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कर्नाटक की राजनीति – 55 घंटों के सीएम।

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शायद ये पहली बार हुआ है कि राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण की कमान को लेकर ना सिर्फ आन बान और शान की लड़ाई हुई बल्कि इस चुनाव में सत्ता हथियाने के लिए शाम दाम दंड भेद सब अपनाया गया। आखिरकार कर्नाटक का नाटक खत्म हुआ लेकिन जो कर्नाटक की राजनीति में हुआ वो इतिहास के पन्ने में दर्ज हो गया। कर्नाटक में 55 घंटे के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने शनिवार शाम शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया। अब कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार बनेगी। कुमारस्वामी बुधवार को शपथ लेंगे। राज्यपाल ने कुमारस्वामी को भी बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन दिए हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बीएस येदियुरप्पा को दी 15 दिन की मोहलत घटाकर एक दिन कर दी थी। कोर्ट ने शनिवार सुबह फ्लोर टेस्ट के सीधे प्रसारण का भी आदेश दे दिया। इसके बाद 4 घंटे में घटनाक्रम तेजी से बदला। 101 फीसदी जीत का दावा करने वाली बीजेपी बैकफुट पर आ गई। कांग्रेस ने टेप जारी कर बीजेपी पर विधायक खरीदने के आरोप लगाए। कांग्रेस के 3 लापता विधायक भी लौट आए। डेढ़ बजे तक बीजेपी को हार का आभास हो गया। इसके बाद भावुक भाषण के साथ बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे की पटकथा तैयार की गई।इस्तीफा हुआ नहीं कि कांग्रेस और जेडीएस खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी।

लेकिन इन सब के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिरकार जीत किसकी हुई, कांग्रेस की या फिर बीजेपी की। या फिर ये कहें कि कर्नाटक की जंग में डेमोक्रेसी पास हुई वही मोदीक्रेसी फेल। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कर्नाटक में सत्ता पाने के लिए बेताब था वो भी हर कीमत पर, बावजूद इसके कि बीजेपी बहुमत से कई कदम दूर थी। ये सब जानते हुए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बीएस येदियुरप्पा पर दबाव बनाता है कि वो सीएम बने। इस बीच राज्यपाल की भी भूमिका अहम थी, राज्यपाल ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता सौप दिया और फिर कांग्रेस खेमा हरकत में आया। अब कर्नाटक की सत्ता पर काबिज होना दोनों ही खेमों के लिए वर्चस्व की लड़ाई हो गई।  विपक्ष की घेराबंदी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बीजेपी की सारी रणनीति पर पानी फेर दिया। इसे भारत देश के लोकतंत्र की खूबसूरती ही कहेंगे कि आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट मामले में फंसे पेंच को सुलझाता है और बहुमत सिद्ध करने के लिए कांग्रेस के लिए राहत की खबर लेकर आता है। शनिवार आते आते बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस अपने विधायकों को ऐसे लेकर भागते है कि मानो इन विधायकों की अगर परछाई भी दूसरी पार्टी पर पड़ जाए तो दलबदल का खौफ सताने लगे। लक्जरी गाड़ियों में एक जगह से दूसरे जगह विधायक छुपते छुपाते रहे। जोड़तोड़ की खबरें भी आती रही लेकिन साम दाम दंड भेद सब कुछ पार्टियों द्वारा अपनाया गया। शनिवार को फ्लोर टेस्ट होने से पहले बीजेपी को आभास हो गया कि जोड़तोड़ की राजनीति नहीं हो पा रही है इसलिए जनता के बीच सहानुभूति पाने और जनता के बीच गलत सन्देश जाने से बचने के लिए बीजेपी ने सीएम से इस्तीफा दिलवा दिया।

वो सिर्फ ढाई दिन तक राज्य के सीएम रहे। इस तरह उन्होंने अपना ही पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। 2007 में येदियुरप्पा 7 दिन तक ही मुख्यमंत्री के पद पर रह पाए थे। आजाद भारत के इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं कि मुख्यमंत्री को शपथ लेने के कुछ ही दिन बाद इस्तीफा देना पड़ा है। 1998 में जगदंबिका पाल को सिर्फ 2 दिन के लिए उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। बिहार के सतीश प्रसाद सिंह को 1968 में सिर्फ 5 दिन मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था। वह जनता क्रांति दल सरकार को हराकर कांग्रेस को वापस सत्ता में लाए थे। इनके अलावा हरियाणा के ओम प्रकाश चौटाला को 1990 में 5 दिन के लिए सरकार की कमान संभालने का मौका मिला। इसके बाद 1991 में उन्हें फिर से 16 दिन का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब पहली बार इस पद पर काबिज हुए थे तो सिर्फ 7 दिन तक ही सीएम की कुर्सी पर बैठ पाए। साल 2000 में नीतीश 7 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने। 1998 में एस सी मारक 11 दिन के लिए मेघालय के मुख्यमंत्री बने। 1998 में तमिलनाडु की जानकी रामचंद्रन 23 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनीं। उनके अलावा बिहार के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल 1968 में 30 दिन और केरल के चौधरी मोहम्मद कोया 1979 में 50 दिनों तक मुख्यमंत्री  की कुर्सी पर बैठे। कर्नाटक चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी याानि बीजेपी के लिए ये एक बड़ा झटका रहा क्योंकि बीजेपी को न खुदा मिला न विसाले सनम।