train-migrant-labours-hindi/">मजदूर</a> भले मज़बूरी में ही सही जिंदा है, मर रहा है, खुद को कोस रहा है कि क्यों मैं ऐसे मुल्क में पैदा हुआ जहां के प्रधानमंत्री पता नहीं कैसे ट्रिलियन इकॉनमी का सपना देखते है। ट्रिलियन इकॉनमी ये शब्द बस जैसे तैसे याद तो कर लिया लेकिन इसका मतलब नहीं समझता हूँ साहब। मजदूर हूँ और मजबूर भी हूँ। कोरोना काल में गलतियां तो बड़े सूटबूट वालों ने की। परदेशों से आये तो बीमारी भी लाये लेकिन अब हालात ऐसे हो गए है कि अब हम मजदूरों को रोजी रोटी छोड़ फिर भुखमरी दुनियां में जाने को मजबूर कर दिया।</h5>
<h2>सरकार के अर्थव्यवस्था की रीढ़ है पलायन करते मजदूर</h2>
<h5>हम पलायन कर रहें है, बड़े बड़े शहरों के अर्थव्यवस्था की हम अबतक रीढ़ हुआ करते थे, हमसे शहर गुलजार हुआ करता था, हम देश के बड़े बड़े शहरों को चलाते थे, वहां कमाते थे, परिवार का पेट भरता था लेकिन कोरोना की महामारी ने सबकुछ बंद कर दिया, जो शहर हमारी मेहनत के दम पर दौड़ता था आज उसी शहर से हम मजदूर भाई चलने के लिए मजबूर हो गए है। देश के हमारे मुखिया जो अपने आप को सेवक कहते है, कहां है उनका सेवाभाव, कहां है उनकी नीतियां, क्यों हमें कुछ आस नज़र नहीं आ रही है। हम मजदूर रोज कमाते है और रोज खाते है। क्यों नहीं हमारे लिए कुछ व्यवस्था नहीं की जा रही है।</h5>
<h2>20 लाख करोड़ में से मजदुर को कितना मिलेगा</h2>
<h5>हम तो ठहरे मजदूर, हमें क्या पता सरकार की <a href="https://www.finmin.nic.in/">आर्थिक</a> नीतियां क्या होंगी। अरे साहब ये सब भारी भरकम शब्द मैं जानता नहीं बल्कि कुछ सूटबूट वाले बोलते रहते है तो मैं भी सुनकर समझने की जुगत में रहता हूँ। सुना है 20 लाख करोड़ रुपये सरकार ने हमारे लिए खर्च करने का प्लान बनाया है। भगवान जाने 20 लाख करोड़ कितना होता है और मेरे इस गरीब की झोली में कितना आएगा।</h5>
<h5>इन सब से बेपरवाह मैं बिना कुछ सोचे समझे निकल पड़ा हूँ अपने पैतृक गांव, बेपरवाह इस बात का कि मेरे पैरों में कितने छाले पड़ेंगे। बेपरवाह उन बातों से कि चलते चलते मेरा ये सफर कहीं आखिरी सफर ना बन जाए। इस बात से भी मैं बेपरवाह हूँ कि चल तो दिया हूँ लेकिन पहुंचने के बाद क्या मुझे रोज़गार मिलेगा। क्या मेरे परिवार का भरण पोषण होगा। सरकार इस दुःख की घडी में एक ओर कहती है कि सरकार साथ में है, दूसरी ओर कहती है कि आत्मनिर्भर बनो, सरकार हम आपके ऊपर निर्भर नहीं है यही कारण है कि हम अपनी राह खुद ही नाप लिए। आपके भरोसे नहीं बैठे।</h5>
<h5>ऐ सरकार मेरी तू परीक्षा मत ले मैं बहुत दुःखी हूँ, स्तब्ध हूँ, अचंभित हूँ, मेरे जिन्दा रहते तो तुझे मेरी क़द्र नहीं है, मरने के बाद क्यों दिखावा करता है। मेरे मजदूर भाई महाराष्ट्र से एमपी जीते जी नहीं जा पाए तो रेलवे की चपेट में आ गए और फिर मरने के बाद तू अफ़सोस जाहिर करते हुए शवों को हेलीकाप्टर से ले गया। रास्ते में चलते चलते मेरे भाईयों की मौत हो जा रही है, कई सड़क दुर्घटनाएं हो रही है। सरकार तेरी यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही है कि जीते जी मजदूरों की कोई कीमत नहीं समझी गई और मरने के बाद भी उनके साथ बदसलूकी, हद है ये। औरैया हादसे में मारे गए मजदूरों के शवों के साथ अमानवीयता किया है तुमने। औरैया सड़क हादसे के शिकार मजदूरों के शवों को ट्रकों में भरकर झारखंड भेजने की चेष्टा की है तुमने।</h5>
<h2>चुनावी माहौल में मजदूर देंगें सरकार को जवाब</h2>
<h5>ऐ सरकार कितनी परीक्षाएं तू लेगा हम मजदूरों का, हम मजबूर है, बेसहारा है, लेकिन वक़्त हमारा भी आएगा, दुःख की घड़ी जरूर है, बीत जायेगा ही। ये वक़्त तेरा है जब हम हाथ जोड़कर तेरे सामने गिड़गिड़ा रहें है, रहम की भीख़ मांग रहें है कि हम पर तरस खा, हमें सही सलामत अपने गांव पहुंचा। लेकिन तू एक नहीं सुन रहा है। मुझे यकीन है कि वो वक़्त फिर मेरे सामने आएगा जब तू मेरे कुटिया के सामने हाथ जोड़े खड़ा होगा और वोट की भीख़ मांगेगा। तब मैं हर एक पल का, हर एक लम्हों का, पलायन के दर्द का हिसाब चुकता करूँगा।</h5>
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